साहित्य में मेरे सबसे बड़े दुश्मन की किताब

मैंने कहानियाँ चार-पाँच लिखी थीं कभी। एक प्रकाशित हो गयी लेकिन पढ़ी नहीं गई जिसका एक कारण यह भी था कि वह मैंने पीयूष दईया के कहने पर मधुमती जैसी पत्रिका को दे दी। एक कहानी मेरे और कुणाल सिंह के बीच भटकर कर खो गई। दो बरसों से पड़ी हैं। फिर शायद 2004 या 5 में एक कहानी मैंने अंग्रेजी में लिखी और खासे घामड़ तरीके से उसे मनीषा कुलश्रेष्ठ को दे दिया जिनके मार्फत वह एक अंग्रेजी वेबसाईट पर  प्रकाशित हो गई।उस कहानी का शीर्षक खासा ब्लसफेमस थाः मर्डर ऑफ मार्क्स। कुछ बरस बाद मैंने उस कहानी को हिन्दी में दुबारा, उसी शीर्षक के साथ, लिखा और हिन्दी में गौरीनाथ ने उसे बया में प्रकाशित किया। इसी दौरान मैंने एक और कहानी लिखी जो वाक् के चौथे अंक में सुधीश पचौरी ने प्रकाशित कीः साहित्य में मेरे सबसे बड़े दुश्मन की किताब। इन दिनों उसका सीक्वल चल रहा है, वो दो पुरानी वाली वैसे ही पड़ी हैं, जो खो गई उसके मिलने के आसार नहीं है और बाणभट्ट की बिल्लियाँ जैसे धाँसू शीर्षक के बावजूद एक कहानी डेढ़ पेज से आगे नहीं जा रही.

अब जबकि यह किताब महज कविताओं की नहीं रह जाने वाली है,  पेश-ए-खिदमत है, साहित्य में मेरे सबसे बड़े दुश्मन की किताब.

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मेरे चाचा एम. बी. नागर और उनकी शरीक-ए-हयात ऑड्रे हेपबर्न के लिए 

(जैसा कि मूल उपन्यास में है)

मूल कहानी : सुलेमान भाटी द्वारा लिखित मुक़द्दस कत्ल जो हेमू नागर उर्फ़ सुरेन्द्र प्रकाश शर्मा के के.के.के. पे आधारित थी

रूपांतरण: गिरिराज किराडू

 

किताब और उसके किरदारों जितना ही खुश और उदास कृष्णा को खुद किताब के उसकी ज़िंदगी में आने की दास्तान करती थी। किताब एक मेहमान की थी, जो एक शाम देर से आया और सुबह लगभग बेनाम ही चला गया, जिसने शायद जानबूझकर किताब टेबल पे छोड़ दी थी, और शायद और भी जानबूझकर, सिर्फ उसी के लिए। कृष्णा अक्सर उस सुबह का खाका खींचने की कोशिश करती : कप और ट्रे लेने के लिए कमरे में लौट रही है कि जैसे बिल्कुल आख़िरी मौक़े पे वो किताब को वहीं छोड़ देने का फैसला करता है। मानो उसे पता हो कि वह किताब लौटाने के लिए भागी भागी उसके पीछे नहीं आयेगी, मानो उसे पता हो कि यही वह इकलौती लडकी है इस पूरी कायनात में जो मेहमानों की भूली हुई चीज़ें लौटाना जरूरी नहीं समझती!

‘आप कोई किताब कहीं भूल जाये तो वह आपको वापिस नहीं मिलनी चाहिए और अगर आपको भूली हुई किताब मिल जाये तो उसे वापिस नहीं करना चाहिए।’ (कृष्णा के उस उपन्यास के मुख पर अंकित जिसका लिखा जाना इस घटना से बहुत दूर नहीं)

खैर, एक ने किताब जानबूझकर ऐसे छोड़ दी मानो सचमुच भूल गया हो और दूसरे ने यूँ उठा ली मानो कोई उसी के लिए भूल गया हो।

लड़की के बारे में मेहमान का तीर ठीक लगा, लेकिन किताब?  

