१ 

ब्रिटेन के आधिपत्य वाले गयाना में उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी में चीनी मजदूरों के बंधुआ शोषण के लिए कुख्यात कंपनी बुकर मैकोनेल (अब बुकर कैश एंड कैरी) द्वारा १९६८ में स्थापित (गयाना 1966 में आजाद हुआ) और सन २००२ के बाद से ३५०० मिलियन की नेट इनकम वाली इन्वेस्टमेंट कंपनी मैन ग्रुप द्वारा प्रायोजित ५०,००० ब्रिटिश पौंड का पुरस्कार पाने वाली एक लड़की जिसके राजनैतिक विचारों के बारे में यह पुरस्कार आने से पूर्व कोई नहीं जानता था जिसे उसके पहले उपन्यास के लिए पांच लाख डॉलर का एडवांस मिला जिसके अप्रकाशित उपन्यास के अंश को पचास बरस के सारी भारतीय भाषाओँ के सारे लेखन से बेहतर समझते हुए (उस एन्थोलोज़ी में एकमात्र भारतीय भाषा लेखक मंटो है) सलमान रश्दी ने भारत की आजादी की पचासवीं वर्षगांठ पर अमेरिका में प्रकाशित विंटेज के पचास साल के सर्वश्रेष्ठ भारतीय लेखन की एन्थोलोज़ी में शामिल कर लिया जिसकी किताब के लिए एजेंट लन्दन से उड़कर लेखिका के द्वारे आया वह लेखिका पुरस्कार की घोषणा के बाद भारत की सबसे चर्चित और सबसे बड़ी राजनैतिक एक्टिविस्ट बन गयी (हालाँकि उससे पहले उपन्यास में केरल में सीपीआई (एम) के कथित नेगेटिव चित्रण की वजह से ई.एम.एस. नंबूदरीपाद और समूचे लेफ्ट ने लेखिका को एंटी-कम्युनिस्ट, एंटी-लेफ्ट कहा और उसके उपन्यास को यौन स्वैराचार और बुर्जुआ मूल्यों को बढ़ावा देने वाला बताया) और उस लेखिका ने कालांतर में साहित्य अकादेमी पुरस्कार यह कहते हुए ठुकरा दिया कि ऐसा करके वह भारत सरकार की अमेरिकापरस्ती का और नियोलिबरल नीतियों का विरोध कर रही है जो औद्योगिक मजदूरों के शोषण को बढ़ावा देती हैं और देश में सशस्त्रीकरण को बढ़ावा देती हैं. लेफ्ट समेत तमाम बुद्धिजीवियों ने इस निर्णय की देशव्यापी सराहना की।

 २ 

जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल २०१० के आखिरी दिन भारत में १३००० मिलियन डॉलर के प्रोजेक्ट्स कर रही इन्फ्रास्ट्रक्चर कंपनी डी.एस.सी. ने दक्षिण एशियाई लेखन के लिए ५०,००० डॉलर की इनामी राशि वाला पुरस्कार घोषित किया. २०११ के फेस्टिवल में पहली बार दिया जाने वाला यह पुरस्कार वर्ष की एक श्रेष्ठ कृति को दिया जायेगा. पुरस्कार के लिए घोषित की गयी समिति में अरुंधती रॉय, विक्रम सेठ, अरविन्द अडिगा, किरण देसाई के एजेंट और लिटरेरी एजेंसी डी.जी.ए. के सह-संस्थापक डेविड गॉडविन, लॉर्ड मेघनाद देसाई, नयनतारा सहगल,टीना  ब्राउन और माइकल व्होर्टन के साथ भारत के पहले फेमिनिस्ट प्रकाशन काली फॉर वीमन की सह संस्थापक, अब अलग हो कर प्रकाशन गृह जुबान की मालकिन और एक एक्टिविस्ट व कमिटेड, सेकुलर बुद्धिजीवी के रूप में देश और देश के बाहर प्रसिद्ध उर्वशी बुटालिया भी शामिल हैं. 

