(प्रतिलिपि बुक्स के बारे में मेरा यह लेख कुछ सम्पादित हो कर आउटलुक हिंदी के जून २०११ अंक में प्रकाशित हुआ है)
२ अप्रैल २००८ को हमने हिंदी-अंग्रेजी में साहित्य और विचार की एक द्विभाषी पत्रिका “प्रतिलिपि” का ऑनलाइन प्रकाशन शुरू किया. इसके पहले अंक में थोड़े-से लेखक थे, महीने भर की तैयारी थी और दो साहित्य संपादकों और एक कला संपादक के अलावा कोई चौथा मददगार नहीं था. पिछले तीन बरस में पत्रिका के दस अंक आये हैं जिनमें दुनिया की २५ भाषाओं के ३५० से अधिक लेखकों कलाकारों का काम शामिल है. पत्रिका के पास भारतीय और विदेशी भाषाओं के आठ परामर्शक हैं और अमितावा कुमार, के. सच्चिदानंदन, मुकुल केशवन, अर्शिया सत्तार, मदन सोनी, तेजी ग्रोवर जैसे प्रतिष्ठित लेखक इसके साथ बतौर सलाहकार जुड गए हैं. हमारी ऑनलाइन रीडरशिप जो पहले अंक के समय प्रतिदिन २५ थी अब ८०० से अधिक है. और यह सब बिना किसी भी किस्म की सरकारी और कारपोरेट मदद के हुआ है. संसाधन सीमित होने का फ़ायदा यह हुआ कि हमने वैकल्पिक रस्ते ढूंढें. पत्रिका को प्रिंट में उपलब्ध करने के लिए गोवा स्थित एक फर्म के साथ तालमेल करके एक नयी टेक्नोलॉजी से ‘प्रिंट-ऑन-डिमांड’ प्रकाशित करना शुरू किया. हमारा विश्वास था कि पाठक को केंद्र में रखकर काम किया जाये तो कुछ सकारात्मक परिणाम सामने आयेंगे हालाँकि शुरू करते हुए हमें कोई ठोस अंदाज़ा नहीं था कि एक द्विभाषी फोर्मेट के लिए ऑनलाइन या प्रिंट रीडरशिप कैसी होगी.
कुल मिलाकर हमारा हमारा विश्वास ठीक निकला. इन तीन सालों में लगभग हर महीने हमें कुछ नए, अप्रत्याशित दोस्त और मददगार मिले हैं और दुनियाभर के लेखकों-पाठकों का ख़ूब प्यार, समर्थन और सहयोग मिला है.
हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के लेखन को अंग्रेजी और दूसरी विश्व भाषाओं तक एक नए माध्यम में पहुँचाने का काम हमारी प्राथमिकता थी लेकिन असल लक्ष्य था भारतीय भाषाओं के काम को उनके साथ एक बराबरी वाले स्पेस में खड़ा करना. हमने यह एक जिद की तरह करने की कोशिश की है और बहुत हद तक सफल भी हुए हैं. यह काम एक स्वतंत्र मंच कर पा रहा है इस बात की क़द्र करने वाले हमराह मिले. हमने बस ज़रूरत भर के स्थापित नामों के साथ ज़्यादातर नए लेखकों के काम को प्रकाशित किया और लेखकों के प्रस्तुतीकरण में भाषा या उम्र आधारित वरीयताओं और वर्चस्वों की बनी हुई परिपाटी को चुनौती दी. कई बिल्कुल नए लेखकों का काम पहली बार छपा और कुछ लेखकों का काम हमारे यहाँ छप कर मुख्यधारा के हार्पर कॉलिंस और पेंगुईन जैसे बड़े, बहुराष्ट्रीय प्रकाशकों की नज़र में भी आया. “आतंक” और “गाँव” पर जो वृहदाकार विशेषांक निकाले उन्हें व्यापक सराहना मिली. इसी सब से उत्साहित हो कर, तीनों संपादकों की निजी बचत से लेकिन इस बार ३० से अधिक लेखक-मित्रों की टीम के साथ हमने “प्रतिलिपि बुक्स” की स्थापना की. पहले सेट की छह किताबें जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल २०११ में जनवरी में लांच हुई.
तीन पुस्तकें सीधे स्वीडी से अंग्रेजी में अनूदित उपन्यास हैं जो पूरी दुनिया में पहली बार प्रकाशित हुए हैं. मुझे इस बात की बेहद प्रसन्नता है कि स्वीडी के दो सबसे सम्मानित लेखकों आग्नेता प्लेयेल और लार्श एंडरसन की ‘ए विंटर इन स्टॉकहोम’ और ‘द लेजेंड ऑफ प्लेग किंग’ जैसी कृतियाँ हम प्रकाशित कर पाए. डेनिश मूल के युवा लेखक यान हेनरिक स्वान से दोस्ती एक ऐसा अनुभव है कि उनका प्रकाशक होना भी एक अनोखी खुशबू से घिरे होने के अहसास से भर देता है. यान हेनरिक जैसा रेडिकल जीवन जीने की कोशिश करने वाले लेखक दुर्लभ हैं. आजकल बेघर महिलाओं के साथ काम कर रहे और उनको कविता लिखने के गुर सिखा रहे यान कभी एक पुल पर चौकीदारी का काम कर चुके हैं तो एक प्रमुख साहित्यिक पत्रिका के संपादक भी रहे हैं. उनका उपन्यास ‘मेनोलिस मोपेड’स’ मनुष्य और टेक्नोलोजी के संबंधों की एक बहुत गहरी पड़ताल करता है. दिलचस्प यह है कि इन तीनों लेखकों से हमारा पहला परिचय पत्रिका के मार्फ़त हुआ और लार्श व यान का काम हम पत्रिका में प्रकाशित कर चुके थे.
