कई मित्रों को आप बरसों बरस जान कर भी उनके बारे में पूर्वानुमान नहीं लगा पाते. एक तरह का ‘एलिमेंट ऑफ सरप्राइज़’ उनके पास सदैव होता है. प्रभात रंजन ऐसे ही मित्र हैं. कभी भी एक लय में ज्यादा देर नहीं रहते. वे शुरू से प्रतिलिपि पत्रिका के न सिर्फ नियमित और महत्वपूर्ण लेखक रहे हैं – और सबसे ज्यादा लोकप्रिय भी, उनकी कहानी सोनाली और सुबिमल मास्टर की कहानी हमारी पत्रिका पर सबसे अधिक पढ़ा गया टेक्स्ट है – बल्कि एक अंतरंग सहयोगी और सलाहकार भी. प्रतिलिपि बुक्स के लिए जब हम किताबें तय कर रहे थे और मैंने कहा कि हम पहले सेट में मार्केस की कहानी ही नहीं आपका कहानी संग्रह भी प्रकाशित करना चाहते हैं तो उन्होंने समझाने की कोशिश की कि क्यूँ हमें एक नए प्रकाशक के तौर पर “ऐसा नहीं करना चाहिए.” खैर मेरी जिद चल गयी और अच्छा हुआ चल गयी. खुशी है कि हमने बोलेरो क्लास प्रकाशित की.
बहरहाल, बात उनके ‘एलिमेंट ऑफ सरप्राइज़’ की. मुझे ऐसा अंदाज़ा था कि ज़नाब ग़ज़ल लिखते हैं और शायद कविता भी. परसों मेल में आया सरप्राइज़. दो नयी कवितायें!! और वो भी इस नोट के साथ: “कवि-मित्र गिरिराज किराडू से प्रेरित हो कर”. कविताएँ उनके कथा-मिजाज़ से अलग जान पड़ती हैं लेकिन ध्यान से पढ़ने वाले कोई भीतरी सूत्र ढूंढ लेंगे. विस्थापन और (अ)लगाव को एक आत्मीय, मेच्योर, अनुत्तेजित स्वर में बयान करती हुई ये कविताएँ आप सबके साथ साझा कर रहा हूँ कवि-अनु-मति से. चित्र यहाँ से साभार.
बार-बार लौटता हूँ
बार-बार जाने के बाद
हर बार सोचता हूँ
गुहा-कंदराओं में कहीं चला जाऊँ
जहाँ से कभी मेरे पुरखे आये थे
मिथिला के मैदानों में
ताल मखानों और पोठिया मछली के साथ
जो वहीं के होकर रह गए.
मैं किसका होकर रह जाना चाहता हूँ.
बार-बार सोचता हूँ…
कौन है जिसकी पदचाप सुनाई देती है
बरसों दूर से… कितने बरस यह भी ठीक से याद नहीं…
लगता है जैसे सब कल की ही बात हो…
मैं किससे दूर जाता हूँ
किसके पास आने के लिए
धुपीले दिन और धुंधली रातों की उस सड़क से
जिसकी भोर क्या जाने कोई है भी या नहीं.
बार-बार सोचता हूँ…
बार-बार सोचता हूँ
बार-बार सोचने के बाद
आखिर मैं किसका स्वप्न-भंग हूँ
किसकी जाग हूँ
क्या मैं भी किसी के नींदों में वैसे ही आता हूँ
रात-रात भर जगाने के लिए…
कहाँ मुझे जाना है कि
आखिर बार-बार लौटा हूँ
बार-बार जाने के बाद…
२.
दूर कौन गुनगुनाता है
कि मन कहीं और कहीं और चला जाता है
इतना कुछ तो है
सपने, उम्मीदें, रतजगे, सूखे आंसुओं का रोना
फिर भी कुछ है कि कुछ भी कुछ भी की तरह नहीं लगता
बरसों पुराने दोस्त हैं, पुराने कहकहे हैं, झूठे-सच्चे किस्से हैं
कितना सारा बोलना है, इक लंबी चुप्पी है
फिर भी कितना कुछ है जो अनकहा
मन में इकठ्ठा होता चला जाता है
जितना भी कह लो कहा नहीं जाता है
दूर कौन गाता है
कि मन कहीं और
कहीं और
चला जाता है.

zamin aur apno se juda hua ek dard jise ranjan bhai ne kavita main piroya hai……….
प्रभात रंजन का कवि-स्वर अंतरंग ही नहीं अनंत भी है। उनके बिम्ब दृश्य से अधिक ध्वन्य हैं! अनुगूंज जो शुरू तो होती है किंतु खत्म नहीं होती। विचित्र कि यह क्रमशः कमज़ोर नहीं पड़ती जाती, तेज और तेज ही होती चली जाती है! बेहतरीन कविताओं के लिए बधाई!
