अभिनयः दस कथाएँ

यह कविताएँ आलोचना के नवीनतम अंक (३३/अप्रैल-जून, २००९) में प्रकाशित हुई हैं. इन पर आरंभिक, प्रकाशन-पूर्व टिप्पणियों, प्रतिक्रियाओं के लिए मैं देवयानी, प्रभात, कुंतल कपूर और प्रज्ञा का शुक्रगुज़ार हूँ.DSC05509

1

बहुत मुद्दत नहीं हुई है

अभी अभी हुआ है ये

कि मैं मर गया

मंच के एक कोने में

और किसी को याद नहीं मैं क्या कहता था सब चीजों के बारे में, जैसे कि यही कि वे क्या करें मेरे शव के साथ,वे कुछ देर सोचते हैं जला देने के बारे में फिर दफ़नाना आसान लगता है उन्हें चील कुत्तों को हवाले कर देने के बारे में किसी की राय सुनी नहीं जा रही कोई कह रहा है कवि परोपकारी होते हैं उनका शव मानवता के काम आना चाहिये इसे सरकार को दे देते हैं एक कोई दूसरा हँसी रोक नहीं पा रहा हाँ  यह तो पता चल ही जायेगा कौनसा कीड़ा काटने पर इस कदर फिजूल हो जाते हैं जो करना है जल्दी करो सबकी राय बनती है

मरणोपरांत मुझे याद आती है एक दोपहर जब कोई वजह नहीं थी मैं इस कदर रोने लग जाऊँ सिर्फ यही देखकर कि मैं किसी तरह कुछ हूँ एक चलती फिरती मुसीबत और मेरे बस में कुछ भी नहीं अपना यह किसी तरह इस पृथ्वी पर होना तो बिल्कुल नहीं कि हर साँस जितना मेरे होने का एक इशारा है उतना ही मेरे यहाँ न रहने  का वारंट और ऊपर से यह पचास डिग्री पार करती गर्मी, यह मरजानी धूल आँखों में कपड़ों में हर जगह घुस आ रही और यह कमबख्त काम सुबह से मारा मारा फिर रहा हूँ यहाँ से वहाँ– सुनो दोस्तो मैं अभी, इसी दोपहर लिख कर रख देता हूँ कि याद रहेः

मेरा अंतिम संस्कार आकाश में करना

 

2

 

तुम कभी उसे दुख कहोगी, कभी प्रेम कभी झूठ यही अभिनय है तुम्हारा यही मेरी लिखत

लेकिन झूठ, प्रेम या दुख, वह हमेशा एक लिखावट रहेगा तुम्हारे बयान में

जो बिल्कुल खाली कागज हो उस पर पहली लिखावट इतनी गहरी खुद जाती है कि कागज कागज नहीं रहता लिखावट हो जाता है, यह तुमने एक कवि से कहा जबकि तुम्हें कभी पसंद नहीं रहे कवि और वह कवि भी थक ही चुका था अपने कवि होने से. पसंद तो तुम्हें लेखन भी नहीं रहा और फिर भी अपने पूरे जीवन को तुम समझती रही सिर्फ एक लिखावट!

 

3

शादी और शोक के बीच एक दृश्य कहीं खो गया है

यह जानता है वह जो अभिनेता नहीं है प्रेम में

एक शाम या एक प्रेम के हैंगओवर में

हवाले कर दोगे जिसे तुम काव्यमय मृत्यु के

 

तुम लिखते हो और लोग पा लेते हैं

अनचाही मौत हास्यास्पद वीरगति

 

किंतु वह दृश्य

शादी और शोक के बीच कहीं था

वो कहाँ खो गया है?

वह खिलेगा उसके बेमन मरने के अभिनय में जिसके साथ छल किया था कहा था तुम्हीं नायक हो

और छोड दिया कथा में अनचाही मौत के लिये, हास्यास्पद वीरगति के लिये  

पर तुम नहीं देख पाओगे उसे खिलते हुए

 

तुम तब अंधेरे में

अपना मेकअप खुरच रहे होओगे

 

 

4

मैं बहुत, नहीं, क्या कहते हैं उसे शुद्ध हिन्दी में, हाँ, धाराप्रवाह झूठ बोलती हूँ झूठ बोला कि पापा मरे नहीं और इसलिए कभी रोई नहीं

झूठ बोला सबसे मैं कोई एक्टर-वैक्टर नहीं और बार-बार करती रही कई अभिनय – एक बार बनी शहज़ादी और पूछा अपने बाप से

आप क्यूं हुकूमत करते हैं इस दुनिया पर और मेरे दिल पर

एक बूढे अंकल बने थे बादशाह, रोने लगे, बोले मैं तो डरता हूँ तुमसे, उमा

मैंने कहा अंकल सॉरी क्या करूँ यही स्क्रिप्ट है  पर मैं तो सचमुच चाहती हूँ कोई हुकूमत करे मुझ पर आप करेंगे आप बनेंगे मेरे पापा सच में?