लेकिन यहाँ मैं हिंदी किताबों पर ज्यादा बात करना चाहूँगा. हिंदी के प्रमुख युवा कथाकार प्रभात रंजन हमारी पत्रिका के अब तक सबसे अधिक पढ़े गए लेखक हैं, इसलिए उनका कहानी संग्रह ‘बोलेरो क्लास’ हमारे लिए एक आसान निर्णय था. हम उनकी लोकप्रियता के जादू से वाकिफ़ थे. उनकी कहानियाँ दूरदराज़ के छोटे इलाकों में बिखरे ऐसे पात्रों से बनती हैं जिनका लोकल बहुत दूर से आ रहे ग्लोबल से बनता बिगड़ता रहता है. वे हमें ‘द ग्रेट इंडिया स्टोरी’ के असल अँधेरे अंडरग्राउंड में ले जाती हैं. उनकी कथा का अपना ख़ास लोकेल बिहार और नेपाल की सरहद का क़स्बा सीतामढ़ी है जो फणीश्वरनाथ रेणु के पूर्णिया और आर. के. नारायण के मालगुड़ी की याद दिलाता है.
प्रभात रंजन की कहानियों जितने ही बड़े प्रशंसक हम मनोज रूपड़ा की अनूठी लंबी कहानियों के भी थे. जब वे अपनी कहानियों की किताब ‘टावर ऑफ सायलेंस’ हमारे साथ प्रकाशित करने पर सहमत हो गए तो लगा हिंदी का सेट भी बन जायेगा . रियल और वर्चुअल के आर-पार गुजरते फंतासी के बियाबान में फैली उनकी कहानियों में आप अचानक निदा फ़ाज़ली और अरुंधती राय जैसी वास्तविक शख्सियतों से टकरा जाते हैं और हैरान होते हैं कि वे भी कहानियों के किरदारों जितनी ही आभासी या सच्ची जान पड़ रही हैं.
लेकिन तीसरी किताब का चयन अभी बाकी था. हम कई विकल्पों में से चुनने की कोशिश कर रहे थे और फेस्टिवल की तारीख नज़दीक आ रही थी. उधर प्रभात रंजन जीते-जी लेजेंड हो चुके लातिन अमेरिकी लेखक गाब्रीएल गार्सिया मार्केस के जीवन और लेखन पर एकाग्र अपनी किताब ‘मार्केस की कहानी’ पूरी कर चुके थे और एक शाम ये सरप्राइज़ मेरे मेल बॉक्स में था. हिंदी में जहाँ हिंदी लेखकों के जीवन पर लिखी किताबें ही दुर्लभ हैं, स्पेनिश के इस जादूगर लेखक पर खोजी अंतदृष्टि के साथ लिखी गयी यह किताब एक उपलब्धि है. नोबेल पुरस्कार से सम्मानित मार्केस नामक अनोखी परिघटना को यह किताब कुछ इस तरह समझने का प्रयास करती है कि मार्केस के जीवन की अंतरंगता और साधारणता, उनके लेखन का जादू और उसका सच, उनके अपने व्यक्तित्व की रहस्यमयता और उसकी संजीदगी —कुछ भी इसकी नज़र से ओझल नहीं होता.
उसके बाद से हम चार किताबें और प्रकाशित कर चुके हैं जिनमें “आतंक” और “गाँव” पर केंद्रित विशेषांकों के पुस्तकाकार संस्करणों और रुस्तम सिंह के दार्शनिक निबन्धों के संग्रह “वीपिंग एंड अदर ऐसेज़’ के साथ साथ ‘होम फ्रॉम ए डिस्टेंस’ भी शामिल है जो पिछले दस बरस में समकालीन हिंदी कविता का अंग्रेजी में प्रकाशित होने वाला पहला संचयन है. इसमें नागार्जुन, धूमिल, श्रीकांत वर्मा. कुंवर नारायण, विनोद कुमार शुक्ल, केदारनाथ सिंह, विष्णु खरे, अशोक वाजपेयी, मंगलेश डबराल, कमलेश, वीरेन डंगवाल, असद जैदी, उदयन वाजपेयी उदय प्रकाश के साथ पंकज चतुर्वेदी और कृष्ण मोहन झा जैसे युवा हस्ताक्षरों की कवितायें राबर्ट हक्स्टेड, आर्लीन ज़ीद, आलोक भल्ला, विनय धारवाडकर, राहुल सोनी, मनोज कुमार झा के अनुवाद में शामिल हैं.