मिथिला के प्रेमियों की यही नियति है ।एक वे हैं जो मखान और मछली खाते हुए वहीं रहते हैं,दूसरे वे जो मखान और पोठिया मछली की गंध कविता,कहानी में ढूढते हैं
उत्तर देने से बचने की डिफेंसिव अप्रोच धीरे -धीरे उत्तर पाने की इच्छा और योग्यता को भी खतरे में डाल देती है ! स्वयं और संलग्न वातावरण के प्रति निरंतर औदास्य से प्रसूत अंतर्मुखता अंततः हमें किसी शून्य में धकिया देती है ! और कविता कभी-कभार फूट पड़ती बड़बड़ाहट के सिवा कुछ नहीं रह जाती ! हालांकि
यह बड़बड़ाहट कुछ अर्थ भी रखती है !
‘एलिमेंट ऑफ सरप्राइज़’ की भी आपने खूब कही. फ़ेसबुक पर लिंक देखकर एकबारगी तो विश्वास ही नहीं हुआ – प्रभात रंजन की कविताएं!! उनसे अनौपचारिक संवाद होता अवश्य कहता ” आप भी!”
बहरहाल, ’कविता समय’ में नामवरजी का दिया टैली-भाषण बरबस याद हो आया जहाँ उन्होंने कहा था कि अच्छा कवि होने के लिये अच्छा गद्यकार होना भी जरूरी है. इस बयान के बरक्स अच्छे गद्यलेखक में अच्छे कवि की संभावाना होनी ही चाहिये. जो इस बात से सहमत न हों वो इन कविताओं को पढ़ कर अपनी राय बनायें.
प्रभात रंजन ने दोनों ही कविताओं में अपने भीतर की उस टीस को इतनी कोमलता से छुआ है जितना कोई कुशल हाथ रूई के फ़ाहों से जख्मों को छूता है. ’दूर कौन गाता है’ -भीतर तक उतर गई.
कवि को बधाई और साथ ही और कविताएं लिखने-पढ़वाने का आग्रह भी.
धन्यवाद आपका भी…
जितना भी कह लो कहा नहीं जाता है
दूर कौन गाता है
कि मन कहीं और
कहीं और
चला जाता है. …………..khoobsurat hai bhaiya….
Nice poems
पहली कविता जबर्दस्त्त लगी .एकदम अलग .
लौटने के दो गीत.. दोनों अच्छे.. प्रभात जी को बधाई ।
sundar bhav aur shabd. padhkar achha lga.
आखिर मैं किसका स्वप्न-भंग हूँ…
सुन्दर कवितायें , प्रभात जी के कवि को भी शुभकामनाएं . आपका धन्यवाद कि इन्हें सबके लिए लेकर आये .
badiya kavitaye hain. lekin prabhat bhi kaviya jayenge ummid nahi thi. baharhal unhe badhai.
प्रभात जी की कविता मेरे लिए एक गांव की तरह है. यादों का हमसफर,भाया शब्द। खासकर जब कवि कह उठता है- ताल मखानों और पोठिया मछली के साथ…
फिर भी कितना कुछ है जो अनकहा
मन में इकठ्ठा होता चला जाता है
जितना भी कह लो कहा नहीं जाता है
बहुत ही गहन सच्चाई बयां करती अनुभूतियां
behtrin kavitaao ke liye kavi prabhaat jee ko badhaaee. kavita ka yah prabhat din me tabdil ho kr aur naya gul khilaye yahi kamna hai apni.
असाधारण कवितायेँ
सरप्राइज़…….प्रभात रंजन की कविताएं !!!
आर्द्र,सघन-सशक्त…….
bahut badhiyaan laga padhkar. aapne likha hai ki ye do geet hain. ummid rahegi ki koi eenhe surbaddh kare.
अच्छी कविताएं हैं..बहुत गहरी और परिपक्व…कभी कभी मन यूं ही चला जाता है जाने कहां कहां तो…
बहुत अच्छी कविताएं… यह पहली बार ही है कि प्रभात भाई कि कविताएं पढ़ रहा हूं.. और कविता खालिश कविता लग रही है… मैं तो कहूंगा कि भाई को कविताएं भी लुखते रहना चाहिए…फि्लहाल तो ढेर सारी बधाईयां कवि प्रभात रंजन को… और गिरिराज भाई को बहुत आभार…
वाह-वाह-वाह …सरप्राइज़ एलीमेंट तो खैर है ही…पर अब दावे से कह सकता हूँ कि उनकी एकाध डायरी कविताओं से भरी है
very good starting.there is proper ‘LAY’ in the poem.I like it
बहुत अच्छी कविता …..बहुत अच्छी कहानी …बस इतना ही. मुझे लगता है की लेखक और पाठक इसी चक्कर में फंसे रहते हैं . इससे आगे नहीं जा पाते. जबकि ….
वाकई आश्चर्य – एक सुखद आश्चर्य। दोनों ही कविताएं बहुत अच्छी हैं और आनेवाले कविता-संसार के प्रति भरपूर उत्सुकता जगाती हैं। पीछा करना पड़ेगा अब प्रभात का।
पहली बार प्रभात जी इस विधा में देखा…अभी तक तो वे हमारे लिए दुनिया जहान की साहित्यिक हलचले ही सामने ले आते थे, अब यह सब भी मिला…आशा करता हु कि इसका स्वाद आगे भी मिलता रहेगा…