(मिथकों के बारे में दिलचस्प बात यह है कि आलिम फ़ाजिल लोग जो खुद उनमें यकीन नहीं करते (और अपने अलावा किसी को मिथकीय होते देखना बर्दाश्त नहीं कर सकते) वही उनके बारे में सबसे ज्यादा हाय-तौबा मचाते हैं। सबआल्टर्न संसारों में मिथक पान-बीड़ी की तरह होते हैं, जब तलब लगी तो लगी और जैसी-जितनी लगी उतनी लगी। अकादमिक एलीट मिथकों की “शाश्वत शक्ति” से अभिभूत रहता है, और मिथकीय हो सकने की कल्पनाओं में गुपचुप विहार करता रहता है। ऐसी गूढ़,विमोहनग्रस्त अभिभूत दशा और फ्लैट समाजशास्त्रीयता के बरक्स पिछले दिनों कोटा में साहित्य महोत्सव में अवधेश कुमार सिंह ने रामायण और मिथकों के संदर्भ में चर्चा करते हुए बोधिसत्व की एक कविता की बेहतरीन व्याख्या की। और मुझे इस अपराधबोध से गुजारा कि उनके साथ कुछ अलाना फलाना करते रहने के बावजूद मेरा ध्यान इस कविता की ओर पहले नहीं गया था।
बोधिसत्व अपनी कविता पर शायद ही कभी बात करते हैं। उनमें बाकी गुण-दोष लाख हों (और लाख से कम हैं भी नहीं) पर उनका यह गुण सीखने लायक है कि वे अपने लिखे के मोह से एकदम मुक्त हैं। वे हिन्दी के स्व-भाव के कवि हैं और टॉप के बतरसिया हैं। उनकी यह कविता बेहद सहज ढंग से, बिना फालतू मैनेरिज्म के, मिथकीय विस्मृति को विषय बनाती है और एक ग्रेंड नेरेटिव को प्रश्नांकित करती है सबआल्टर्न स्रोतों का सहारा लेते हुए। फ्रीदा काहलो के प्रसिद्ध वुंडेड डीयर को ट्रिब्यूट देता हुआ यह काम जोनाथन राबर्ट्स का है, फ्लिकर से साभार)
दशरथ की एक बेटी थी शान्ता
लोग बताते हैं
जब वह पैदा हुई
अयोध्या में अकाल पड़ा
बारह वर्षों तक…
धरती धूल हो गयी…!
चिन्तित राजा को सलाह दी गयी कि
उनकी पुत्री शान्ता ही अकाल का कारण है!
राजा दशरथ ने अकाल दूर करने के लिए
शृंगी ऋषि को पुत्री दान दे दी…
उसके बाद शान्ता
कभी नहीं आयी अयोध्या…
लोग बताते हैं
दशरथ उसे बुलाने से डरते थे…
बहुत दिनों तक सूना रहा अवध का आंगन
फिर उसी शान्ता के पति शृंगी ऋषि ने
दशरथ का पुत्रेष्टि यज्ञ कराया…
दशरथ चार पुत्रों के पिता बन गये…
संतति का अकाल मिट गया…
शान्ता राह देखती रही
अपने भाइयों की…
पर कोई नहीं गया उसे आनने
हाल जानने कभी
मर्यादा पुरुषोत्तम भी नहीं,
शायद वे भी रामराज्य में अकाल पड़ने से डरते थे
जबकि वन जाते समय
राम
शान्ता के आश्रम से होकर गुज़रे थे…
पर मिलने नहीं गये…
शान्ता जब तक रही
राह देखती रही भाइयों की
आएंगे राम-लखन
आएंगे भरत शत्रुघ्न
बिना बुलाये आने को
राजी नहीं थी शान्ता…
सती की कथा सुन चुकी थी बचपन में,
दशरथ से…!

यह कविता पढकर आज भी सिहरन हुई..पहले पढ़ा था तो भी सिहरन हुई थी.
दररसल, मिथकों की भी अपनी पालिटिक्स है, अपनी पक्षधरता है और अपने मानी हैं. यह यथार्थ के ‘जादूईपन’ और ‘फैंटेसी’ की ही तरह एक दुधारी तलवार है. चाहें तो मनुष्य/मनुष्यता का गला काटें और सीरियल बनाके माब हिस्टीरिया क्रियेट कर दें और चाहें तो वह महास्वप्न दे जाएँ कि कवियों की कई पीढियां जब लंबी कविता लिखें तो उसे याद करें.
इस कविता में राम राज्य के शोर-शराबे (नागपुर से रामलीला मैदान वाया रालेगन सिद्धि) के बीच जितने सब्लाइम तरीके से शांता के मिथक को उभारा गया है, वह अपनी अंतर्वस्तु में इतना कुछ कहता है, इतना जबरदस्त प्रतिआख्यान रचता है कि हज़ार बनारसी पुरोहितों के क्रान्ति यग्य के श्राप स्रोतों की आवाज़ उसके सामने मद्धम पड़ जाती है.
यह कविताई का दम है, कविताई की ताक़त, कविताई की प्रतिबद्धता जो कानों के नहीं मष्तिष्क के जले साफ़ करती है.
ओह मार्मिक ..शांता की कथा सुनी थी ..उसे इस नई द्रष्टि से पढ़ना मन भिगो गया
उदास करती प्रश्न करती कविता ..आपको बधाई गिरिराज !
बेहतर प्रस्तुति…एक बेहतर वक्तव्य के साथ…
गिरि भाई आभारी नहीं हूँ, खुश हूँ…आपकी जय हो