‘एक हफ्ते पहले के दस्तखत हैं इसपे और हफ्ते भर में ही थक गया किताब से!’ – कृष्णा ने सोचा। चाहती तो वो किताब के मालिक का नाम पता कर सकती थी लेकिन दस्तखत की इज्ज़त  रखते  हुए उसने कोशिश भी नहीं की।ये किताब एक दिन लड़की को भी थका देगी। लेकिन थका तो किताबें देती ही हैं- एक हफ्ते में या  एक उम्र में।

 

मेहमान मनोहर बलदेव नागर था – एक सेल्समैन और कृष्णा के उठाने से एक हफ्ता पहले किताब पे दस्तखत करने वाला वो नहीं था। मनोहर को तो सारी किताबें थका देती थीं और खासकर वो जिन्हें वह बेच नहीं पता था। और इसीलिए, लाजिमी ही, कविता की सारी किताबें। उसे कविता की किताबों, कविता और कवियों से नफरत थी। इतनी कि उसने उस किताब को  – एक बेहद , महान कवि द्वारा दी गयी एक दुर्लभ भेंट को- किसी दोस्त के रिश्तेदार के घर छोड़ दिया, जहाँ वो कभी नहीं लौटेगा और वो भी एक ऐसी लड़की के लिए जिसे देखते ही उसे उतनी नफरत हुई जितना मज़ा उसे तब आता था जब कथाकार उसकी कमाई बढ़ा देते थे ।

इससे एक हफ्ते पहले एम.बी.नागर, सेल्स ऎंड मार्केटिंग, एक बेहद महान कवि के सामने बैठा था। कवि यानि भारी, बनावटी आवाज़ में बोलने वाला एक पागल बूढा जो उसकी कम्पनी का सबसे ज्यादा सम्मानित लेखक था। वह उसके लिए एक खास पार्सल लेकर आया था जैसा कि दो साल की इस नौकरी में कई बार कर चुका था। कवि उस दिन भयंकर मूड में था – बेहद कोमल, बेहद फिक्रमंद, लगभग वालिदाना। बडे ध्यान से उसने अपनी कमबख्त शेल्फों से एक किताब निकाली और उस पे दस्तखत किये। देते वक़्त उसकी आँखें नम हो गयीं , ‘मैं तुम्हे साहित्य में मेरे सबसे बडे दुश्मन की किताब भेंट कर रहा हूँ; अब वो नहीं रहा, लेकिन उसकी कविता को मैं अपने जीवन से ज्यादा प्यार करता हूँ खासकर सर्वोच्च कविता और प्रतिभा की ये एक किताब। उस नौजवान को जिससे हर मुलाक़ात मझे भविष्य को लेकर उतनी उम्मीद देती है जितनी कभी मेरे पास नहीं रही।’

किताब पर सिर्फ़ इतना : ” २५ दिसम्बर १९९८” और ना पढे जा सकने लायक दस्तखत।

किताबों के बारे में एम.बी.नागर की राय अक्सर पेशेवर आलोचकों से ज्यादा भरोसेमंद होती थी। एक, उसकी राय शायद ही कभी बदलती थी- चाहे किताब को बड़ा पुरस्कार मिल जाये या अगला संस्करण आते-आते क्लैसिक ही क्यों न बन जाये या बनादी जाये। दो, बिना पूरी या ज्यादातर किताब पढे वो उस पे राय नहीं बनाता था और ये गारंटी पेशेवरों के बारे में नहीं दी जा सकती। इसी बूढे, फिक्रमंद, पागल और बेहद महान कवि ने मनोहर को  एक बार ऐसे आलोचक के बारे में बताया था जो किताबों का फैसला उन्हें सूंघकर करता था। और फ़ैसला वह तकरीबन सारे पुरस्कारों का भी करता था लिहाजा उसकी नाक को प्रकाशन और साहित्यिक सौंदर्यशास्त्र में कई क्रांतियाँ लाने का श्रेय गया। खैर, एम.बी.नागर ने वो किताब जो उस अनजान लड़की कृष्णा (जिससे उसे उतनी नफरत थी जितनी कथाकारों के बख्शीश बढ़ाने से मुहब्बत) का कायाकल्प  कर देगी (मैंने आपको ये पहले बताया कि नहीं ?) किसी जगह गिरा दी यह बात अपने आप में किताब के बारे में उसकी राय है। क्या थी उसकी राय कविता की उस किताब के बारे में जो एक बूढे पागल कवि ने उसे भेंट की  थी और उस बूढे पागल कवि के साहित्य में सबसे बडे दुश्मन ने लिखी थी?

