सारी दुनिया रंगा

सारी दुनिया रंगा – एक गायिका का नाम है, जैसा यह कविता भी कहती है. जितने हैरान आप हैं उतना ही मैं हुआ था जब मैंने पहली बार यह नाम सुना. इसमें ‘रंगा’ एक सरनेम है, एक उपजातिसूचक. मेरे शहर के सबसे सम्मानित शास्त्रीय गायक  मरहूम श्री मोतीलाल रंगा ने अपनी बेटी का यही नाम  रखा – सारी दुनिया. यह कविता इंडिया टुडे की युवा लेखन पर केंद्रित वार्षिकी में प्रकाशित हुई थी.

 

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जूते न हुई यात्राओं की कामना में चंचल हो उठते थे

हमने उन पर बरसों से पॉलिश नहीं की थी

धरती न हुई बारिशों की प्रतीक्षा में झुलसती थी

हमने उस पर सदियों से रिहाईश नहीं की थी

आग न बनी रोटियों की भावना में राख नहीं होती थी

हमने उसमें जन्मों से शव नहीं जलाये थे 

और यह सब बखान है उस शहर का जिसमें एक गायिका का नाम सारी दुनिया रंगा हो सकता था

9 विचार “सारी दुनिया रंगा&rdquo पर;

    • एक दृश्य है बचपन का एक अधेड़ आदमी मेरी पड़नानी (जीजा) से (गली में खड़े खड़े) मेरी मासी की बेटी (जो तब 7-8 साल की रही होगी) का हाथ अपने बेटे के लिये मांग रहा है और जीजा उसे बहुत प्यार से ‘कुत्तियोजी’, ‘कुत्तियोजी’ कह रही है – ये उस आदमी का नाम था। भालू की दुकान से परचून लाना भी याद है। मेरे शहर में, सारे हिन्दुस्तानी शहरों की तरह शायद, हैरान होने/न होने के लिये हरिया नही होना पड़ता।

  1. यह कविता लगातार साथ चलती है और अनायास छा जाती है और यह इतनी बार होता है कि उसके आंकडे झूठे लगते हैं ख़ुद को भी. कविता सतह पर उपलब्ध मुझ को झूठ कर देती है. और इसके इंडिया टुडे वाले ड्राफ्ट से तो ख़ासा गोपन सम्बन्ध था, है. इस प्रकाशन से कुछ इस तरह की भावनात्मक तक़लीफ़ हुई है कि अब इसे कुछ और दूसरे भी पढ़ लेंगे और यह कुछ कम मेरी हो जायेगी. इसकी खासियतें ‘बताकर’ नहीं बताईं जा सकतीं, ऐसा मानना रहा है. लेकिन जिसे भी यह पसंद है मैं उसे प्यार करता हूँ.

    • इंडिया टुडे वाला ड्रॉफ्ट ढूंढकर लगता हूँ – शेष सब तुम्हारा है, तुम्ही निपटो उससे। वैसे तुम्हारे कहे के यकीन पर ही वह ‘दूसरा’ ड्रॉफ्ट ढूंढ रहा हूँ; मुझे याद नहीं कब मैंने उसे बदला होगा।

  2. “सारी दुनिया रंगा – एक गायिका का नाम है, जैसा यह कविता भी कहती है. जितने हैरान आप हैं उतना ही मैं हुआ था जब मैंने पहली बार यह नाम सुना. इसमें ‘रंगा’ एक सरनेम है, एक उपजातिसूचक. मेरे शहर के सबसे सम्मानित शास्त्रीय गायक मरहूम श्री मोतीलाल रंगा ने अपनी बेटी का यही नाम रखा – सारी दुनिया.”

    मैं इस कविता के सन्दर्भ को अगर नहीं जानता तो क्या ज़्यादा अच्छा होता ? लेकिन यह भी है कि एक ख़ास बिंदु पर आदमी और कविता के बीच कुछ भी नहीं होता और वह समय, जब ऐसा हुआ था, हमेशा साथ रहता है – तब भी, जब वस्तुएँ (या क्या कहें उन्हें जो बीच में आती हैं) बीच में आने की कोशिशें कर रही होती हैं.

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