पाँच बत्ती चौराहा और राजमंदिर सिनेमा

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यह बचाव तो बिल्कुल शुरू में ही करना होगा कि सभी पात्र और घटनाएँ काल्पनिक हैं

एक दिन अचानक पाँच बत्ती चौराहा जयपुर के ठीक ऊपर के आसमान में एक तारा देखते हैं

और पाते हैं वही एक दृश्यमान है जहाँ तक जाती है नज़र

 

इतनी देर में दृश्य, नीचे भी, बदल जाता है

 

यह एक खुली प्रदर्शनी है अब और बहुत ठंडे माहौल में कोई सिखा रहा है कि हाथ इस तरह

काटा जाए कि खून की बूँद ज़मीन पर नहीं आसमान में गिरे या अँधा करने की ख़ुद को या

दूसरों को विधि ये है कि आप लगातार स्वयं ही को दृश्य बनाये रखें

 

उधर बाँयी ओर राजमंदिर सिनेमा के सामने एक वेश्या से टकरा रहे दो आवारागर्दों को

देखिये वे उसे ऐसे पुकारेंगे कि थोड़ी ही देर में आप एक प्रेम-कविता जैसा कुछ सुनाने लगेंगे

 

अब इसका क्या करें कि पाँच बत्ती चौराहा और राजमंदिर सिनेमा काल्पनिक हो ही नहीं पा रहे

(प्रथम प्रकाशनः पूर्वग्रह 114)

4 विचार “पाँच बत्ती चौराहा और राजमंदिर सिनेमा&rdquo पर;

  1. जॉन बर्जर अपने एक निबंध ‘सेवन लेवल्स ऑफ़ डिस्पेयर’ में कहते हैं, ‘विषाद के सात स्तर होते हैं – सप्ताह के हर एक दिन के लिए एक’. इन स्तरों का आरोह-अवरोह वे शायद बताना भूल गए; या मैं ही समझ न पाया ऐसा भी कहा जा सकता है. यह कविता न पढ़ी होती, तो मुमकिन है, कभी भी समझ नहीं पाता.
    शुक्रिया!

  2. शुक्रिया. विषाद का कोई पहर भी होता है शायद. हर पहर का एक विषाद.
    बर्जर का विषाद जिस कुछ अधिक साहसी की उम्मीद करता है (जिसके पास प्रतिरोध का एकमात्र मार्ग है, स्वयं का उत्सर्ग). मुझे अहसास है मेरा विषाद उधर नहीं जाता. एक अनहुए “आतंकवादी” का विषाद?

  3. या हो चुके “शक्तिमानों” का महाविषाद?🙂
    हरगिज़ नहीं! कवि के विषाद का गुणात्मक विवेचन करने का इरादा हरगिज़ नहीं था.बर्जरीय विषाद पर बहस फिर कभी; जैसा अंग्रेजी वाले कहते हैं ‘सेव इट फॉर लेटर’! फिलवक़्त इस अद्वितीय कविता के लिए बधाई स्वीकार करें.

  4. मुझे उस “खुली प्रदर्शनी” का भान शायद है। राजमंदिर से सटे हुए सिल्वर स्क्वायर मॉल के बराबर हमारा दफ़्तर हुआ करता था जहाँ मेरी सीए की ट्रेनिंग शुरु हुई थी।

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