शिमला से पंजाब के एक छोटे-से तीर्थ चिंतपूर्णी जाते हुए मनोहर ने किताब के पन्नों पे नज़र डाली, दो चीजें उसे किताब की ओर खींच रही थीं – उस बूढे आदमी की नम आँखें जिससे वो दो साल से मिल रहा था और किताब का नाम। यह एक प्राचीन भारतीय नगर का नाम था।

चिंतपूर्णी से निकलने  तक उसकी राय ठोस शक्ल ले चुकी थी:

(1) हालांकि यह कविता की किताब है, इसमे कहानियाँ बहुत हैं। यह एक घातक दोष है।

(२) यह एक महान और खतरनाक किताब है।

(३) यह किताब कविता और कवियों के लिए मेरी नफरत को साबित भी करती है और जायज़ भी ठहराती है क्योंकि कवि जिन्दगी में अजीबोगरीब फैसले लेकर आम लोगों का मजाक उडाते हैं; क्योंकि वे वैसा नहीं करते जैसा लोग उनसे चाहते हैं, क्योकि वे कविता लिखते हैं जबकि वो बिकती नहीं, जबकि वे कहानियाँ भी दूसरों से बेहतर लिख सकते हैं, क्योंकि वे एक ‘प्राचीन भारतीय नगर/साम्राज्य के षड्यंत्रों’ जैसे बेस्टसेलर कच्चे माल को कविता में बदल देते हैं, क्योंकि वे पैसा नहीं बनाते, जबकि बहुत आसानी से ऐसा कर सकते हैं।

बेहद महान कवि को भारत का कुछ, शायद भारत का नेरुदा (या कहीं हिन्दी का नेरुदा तो नहीं?) या ऐसा ही कुछ कहा जाता था और उसकी मृत्यु हायडलबर्ग में २०१६ में हुई जहाँ वह मध्यकालीन कविता पर व्याख्यान देने गया था । मनोहर ने २००४ में अपने आपको मैकलिओड्गंज में दलाई लामा के मंत्रालय की दूसरी मंजिल से नीचे फेंक दिया। कृष्णा एक बहुत बड़ी कथाकार बनने (२०४७ में ज्ञानपीठ इसका पर्याप्त सबूत होना चाहिए ) के बाद २०५७ में हृदय की लंबी बीमारी से चल बसी।

लेकिन, रुको, क्या हम इस कहानी में भविष्य कह सकते हैं?

नहीं।

तो, क्या हम इन तफ़्सीलों  को यहाँ से हटा दें?

नहीं।

एम.बी.नागर से मिलने से पहले ऑड्रे=एड्डा हेपबर्न रतनगढ़ के एक प्राकृतिक चिकित्साशास्त्री की विवाहिता थी। २१ की उम्र में उसे इतनी भारी एक शै से प्यार हो गया जिसे संभालना उसके बस का नहीं था: भारत। ये पूरे राजस्थान में विश्व-प्रसिद्ध है कि उसे एड्स से उसके पति डाक्टर संजय दत्त ने उबारा था जो राजस्थान के दूसरे सबसे बडे गौरव थे (पहले तो तमाम इतिहासकारों के बावजूद महाराणा प्रताप ही थे )। उनकी शादी जो पहले हिन्दू रंग-ढंग से रतनगढ़ में और बाद में ईसाई तौर-तरीकों से बेल्जियम के उतने ही छोटे,दूरदराज़ कस्बे में स्थानीय नागरिकों के उत्साह और स्थानीय मीडिया के जोश के बीच हुई, सिर्फ अठारह महीने चली। जब मैकलिओड्गंज में एम .बी एड्डा से पहली बार मिला तब एड्डा धर्म-परिवर्तन के कगार पे थी। लेकिन जैसा नियति को मंजूर था, फिर से एक हिन्दू पुरुष ही उसे वैवाहिक सुख, और निर्वाण की जगह आनंद की असमाप्य वासना की दुनिया में खींच लाया। इस बार कोई धार्मिक कर्मकांड नहीं हुए .

