खोलो

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जिस दरवाज़े को हम बाहर से बंद समझते रहे वह अन्दर से बंद था

 

तब तक,

            तुमने अपने दूसरे बच्चे को भी अजन्मा मरते हुए देख लिया था

तब तक,

एक सूखे कुँए को पानी के अलावा जिस एकमात्र चमत्कार से आबाद किया          

जा सा सकता है वह हमारे शब्दों से वाष्पित हो चुका था

तब तक,

जासूसी कथा का वह संकेत जिससे हमें हत्यारे को पहचान सकना था

उससे हम एक दूसरी कथा के एक ऐसे व्यक्ति को पहचान चुके थे

जिसकी हत्या होनी थी

और

ऐसा तीन चार सैकिंड के इतने छोटे से समय में हुआ था जितने में

वर्षा की  बूँद पत्ती को गीला करने से ठीक पहले मुड़कर एक नज़र आसमान की ओर

देखती है और पन्द्रह साल पहले कोई पेशेवर ज्योतिषी तुम्हारी जन्मकुँडली में तुम्हारी

नहीं इन दो बच्चों की मृत्यु पढ़ता है

 

दरवाज़े को बाहर से खोलते हुए उस गंतव्य तक नहीं पहुँचा जा सकेगा जो

अन्दर से खोलते हुए तुम्हारी आँखों में अत्याचार के अन्तिम विवरण से आबाद होता

 

खोलो!

 

इस दरवाज़े को खोलो!

 

खोलो कि यहाँ इस रेगिस्तान में मैं प्रतीक्षा से नहीं प्यास से मर जाऊंगा

 

(चित्र:  हकु शाह/ प्रथम प्रकाशनः तद्भव 4)

2 विचार “खोलो&rdquo पर;

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