
क्षमा
कौन क्षमा करेगा मुझे जब क्षमा मांगना ही पराभव या पस्ती
हो गया हो मैं यह लिख रहा हूँ और आसमान मज़ाक उड़ा रहा है मेरा
देखो लिख रहा है मूर्ख बस क्षमा मिल जाए सबसे
अग्नि कहने से मुँह नहीं जलता क्षमा लिखने से क्षमा नहीं मिलती मूर्ख
आवाज़
घास कुचले जाने से पहले
प्रहार की नहीं, आवाज़ की प्रतीक्षा भी तो कर रही हो सकती है
हो सकता है कि
घास को पैर नहीं, आवाज़ कुचलती हो
अगला कदम बेआवाज़ उठाकर देखिए
आपके पैरों के नीचे से जमीन ही न खींच ले कहीं!
सुबह तकः आत्महत्या के विरुद्ध
फूल क्या इतने सख्तज़ान होते हैं
कि वे खुदकुशी करना चाहें
या वे डरते हैं कोई न कोई
मुरझा ही देगा उन्हें
जब फूल खुदकुशी कर रहे हों
तब कैसे साँस ले सकता है कोई इस पृथ्वी पर
बस रात भर रोक लो खुद को
ओस की तरह ढक लूंगा तुम्हें
तुम्हीं में मिल जाऊंगा
बस सुबह तक रोक लो खुद को
एक सैनिक का दुर्लभ निजी पत्र
आख़िर मैं कब समझूंगा
सिवा मौत उसका कोई इलाज़ नहीं
जिसमें जीवन कह कर लिथड़ा हूँ
सिर्फ़ अभी ही मर सकता हूँ मैं
प्रेम में ही कोई मर सकता है अपने हाथों इतनी आसानी से
वर्ना तो कितना आसान है दूसरों को मारना
बाद में सिर्फ इंतज़ार होगा
इस तरह मार दिये जाने का
कि जो गिरेगा कुत्ते की तरह लाश-गाड़ी में
वो कोई दूसरा होगा
(प्रथम प्रकाशनः जनपथ, 2009/ फोटोः गिरीश)
‘एक सैनिक का दुर्लभ निजी पत्र’ बहुत सुन्दर कविता है, सही कहा-
”प्रेम में ही कोई मर सकता है अपने हाथों इतनी आसानी से
वर्ना तो कितना आसान है दूसरों को मारना”
जबकि अग्नि कहने से थोड़ा सा मुंह और कभी थोड़ा-सा वक़्त ( या जो भी उसे कहा जाता हो) जल जाता है, और मुझे तो कई बार माफ़ किया है लोगों ने – सिर्फ़ माफ़ी शब्द के उच्चारण से.
लगातार कविताएँ लगाइए.
यह गजब है यार …
आवाज़
घास कुचले जाने से पहले
प्रहार की नहीं, आवाज़ की प्रतीक्षा भी तो कर रही हो सकती है
हो सकता है कि
घास को पैर नहीं, आवाज़ कुचलती हो
अगला कदम बेआवाज़ उठाकर देखिए
आपके पैरों के नीचे से जमीन ही न खींच ले कहीं!
adbhut kavitaayen sab ki sab..
जब फूल खुदकुशी कर रहे हों
तब कैसे साँस ले सकता है कोई इस पृथ्वी पर oh.. kitna marmik hai