और दोनो के लिए ही ये एक असहनीय हद तक सेकुलर शादी साबित हुई- पुरोहितों की जगह नवम्बर की ठंडी अँधेरी रात में नाचते हुए कुछ आधे-हिप्पी और दो धर्मभ्रष्ट लामा। शादी के फोटो देखने वालों को लगता है कि जोड़े से ज्यादा खुश पुरोहित हो रहे हैं। इन पुरोहितों में एक रूसी लड़की को छोड़कर बाक़ी सब २०१० में ज़मीन दरकने के एक हादसे में मारे गए । और उन सब में वो रूसी लड़की ही थी जो नेरुदा नाम के एक रूमानी लड़के के बारे में जानती थी जिसने किसी बहुत पुराने ज़माने में बड़ी ज़बरदस्त ‘इरोटिक’ कविता लिखी थी। लेकिन यह बात हमारे किसी ख़ास काम की नहीं  । वो हिन्दी के नेरुदा को जानती थी और एम.बी की ज़िंदगी में उसकी भूमिका को भी। ये बात काम की है ।

रूसी लड़की मारिया शारापोवा से एक लम्बी पूछताछ कानपुर के किंग एडवर्ड मेमोरियल रोड थाने में तैनात सब इंसपेक्टर हेमू नागर ने ठेठ जैसलमेर आके की थी। पूछताछ ने आखिरकार साबित कर दिया कि एम.बी ने खुदकुशी की थी, उसका क़त्ल नहीं हुआ था। इस नतीजे ने हेमू में एक खलिश छोड़ दी, मारिया को मैकलिओड्गंज लौटकर फिर से शादियां कराने का शगल चालू करने का मौका दे दिया और एड्डा में भर दी पहले से कहीं ज्यादा गहरी वासना निर्वाण के लिए। लेकिन जैसा कि बाद में पता चला, इसी पूछताछ ने हेमू को उसकी पहली जासूसी कहानी लिखने के लिए कच्चा माल मुहैया कराया। इस कहानी में दो कवि प्रकाशकों के खिलाफ षडयंत्र करते हैं और सिलसिलेवार उनकी हत्या कर डालते हैं।

लेकिन हेमू ने और भी कुछ सीखा, कुछ ऐसा जो ख़ुद उसका कायाकल्प कर देगा: हत्या कहानी में ही अधिक पूर्ण करती है, हत्यारे और जासूस दोनों को। 

 

 नेरूदा की प्रेम कवितायें, वो बहुत पुराने जमाने की ज़बरदस्त इरोटिक कविता, पढ़ते हुए भी ऐसी ही किसी चीज़ से सामना होता है: प्रेम भी कविता में ही अधिक पूर्ण करता है, प्रेमियों और कवि दोनों को । प्रेम-कविता में अक्सर ऐसा नहीं होता। लेकिन जासूसी लेखन में बराबर होता रहता है।

अगर एम.बी.नागर इस किस्म की चीजों को समझने वाला बन्दा होता उसकी ज़िंदगी बहुत आसान गुजरती और उसकी कहानी तर्क से समझी जा सकती। खुशकिस्मती से वो ऐसा नहीं था।  

१०

 हेमू नागर उर्फ़ सुरेन्द्र प्रकाश शर्मा सबसे बडे बेस्टसेलर लेख़क बन गए। २०५६ में एक हवाई हादसे में स्वर्ग सिधारने से पहले किसी भी जिंदा या मुर्दा हिन्दी लेख़क से ज्यादा किताबें उनकी बिक चुकी थीं, कवियों की तो जाने ही दीजिए। हिन्दी साहित्य को एम.बी.नागर का योगदान गज़ब का है, उसने हिन्दी के दो ‘बड़े ‘ उपन्यासकारों को जन्म दिया: कृष्णा वर्मा और सुरेन्द्र प्रकाश शर्मा। दो सहोदर जिन्होंने एक दूसरे को कभी देखा ना पढा। एस.पी.एस के पहले मास्टरपीस कातिल कवियों की कहानी को हिन्दी के नेरुदाओं और कृष्णा वर्माओं ने कभी नहीं पढा, खुद उनके मास्टरपीस एस.पी.एस.की नज़रों के सामने भी नहीं पड़े। हालांकि के.के.के. ऐसा सनसनीखेज़ हिट हुआ कि हिन्दी के लेखक संगठनों ने सरेआम उसका विरोध किया और गुपचुप उस पर प्रतिबंध लगवाने के लिए लाबिंग की। एस.पी.एस. पे तो खैर क्या फर्क पड़ना था, उनहोंने अपने ‘गंभीर’ बिरादरानों का शुक्रिया अदा किया और के.के.के.का सीक्वल लिखने में जुट गए।  