१९२९ में अपनी तीसरी जापान यात्रा पर जा रहे रवींद्रनाथ ठाकुर = टैगोर को दक्षिण कोरियाई अखबार डोंग-ए के ब्यूरो चीफ यी ताएरो और कवि चू योहान ने अपने देश आने के लिए आमंत्रित किया. रवि बाबू के लिए वहाँ जाना संभव नहीं हुआ लेकिन उन्होंने इन दो कोरियाई मित्रों को निराशा से बचाने के लिए चार पंक्तियों की एक कविता लिखी  उनके देश कोरिया के लिए जो चू योहान के अनुवाद में डोंग-ए में प्रकाशित हुई. एशिया के पहले नोबेल पुरस्कार विजेता  की चार पंक्तियाँ तब जापानी आधिपत्य से जूझ रहे कोरियाई मानस के लिए एक प्रेरणा की तरह घटित हुई. इससे पहले अपनी दूसरी जापान यात्रा के दौरान १९२४ में एक भारी भीड़ के सामने सार्वजनिक रूप से रवींद्रनाथ जापान के विरुद्ध कोरियाई संघर्ष का समर्थन कर चुके थे. उधर खुद अपने देश में वे उपनिवेशवाद के विरुद्ध भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन का समर्थन करते हुए तत्क्षण सांप्रदायिक अस्मिता आधारित राष्ट्रवाद का विरोध भी कर रहे थे. १९१० में प्रकाशित उनका उपन्यास ‘गोरा’ हिन्दू अस्मिता के विमर्शों का एक प्रत्याख्यान है.

फ्राग इन ए वैल के मुताबिक चार पंक्तियों की यह कविता दक्षिण कोरियाई राष्ट्रवाद की कल्पना में कोरियाई आजादी आन्दोलन को जायज़ ठहराने वाली एक ‘बाहरी वैधता’ की  तरह बहुत महत्वपूर्ण ढंग से अंकित रही है. कोरियाई पाठ्यपुस्तकों में इस कविता को पढाया जाता रहा है. और यहीं से हमारी कहानी शुरू होती है. २००७ में कोरियन टाइम्स में एक लेख प्रकाशित हुआ कि हाई स्कूल पाठ्यपुस्तकों में इस चार लाइन की कविता का एक ऐसा संस्करण पढाया जा रहा है जो चार नहीं बारह लाइनों का है. रवींद्रनाथ ने कोरिया के लिए चार पंक्तियाँ लिखी थीं जो इस प्रकार हैं (अंग्रेजी में):