 5

सब कह रहे थे तुमसे नहीं होगा पर मुझे बात समझ में आ ही नहीं रही थी बैगी ग्रीन पैंट पीला शर्ट खुले बटन हाथ में चाकू गले में रंगबिरंगा रूमाल टीचर जो सब कुछ थी प्राम्पटर डरेक्टर बहुत संकोच से कई बार कह चुकी थी कुछ और कर लो ना तुम अपनी शकल तो देखो जाने से पहले उनकी ही ओर देखा था कि अचानक बहुत से लोग बहुत सी हंसी पूरा भरा हुआ हॉल मैं स्टेज पर थी सब कुछ ठीक था पैंट बैगी थी ग्रीन थी शर्ट पीला था बटन खुले थे रूमाल था गले में रंगबिरंगा चाकू था बड़ा सा फोल्डिंग मुझे उसे खोलना था लहरा के बस एक लाईन बोलनी थी अपन से पंगा नई लेने का अपने पास रामपुरी है तय था आज ऑडियेंस की ओर देखकर ही बोलूंगी पर हाथ ठंडे हो गये सामने थी प्रिंसिपल सिस्टर और सर्द हो रहे जल्दबाज हाथों ने उनके सामने ही लहरा दिया चाकू इतने घनघोर ठहाके तूफान की तरह टकराये मुझसे कि  उखाड़कर मंच से फेंक दिया याद नहीं मेरे मुँह से कोई शब्द निकला था कि नहीं….

अगले साल सब दोस्त कुछ न कुछ बनी घूम रही थीं और जो रानी थी वह तो उड़ती सी मालूम होती थी अब किसी को उसके सिर पे पँखा भी झलना ही होगा कोई और यह मौका न हथिया ले सो मैंने तुरंत कहा यह मैं करूंगी माँ की सबसे सुंदर साड़ी रानी की साड़ी से तो कहीं ज्यादा सुंदर साड़ी पहने ग्यारह बारह साल की एक छवि में वहाँ खड़ी हूँ मैं बहुत इत्मीनान से इससे बेहतर मैंने कभी नहीं किया

दरअसल फिर कभी मैं स्टेज पर गयी ही नहीं कुछ ऐेसा हुआ कि हॉल को ही स्टेज मानने लगी और यही सबसे मुश्किल काम निकला – दर्शक का अभिनय करना, यह ठीक से जानना कि ठहाका कब नहीं लगाना चाहिये

 6

कुछ ऐसी हो चली थी संसार की गति कि मेरी भाषा में सिर्फ़ अभिनय ही संभव रह गया था वे कह भी रहे थे कोई और ही चाल चलने लगी है मेरी भाषा मैंने भी लगभग मान ही लिया था कि अब कोई और ही चाल चलनी होगी साँस लेने के लिये कि तभी पर्दा गिरा और मैं खामुशी के रंगमंच पर वैसे लेट गया जैसे प्यास के पहाड़ पर लेट गये होते शमशेर

 7

कथा में कत्ल इतने हुए, कातिल होने का शक या वो सूई जो शक की होती है इतने लोगों पर गयी कि सब किरदार कातिल नज़र आने लगे लिखने वाले के लिये यह बेहद खुशी की बात थी कि सूई उस पर भी आई उसने कहा दोस्तो इस किस्से में सब के पास कत्ल करने की वजह है, एलीबाई किसी के पास नहीं, सुबूत सबके खिलाफ़ हैं पर कोई है जो कातिल का ही अभिनय करना चाहता है क्यों न उसे यह करने दिया जाय  सच में कत्ल किसने किये, किसी एक ने कि सबने इससे क्या फर्क पड़ता है किस्से में सच तो यूं भी लिखने वाले का लिखा ही होता है और दोस्तो ऐसा  मौका बार बार कहाँ आता है कोई सिर्फ़ इसलिये सज़ा पाना चाहे कि उसे सज़ा पाने का अभिनय अच्छा लगता है

जिसे यह अभिनय करना था उसने कहा अपना अभिनय इतना अच्छा करता हूँ कि हूबहू लगता हूँ 

8

मगध काशी नहीं

काशी मगध नहीं

मगध को काशी काशी को मगध होना है

जिसने खड़िया से लिखा था अपना नाम पूछता रहता था वह कौन है उसे काशी में काशी का मगध में मगध का नहीं होना है

मगध में काशी में उसे हर जगह रोना है

 9

 तुमसे मिलकर ही जाऊंगा इस नगर से

यहाँ कोई मार्ग तुम्हारे घर तक नहीं आता कोई हवा तुम्हारा पता नहीं जानती किसी वृक्ष ने कभी नहीं देखा तुम्हें यहाँ के आकाश में तुम्हारा अक्स नहीं यहाँ की धरती पर नहीं तुम्हारे पदचिन्हों की हैरानी तुम्हारी आवाज़ नहीं सुनी किसी वीराने ने

सच कहो, कोई अभिनय तो नहीं कर रहा तुम्हारा यह नगर?

 10

बारिश के आसार हैं

 मरूस्थल खुशहाली के भूले हुए कोट से धूल झाड़ रहा है

बहुत हरा होने के संवाद याद कर रहा है

एक एक मुद्रा अंग अंग में लौटा रहा है

 

उम्मीद का अभिनय तो बहुत किया है

अभिनय को उम्मीद बनाने की कला खुद को सिखा रहा है        

 

 

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