११

सुबह के करीब सात बजे थे।कप, ट्रे, फर्श, परदे, और उसके हाथ में थमी किताब – मनोहर को आस-पास की हरेक चीज़ की पेशेवराना साफ-सफ़ाई से चिढ हो रही थी, और इससे बचने के लिए वो खिड़की के बाहर देखने लगा। बाहर उसका सामना कविता से हुआ, साक्षात्, एक लड़की के रूप में। उसकी चाल में, रंग-ढंग में, नज़रें घुमाने में कुछ था जो शर्तिया शायराना था। जैसे ही वो हाथी की तरह मदमस्त झूमते हुए कमरे की ओर बढ़ी, मनोहर के भीतर सारी नफरत कहीं एक जगह आ गयी । किताब पर हाथ की जकड़न बढ़ती गई और लड़की के कमरे में घुसने के कोई चालीस सेकिंड पहले मनोहर ने किताब को टेबल पर गिर जाने दिया और तेजी से कमरे से बाहर निकल गया। जो तमाम चीज़ें उससे कमरे में छूटी, उनमें एक इस किताब को छोड़ सबको वो भूल गया। और यकीन मानिये, मनोहर को उस सुबह ही पता था कि किताब उस हाथी जैसी झूमती कविता को जेट-रफ्तार गद्य में बदल देगी।

१२

कृष्णा वर्मा के पहले मास्टरपीस ने घट-घट में बसे प्राचीन भारतीय इतिहास को हिन्दी साहित्य में लगभग नदारद रहते आए विज्ञान गल्प से मिला दिया। नतीजे चमत्कारी रहे। बी.टेक. सैकिण्ड इयर की एक सुस्त छात्रा हिन्दी कथा लेखन की सबसे तेज धाविका बन गई. बरसों बाद, नथुनों में ज्ञानपीठ घोषणा की ताजा ताजा गंध लिए, कृष्णा  को उस सुबह की खुशबू याद आयी जब एक युवा मेहमान किसी परदेसी पागलपन में तेजी से उसके घर से बाहर निकल  गया था. कृष्णा ने अंग्रेजी में कहा, “थैंक यू, थैंक यू फॉर एवरीथिंग, रादर वन थिंग: फॉरगेटिंग ए बुक एट ए राइट प्लेस.” और उस दिन कृष्णा वर्मा ने निश्चय कर लिया कि वह अपना रहस्य सबको बता देगी. उसने अपना पुरस्कार एम.बी. को गल्प के सरंक्षक देव – सुपरकंप्यूटर मगध- का दूत बताते हुए उसकी ‘अनाम याद’ को समर्पित किया. मैं आपको बताना भूल गया इंडिया की हिन्दी-अंग्रेजी बोलने वाली दुनिया के पास २०४७ तक खुद अपना एक पेट्रन गॉड ऑफ फिक्शन था जिसका आविष्कार कृष्ण वर्मा ने अपने पहले उपन्यास मगध मेट्रिक्स और बेशर्म फरिश्ते (२००३) में किया था.

१३

सब इंस्पेक्टर से जासूसी उपन्यासकार बने हेमू नागर से मेरी मुलाकात तब हुई जब उन्होंने फोन करके कहा कि मैं फतेहपुर में उनके ठहरने का इंतज़ाम करूं, एक ऐसी जगह जो रतनगढ़ से मानो शरारतन ही काफी नजदीक थी. तब तक मैं लगभग हर तरह के लोगों के साथ हर तरह का काम कर चुका था, लगभग हर मुमकिन चीज़ बेच चुका था और दुनिया की सबसे बदहाल बसों में मेरा एक ही सहारा था : एस.पी. एस. के नाविल. मैं हमेशा ही एस.पी.एस. को  सबसे ‘बुद्धिमान और भावुक’ पाठक जान पड़ता रहा था. 

मैं उनको धुआंधार चिट्ठियाँ लिखता था और मुझे पक्का यकीन था कि उनके किरदार असल होते हैं. उस राजस्थान के गौरव उल्लू को मैं जाती तौर पे जानता था, उसकी बीवी को भी. मेरा अपना कयास यह भी था कि एस.पी.एस.  ने एम. बी. की कहानी कुछ छिपाने के मकसद से लिखी थी, इतना कुछ कि छिपाने के लिए थार जैसे लंबे चौड़े दो नाविल लिखने पडे.