पत्रिका की तरह किताबें भी हम उसी पाठक-केंद्रित नज़रिये के साथ वितरित करने की कोशिश कर रहे हैं. बहुत संकोच होता है वैसे दावे करने में जिनके साथ नए प्रकाशन शुरु होते हैं. उनमें से कुछ जल्द ही उनकी तफ़्सील हो जाते हैं जिनके बागी होने से वे शुरू करते हैं. हिंदी में अक्सर अदृश्य बताये जाने वाले उस किरदार का हमें भरोसा है जिसे पाठक कहते हैं. उसके हुए बिना हिंदी प्रकाशन संस्थानों की औसत उम्र शायद ५ साल होती. शिक्षण संस्थाओं से हिन्दी के गायब होने, अंग्रेजी की ‘अपरिहार्यता’ बढ़ते चले जाने और बहुसंख्य हिन्दी किताबों का एक संस्करण हज़ार से छोटा हो जाने के बावजूद यह तथ्य ही उम्मीद के लिए काफ़ी है कि उनमें से कुछ संस्थानों की उम्र हमारी आज़ादी की उम्र जितनी है.

बहुत बढिया लगा। प्रतिलिपि से अपनापा लगता है, ठीक वैसे ही जैसे आपने लिखा है – हिंदी में अक्सर अदृश्य बताये जाने वाले उस किरदार का हमें भरोसा है जिसे पाठक कहते हैं। एक पाठक के तौर पर हमें आप पर पूरा भरोसा है।
बहुत बढिया लगा। प्रतिलिपि से अपनापा लगता है, ठीक वैसे ही जैसे आपने लिखा है – हिंदी में अक्सर अदृश्य बताये जाने वाले उस किरदार का हमें भरोसा है जिसे पाठक कहते हैं। एक पाठक के तौर पर हमें आप पर पूरा भरोसा है।
“लेकिन असल लक्ष्य था भारतीय भाषाओं के काम को उनके साथ एक बराबरी वाले स्पेस में खड़ा करना.”
अनुवादकों की स्थिति सुधारने के लिए यूनेस्को की जो अनुशंसाएँ हैं, उसमें यह शामिल है, वास्तव में जो अनुवाद का सहज स्वाभाविक सिद्धांत है—
12.(d) a translator should, as far as possible, translate into his own mother tongue or into a language of which he or she has a mastery equal to that of his or her mother tongue. (स्रोत: snipurl.com/_bh)
आपकी मंडली यह दावा करती होगी कि उन्हें अंग्रेज़ी पर उनकी मातृभाषा जितनी महारत है और वे अंग्रेज़ी में अनुवाद करने वास्ते बिल्कुल लायक़ हैं। हिंदुस्तानियों का अंग्रेज़ी में अनुवाद करने का औचित्य यह हो सकता कि हमारी भाषा जानने वाले इतने अंग्रेज़ नहीं है जितने हमें स्वदेशी अंग्रेज़ी पाठकवर्ग के लिए चाहिए। मुझे इस दावे पर भरोसा नहीं है, अंग्रेज़ी में मौलिक लेखन की बात और है, लेकिन अंग्रेज़ी में अनुवाद करते हुए व्यंजना को अपनी मर्ज़ी की शक्ल नहीं दे सकते। हिंदी के साहित्य का अंग्रेज़ी अनुवाद करने के फेर में हिंदी पाठ की जो किरकिरी हो जाती है उसकी कौन सुध ले?
SHAANDAAR…!
इन सारी उपलब्धियों के लिए आपको और प्रतिलिपि के पूरे परिवार को बधाई! नि:स्वार्थ और वृहत सोच के बिना ये सभी कार्य असंभव नहीं थे गिरिराज भाई! आप और आपकी पूरी टीम को पुन: बधाई!…यह यज्ञ जारी रखें..निष्फ़ल नहीं जाएगा..
स्वीडिश और फिनिश से अंग्रेज़ी में ढेरों किताबें अनूदित करने वाली आपकी अनुवादक जोन टेट इंग्लैंड में पैदा हुई थीं। स्वीडिश भाषा से उनका वास्ता 17 साल की उम्र में ही पड़ा । यान हेनरिक स्वाह्न ने अपनी किताब का अनुवाद अंग्रेज़ी में किया, लेकिन जैसा कि आप बताते हैं :He has translated from Polish, Danish, English, French, Slovenian, Arabic and Greek into Swedish.।
आपका ख़ुद का कैसा अनुभव कैसा है? क्या आप मानते हैं कि तिरोहित के अंग्रेज़ी अनुवाद में आप उतने ही सफल हैं जितने इंटिमेसी के हिंदी अनुवाद में?
बहुत बढ़िया है बहुत बढ़िया