टूटी हुई बिखरी हुई पढ़ाते हुए

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एक प्रतिनियुक्ति विशेषज्ञ की हैसियत से

(मानो उनके कवियों का कवि कहे जाने को चरितार्थ करते हुए)

लगभग तीस देहाती लड़कियों के सम्मुख

होते ही लगा शमशेर जितना अजनबी कोई और नहीं मेरे लिए

मैंने कहा कि उनकी कविता का देशकाल एक बच्चे का मन है

कि उनके मन का क्षेत्रफल पूरी सृष्टि के क्षेत्रफल जितना है

कि उनकी कविता एक ख़यालख़ाना है जिसके बाहर खड़े

वे उसे ऐसे देख रहे हैं जैसे यह देखना भी एक ख़याल हो

कि वे उम्मीद के अज़ाब को ऐसे लिखते हैं कि अज़ाब खुद उम्मीद हो जाता है

कि उनके यहां पाँच वस्तुओं की एक संज्ञा है और पाँच संज्ञाएँ एक ही वस्तु के लिए हैं

 

अपने सारे कहे से शर्मिन्दा

इन उक्तियों की गर्द से बने पर्दे के पीछे

कहीं लड़खड़ाकर गायब होते हुए मैंने पूछा

जब आपको कविता समझने में कोई परेशानी तो नहीं?

 

उनक जवाब मुझे कहीं बहुत दूर से आता हुआ सुनाई दिया

जब मैं जैसे तैसे कक्षा से बाहर आ चुका था और शमशेर से और दूर हो चुका था

 

(प्रथम प्रकाशनः वागर्थ 131, जून 2006)

टूटी हुई बिखरी हुई पढ़ाते हुए&rdquo पर एक विचार;

  1. असम्बद्धताओं को एकदूसरे के क़रीब लाकर नये मानवसंबंधों और मनुष्य और दूसरे तत्वों के बीच अभिनव रिश्तों की खोज गिरिराज किराडू की हरेक कविता में देखी जा सकती है. उनके यहाँ शिल्प के लिये जितने सतत प्रयत्न और बेचैन रतजगे हैं, वैसे ही संबंधों के नये डिज़ाइन के लिये भी.

    इसलिए उनकी कविता के साथ भी एक ताज़ा अंतर्क्रिया ही संभव है.

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