खैर, मैंने फतेहपुर के ‘काया विकल्प’ में उनके ठहरने का बंदोबस्त कर दिया जिसके रिमोट मालिक का नाम डॉ. संजय दत्त था. सारा खेल जमा कर मैंने उस्ताद को फोन घुमाया, ‘मेरी बदकिस्मतियों की फेहरिस्त में यह मेरी अब तक की सबसे बड़ी बदकिस्मती है पर क्यां करूं अगले एक महीने मुझे अपने घर में, पुष्कर में होना होगा. लेकिन आप फिक्र न करें, आपके प्रोग्राम पे कोई असर न होगा’.   

१४

जब मैंने एस.पी.एस. को एयरपोर्ट पे रिसीव किया, उनके साथ एक लडकी थी. मारिया शारापोवा !

१५

अपने सबसे प्यारे लेखक को उल्लू बनाना एक यादगार तजुर्बा था. पूरे एक महीने तक मैं उनका ड्राईवर, गाइड और ‘काया विकल्प’ का एडवरटाइजर बना रहा और अक्सर मेरा दिन फतेहपुर की पुरानी पांडुलिपियों के लिए मशहूर लाइब्रेरी के बाहर इंतज़ार करते हुए बीतता था. ऐसी ही एक दोपहर मारिया भी बाहर आ गयी.

‘जानते हो, मुझे रेगिस्तानों से नफरत है’.

‘जानता हूँ, तुम्हे मैकलिओड्गंज से मुहब्बत है’.  

१६

मेरा इंतकाल २०५९ में हुआ. तब तक मैं तीन मर्तबा शादी कर चुका था, एक बार (और आखिरी बार) कन्वर्ट हो चुका था और मेरे परलोक का जिम्मा मैंने बौद्ध मत के पास रख छोड़ा था. मैंने ज़िंदगी-भर डायरियाँ भरी पर जो इकलौती कहानी मैंने २००७ में लिखी थी वह किसी को कभी नहीं मिली.

१७

“मैंने तुम्हे चेताया था: इस कहानी में भविष्य नहीं, अबके उधर भटके और तुम यह किस्सा कहने की ताक़त खो बैठोगे.”

“कोशिश करूंगा आपकी नसीहत याद रह जाए.”

१८

के.के.के. से मेरा पसंदीदा सीन:

उस रात पहली बार उन्होंने क़त्ल करने के बारे में सोचा और ऐसे सोचा जैसे ‘ओथेलो ने सोचा था डेस्डिमोना को क़त्ल करने के बारे में, जैसे हेमलेट ने सोचा ख़ुद अपना क़त्ल करने के बारे में’  

‘अगर हम इन महान हत्याओं के ज़रा नजदीक भी पहुँच गए तो समझो हम कुछ भव्य कर गुजरेंगे. ‘ के.एन. ने कहा.

अपने प्रिय कंप्यूटर गेम ‘ऐजेज़ आफ एम्पयार्स’ में उलझे उसके दोस्त अवाम को बात जंची नहीं. ‘नहीं हुज़ूर,  हम यह क़त्ल करने की सोचते हैं वैसे जैसे गोडसे ने सोचा था महात्मा को क़त्ल करने के बारे में : पेशेवराना अंदाज़ में, बिना किसी कन्फ्यूज़न के. वैसा लिजलिजा कन्फ्यूज़न तो हमें ले डूबेगा.’

के. एन. को बात माननी ही पड़ी; उसके दोस्त अवाम को आदत थी हमेशा उससे ज़्यादा सही होने की.

१९

मगध मेट्रिक्स और बेशर्म फरिश्ते से मेरा पसंदीदा सीन:

