उसके मुहल्ले में

अनिरुद्ध उमट के लियेmadan-19-150x150

उसके जिस्म में उतरना अपनी संकरी गली से उसके लंबे चौड़े मुहल्ले में उतरना है

 

उसके जिस्म में कसाईबाड़े के आसपास के पूरे मुहल्ले की महक है

बकरियों और लटके हुए मुर्गों की भी

उसके जिस्म में पतंगों के नीले-पीले-काले रंग हैं

डफलियों की थाप है

मरम्मत के लिए आयी कुर्सियों की चरमराहट है

हुक्के की गुडगुड है

 

मैं उसे जिस भाषा में प्रेम करता हूँ

वह लिख कर मेरी अपनी नहीं रहती

वह मुझे जिस भाषा में प्रेम करती है

वह बोलकर उसकी अपनी नहीं रहती

बीच बीच में लुढ़कते हैं हम इस शहर की बोली में

 

भाषा के इधर उधर डोलते हुए

हम एक दूसरे को एक दूसरे के

कपड़े छूते हुए देखते हैं

 

दो

 

उसके ज़िस्म में दबी प्रार्थनाएँ मैं सुन या समझ नहीं पाता

मैं अपना ज़िस्म टटोलता हूँ

उसमें कहीं कोई प्रार्थना दबी हुई नहीं

 

“तुम्हारे ज़िस्म में पिछली नमाज़ की बुदबुदाहट है”

“काफ़िर जिसे सुन नहीं सकते”

 

वह मेरी इच्छाओं को कपडों की तरह पहन अपने को ढकती है

मैं उसके काफ़िर ज़िस्म में दबी प्रार्थनाओं में उतरता हूँ

 

तीन

 

उसका ज़िस्म फैलकर पूरा मुहल्ला हो जाता है

जिसमें

मैं अजनबी सैलूनों और पान की दुकानों में में हतप्रभ बच्चे सा घूमता हूँ

जिसमें

उसकी अम्मी अफ़सोस कर रही है मेरी डफली वे अब तलक ठीक नहीं कर पाई हैं

जिसमें

मैं उसके अब्बू की दुकान पर चाय पी रहा हूँ

                                                            वे मेरी जूठी गिलास धोना चाह रहे हैं

मैं टोंटी के नीचे गिलास धो रहा हूँ

                                                वे पैसे गुल्लक में रख रहे हैं

 

वे उन्हें बख्शी इज्ज़त से भौचक मेरी ओर देख रहे हैं

                                                मैं मुहल्ले से या शर्म से भागकर अपने कमरे में आ गिरता हूँ

 

वह अपना कुर्ता ठीक कर रही है

 

चार

 

उसके अब्बू मेरे घर के पास वाली गली में लगभग गुमशुदा से चल रहे हैं

उन्हें बरसों से कम दिखता है

उनसे अपनी चप्पलें भी खो गई हैं

वे नमाजियों से दूर छिटक आए हैं

 

(उसकी आँखों से आँसू शब्दों की तरह

मेरे कपड़ों या हाथों पर गिर रहे हैं)

 

वे उसी समय छत पर बने इस कमरे के नीचे से गुज़र रहे हैं

 

पाँच 

 

अब्बू ढपली के टांकों को आखिरी बार देख रहे हैं

अम्मी पिछली सर्दियों में देखे फूलों को किसी और के चद्दर पे काढ़ रही हैं

 

उनकी छत पर पतंगें उड़ा रहे लफंगों की टोली के बीच छुपकर बैठा

मैं बीयर पी रहा हूँ

 

साहिरा उससे पिछली रात खुले में नहा रही है

 

 

 

(चित्रः मदन मीणा/ प्रथम प्रकाशनः पूर्वग्रह 110)

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