मेरी पुरस्कृत कविता

कल भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार समारोह था. यह किसी भी भाषा में अपनी तरह का अनूठा पुरस्कार है. यतीन्द्र जैसा पुराना मित्र-सम्पादक और इधर के दो प्रिय कवि गीत चतुर्वेदी और मनोज कुमार झा इस वर्ष पुरस्कृत होने वालों में थे इसलिये भी इस वर्ष के आयोजन के बारे में कुछ अच्छे अच्छे खयाल आते रहे.  

मुझे पहली बार प्रकाशित होते ही यह पुरस्कार मिल गया था, अब यह बहुत ‘अवास्तव’ लगता है. जिस कविता के लिये मिला वह कविता शुरू में खुद ही कई बार पढ़ी, देखूं तो इसमें क्या है भला (हालांकि इधर के सालों में उससे एक तरह की दूरी बन गई है); जिन लोगों से प्रतिक्रिया मिली उनमें  बिज्जी (विजयदान देथा) और वरिष्ठ कवि राजेश जोशी की इस बात ने बहुत चौंकाया कि इसमें कहीं लोक-कथा की संरचना/सिंहासन बत्तीसी की स्मृति है, आज यहाँ पोस्ट करते हुए फिर पढ़ रहा हूँ तो बार-बार लग रहा है किस घामड़ ने लिखी थी? मैं तब, 2000 में,  24-25 बरस का था. तो लीजिये, पेश है ‘मेरी’ पुरस्कृत कविता. वैसे यह याद रहे कि आज ग्यारह सितंबर है. ऐसा लगता है मेरा हिन्दी-जीवन भी इस घटना जितना पुराना हो चुका है!

 

मेज़ इतनी पुरानी थी कि उसका कोई वर्तमान नहीं था

हमारे बच्चे इतने नये थे कि उनका कोई अतीत नहीं था

 

बच्चों का अतीत हमारे पाप में छुपा था

मेज़ का वर्तमान किसमें था?

 

मेज़ का चौथा पाया तीन पीढ़ियों से गायब है

इससे तीन कथाएँ निकलती हैं

एक में चौथा पाया चिता की लकडी बन जाता है

दूसरी में वो अपने किसी जुड़वाँ को ढूँढने पूजा के समय घर छोड़ देता है

तीसरी में वो हम सबकी सबसे पुरानी तस्वीर का फ्रेम बन जाता है

चौथी कथा भी तीन पीढ़ियों से गायब है

 

हम में से अधिकांश नहीं जानते वे चौथी कथा के पात्र हैं 

चौथा पाया किसी अदृश्य स्क्रीन पर चौथी कथा रच रहा है

 

शेष तीनों पाये धीरे धीरे हिल रहे हैं

 

(प्रथम प्रकाशनः बहुवचन प्रवेशांक)

मेरी पुरस्कृत कविता&rdquo पर एक विचार;

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