अब वह आम्रपाली में था. और उसमें फंस चुका था. खेल में घुसने के कम बाहर निकलने के ज़्यादा रास्ते थे. लेकिन क्योंकि  वो वही था जिसने दीवार पे लिखा था अपना नाम खडिया से और पूछता रहता था हर किसी से कौन है, कौन है, उसके लिए बाहर जाने के सारे दरवाज़े बंद हो चुके थे. उसने एक के बाद एक कई कोड लिखे लेकिन हर कोड के बाद और अन्दर फंसता चला गया. आख़िर थक कर वह एक चट्टान पर बैठ गया और अपनी उँगलियाँ चबाने लगा. एक स्त्री प्रकट हुई और उसकी गोद में आकर बैठ गयी. लग रहा था वह भी उसकी तरह खो गयी है. स्त्री ने उसके हाथों को अपने हाथों में लेते हुए कहा, ‘प्रिय, सच है दुनिया को हाथों की तरह, बल्कि तुम्हारे ही हाथों की तरह गर्म और सुंदर होना चाहिए लेकिन यहाँ अन्दर भी एक दुनिया है, बहुत कुछ बाहर जैसी ही. मुझसे विवाह करो और मैं उन पुत्रियों  को जन्म दूँगी जो इस पृथ्वी पर राज करेंगी.’ 

हताश और आतंकित होते हुए उसने फ़िर एक कोड लिखा और अगले ही पल उसकी सातों पुत्रियाँ उछलती कूदती उस पे झूम पड़ीं.

बस इसी बिन्दु से, बागडोर पुत्रियों के हाथ में आ गयी. उन्होंने अपने पिता को एक मूर्ति में बदल दिया और माँ से कहा, ‘कहाँ है मगध के वो महान योद्धा और मंत्री जिन पर हमें शासन करना है?’

२०

एक महीने की मेरी जाती जाँच पड़ताल से भी यही नतीजा निकला कि एम.बी. नागर ने आत्महत्या  की थी, उसकी हत्या नहीं हुई. मारिया पुष्कर घूमने के बहाने रुक गयी और एस.पी.एस को एयरपोर्ट पे,  अकेले, विदा करते हुए मैंने उन्हें एक लिफाफा थमाया, ‘ सर, यह डॉ. संजय दत्त ने भिजवाया है.’

एस.पी.एस. ने ज़्यादा देर नहीं लगाई उसे खोलने में.  लिखा था: सुलेमान उर्फ़ बी.बी.सी.

मेरे सबसे प्यारे लेखक को तुरंत सारा खेल समझ में आ गया, और उसने फुर्ती से मेरा नंबर लगाया, ‘ शाबाश, डॉ. दत्त के नुस्खे के मुताबिक रूसी को हर सुबह एक लात पड़नी चाहिए. पीछे से. उसका ख्याल जम के रखना. कोई कसर न रह जाए.’ 

२१

मारिया शारापोवा का संदेसा जो मुझे उसके पुष्कर से जाने के एक हफ्ते बाद मेरे बैग में मिला:

चंडीगढ़ की तरफ़ बेहद  महान, लेकिन गज़ब पागल किस्म का कोई वर्नाकुलर कवि होता था. उसका होना भर एम.बी. को उस काव्यमय उन्माद तक खींच लेता था जहाँ वो सिर्फ़ एक चीज़ कर सकता था: हत्या. मतलब की बात सब मिला के इतनी ही है. बाकी सब बकवास.

सुलेमान प्यारे, तुम्हारी लातें बेहद पसंद आयी. वे उतनी ही असरदार निकली जितनी उस पुराने कामरेड पेब्लो की पोएम्स.

सीख

पूर्ण करने वाली हत्या वह होती है जिसकी प्रेरणा किसी ‘काव्यमय उन्माद’ में से फूटती है, जो किसी को विमोहित करले किताबों को हथियार बनाने के लिए.

उत्तर-कथन

धर्मशाला पुलिस रिकार्ड के मुताबिक जब मृतक ने छलांग लगाई उसके शोल्डर बैग में तीन किताबें थीं : कृष्णा वर्मा का मगध मेट्रिक्स और बेशर्म फरिश्ते, श्रीकांत वर्मा की मगध और कलेक्टेड पोएम्स ऑफ़ पाब्लो नेरुदा.  बिना किसी लेखक के नाम वाली, कविताओं की पाण्डुलिपि भी उसके पास मिली. इन सब के अलावा उस प्रकाशन गृह के दस साल के बिक्री के आंकडे भी बरामद किए गए जिसके यहाँ वह १९९६ से १९९९ के बीच काम करता था.

पुलिस को कहीं भी कोई सुसाइड नोट नहीं मिला.

 

 

 

 

2 विचार “साहित्य में मेरे सबसे बड़े दुश्मन की किताब&rdquo पर;

  1. पिगबैक: मर्डर ऑफ मार्क्स « सारी दुनिया रंगा

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