In the golden age of Asia

Korea was one of its lamp-bearers

And that lamp is waiting to be lighted once again

For the illumination in the East

एशिया के किसी स्वर्ण युग की कल्पना करती हुई यह कविता कोरियाई आत्मसम्मान के लिए कैसी रही होगी यह समझना जितना आसान है उतना ही यह समझना भी कि कविता में पूरब और पश्चिम, एशिया और योरोप, अँधेरा और रोशनी की संकेत-व्यवस्था क्या है लेकिन रवींद्रनाथ की यह कविता जितनी एक गुलाम देश के नाम एक शुभकामना सन्देश थी उतनी ही जापान के उपनिवेशवादी आतंक के खिलाफ भी एक सन्देश थी. १९४५ में जापान का पतन हो गया लेकिन कोरिया के दो हिस्सों पर रूसी और अमेरिकी सेनाओं का कब्ज़ा हो गया जिसके परिणामस्वरूप १९४८ में देश का विभाजन हुआ और उत्तर और दक्षिण कोरिया बने. १९५० में साम्यवादी उत्तरी कोरिया के हमला करने से शुरू हुआ युद्ध तीन साल बाद बिना किसी औपचारिक संधि के खत्म हुआ, तब तक २५ लाख लोग मर चुके थे. तकनीकी तौर पर युद्ध आज भी खत्म नहीं है क्योंकि दोनो देशों ने किसी शांति प्रस्ताव/संधि पर हस्ताक्षर नहीं किये हैं. दक्षिण कोरिया में १९६० से १९९० के बीच का समय तानाशाही का रहा जबकि उत्तरी में एक पार्टी सर्वसत्तावादी सिस्टम १९४८ से है. १९९१ में दोनों को संयुक्त राष्ट्र संघ की सदस्यता मिल गई. उत्तरी कोरिया अभी भी एक प्रमुख अमेरिका-विरोधी, मिलिटेंट देश बना हुआ है जबकि दक्षिणी कोरिया ने हैरतंगेज़ तकनीकी और आर्थिक प्रगति की है (अपने  पूर्व-औपनिवेशिक मालिक जापान की तरह) है. वर्तमान राष्ट्रपति ली म्युंग बाक बहुराष्ट्रीय कंपनी ह्युंडाई के पूर्व सी.ई.ओ. हैं. इस पूरे समय में भारत-कोरिया राजनय में ४ पंक्तियों की वह कविता अब भी महत्वपूर्ण बनी रही है (ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने कोरियाई संसद में उसे सुनाया था २००६ में). लेकिन जो आठ पंक्तियाँ पाठ्यपुस्तकों में अतिरिक्त  जोड़कर दक्षिण कोरियाई राष्ट्रवाद को और प्रभावशाली बनाया गया था वे भारत में एक स्वतंत्र कविता के रूप में, जो कि वे दरअसल हैं, पाठ्यपुस्तकों में पढ़ाई जाती हैं:  

Where the mind is without fear and the head is held high;

Where knowledge is free;

Where the world has not been broken up into fragments by narrow domestic walls;

Where words come out from the depth of truth;

Where tireless striving stretches its arms towards perfection;

Where the clear stream of reason has not lost its way into the dreary desert sand of dead habit;

Where the mind is led forward by thee into ever-widening thought and action –

Into that heaven of freedom, my Father, let my country awake.

भारत में जिस समय केंद्र में एक दक्षिणपंथी सरकार थी (१९९८-२००४) उस दौरान साहित्य अकादेमी का हिंदी पुरस्कार  अरुण कमल (१९९८), विनोद कुमार शुक्ल (१९९९), मंगलेश डबराल (२०००), अलका सरावगी (२००१), राजेश जोशी (२००२), कमलेश्वर ( २००३), वीरेन डंगवाल (२००४) को मिला.

जनवरी २०१० में चिंतित और आक्रोशित लेखकों ने एक मानव श्रंखला बनाई.  साहित्य अकादेमी के एक साहसिक भूतपूर्व उपसचिव की प्रमुख उपस्थिति में हुए इस  आयोजन में और लेखकों को हिस्सा ले सकना चाहिये था.

जिस देश में एक बहुराष्ट्रीय कंपनी का भूतपूर्व सी.ई.ओ. राष्ट्रपति था उसके देश में एशिया के पहले नोबेल विजेता की चार लाईनें राष्ट्रवादी भाव जगाने में सहायक थी. १०.७ बिलियन डॉलर की नेट इनकम वाली एक कंपनी ने कुल एक स्ट्रोक में और मात्र ५०,००० डॉलर में दक्षिण कोरियाई राष्ट्रवाद, भारत दक्षिण कोरिया द्विपक्षीय सम्बन्ध, एक महान कवि के प्रति एक राष्ट्र की कृतज्ञता और अपनी सी.एस.आर. (कोर्पोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी) सब को एक साथ साध लिया था.  

है था हो गया था.  

सामने (शायद किसी कोरियन) स्क्रीन पर ये यह छह पाठ/दृश्य गुजर रहे हैं. अगर आप इनका कोई समझदार अर्थापन कर सकें तो बताना न भूलें. शुभ रात्रि.