मर्डर ऑफ मार्क्स

(यह कहानी लेकिन दरवाजा के लेखक के नाम – पंकज बिष्ट का यह उपन्यास सोलह-सतरह की उम्र में पढ़ा था. कल यह पोस्ट लगाने के बाद लगा कि यह कहानी लेकिन दरवाजा के, उसके मेरे किशोर पठन के और उसकी मेरे अंदर बनी रही याद के नाम एक ट्रिब्यूट है. पंकज बिष्ट से क्योंकि मेरी कोई बात-मुलाकात नहीं हुई है, यह पोस्ट उनके लिये एक संदेसा भी है)

कहानी लिखने का मेरा सिलसिला कैसा रहा है, उसके बारे में आपको पहले बता चुका हूँ, यहाँ. लीजिए पेश है वह ब्लसफेमस शीर्षक वाली कहानी। यह कहानी पहले अंग्रेजी में लिखी गई.मैं शोध, रिव्यू, आलेख आदि अंग्रेजी में किंचित नियमित तौर पर लिखता हूँ पर जो तथाकथित ‘सृजनात्मक लेखन’ होता है वह अंग्रेजी में लिखने का यह मेरे साथ पहला और आखिरी हादसा था. अंग्रेजी में यह प्रकाशित भी हो गयी। किंतु इस कहानी का प्रेत हिन्दी में मुझ पर मंडराता रहा। आखिर इस साल के शुरु में मैंने इसे हिन्दी में लिखा. मैं इसे ‘अनुवाद का अनुवाद’ कहना चाहूंगा।  जैसा पहले अर्ज कर चुका हूँ प्रिंट में यह गौरीनाथ ने बया में प्रकाशित की थी. इमेज यहाँ से साभार.

 

जैसा मोहित अग्रवाल ने गिरिराज किराड़ू को बताया उस पर आधारित

 

1

यह सफ़ाई तो बिल्कुल शुरू में देनी पड़ेगी कि इस कहानी में वर्णित पात्र व घटनाएँ, यहाँ तक कि पात्रों के नाम जैसे कि धीरज बेंजामिन, अंशु अग्रवाल, शबनम उस्ता, कार्ल मार्क्स, फ्रेडरिख एंगेल्स, प्रेमचंद, निराला, कोमलकांत पंत, मुक्तिबोध आदि सभी काल्पनिक हैं. आपकी बड़ी कृपा होगी यदि आप इस कहानी के लेखक और उसके नाम गिरिराज किराड़ू को भी उतना ही काल्पनिक मान लें.

2

वह अजीबोगरीब ढंग से उदास था. अजीब या गरीब ढंग ही था वर्ना उसका उदास पाया जाना कोई नयी या अजीब बात नहीं थी. उन दिनों वो वैसे कलाकारों में से था जिनकी अटल मान्यता होती है कि एक कलाकार, खासकर एक आधुनिक कलाकार के चेहरे पर उदासी का शाश्वत लेप होना उसके कलाकार होने का पुख़्ता सबूत होता है. उदासी उसका मुखौटा थी, उसका आधुनिकतावादी मॉस्क, उसके आधुनिक होने का परम संकेतक और एक आधुनिक और कलाकार होने के कारण वह ख़ुद एक आदर्श संकेतित. ‘सच्चा आधुनिक होना कोई ख़ेल नहीं है,’ वह अक्सर दूसरों को और अपने आपको याद दिलाता रहता. उन दिनों आधुनिकता की उसकी ख़ास, निजी परिभाषा यह थी कि कला को जीवन की नहीं, जीवन को कला की नकल करनी चाहिये. और वह अपनी आत्म-परिभाषा को चित्र बनाते हुए भूलता नहीं था. जो वह पेंट करता था, वही वह था और इसीलिये जो चरित्र वो पेंट करता था वे सब काल्पनिक  थे क्योंकि वे उसके जैसे थे! और यही वज़ह है जब भी मैं उसके स्टूडियो में घुसता, मुझे कई धीरज बेंजामिन अपने में खोये हुए दिखते. लेकिन अपने खोये हुए होने में भी कुछ ऐसा रौब ग़ालिब करते हुए कि वहाँ घुसते ही उनकी प्रचंड उदासी न सिर्फ़ मुझे जकड़ लेती, विमोहित भी करती.

लेकिन क्रिसमस से तीन दिन पहले, एक रोजमर्राना-सी सर्द सुबह की यह ख़ास, अजीबोगरीब उदासी मेरी जानी पहचानी उसकी उदासी से बेहद ज़ुदा, एक बिल्कुल अनजान उदासी थी जिसे देखते ही मुझे वो दिन याद आया जब मैंने धीरज बेंजामिन को पहली बार देखा था.

3

वह मैकेनिकल इंजीनियरंग पढ़ रहा था और हमारा परिचय मेरी कज़िन ने कराया था. वह कोटा के कॉलेज में उससे दो साल जूनियर था. मैंने शुरु में उसे गंभीरता से नहीं लिया. मुझे लगा बनाता होगा कुछ हूबहू से दिखने वाले लैण्डस्केप जिनके बीच से जादुई चंबल टेढ़ी-मेढ़ी रेखाओं में गुजरती होगी या कुछ काल्पनिक शेर आसपास के मोगलियों को डराते होंगे.  लेकिन कुछ ही सेकिंड बाद वो मुझे अपनी ताजा कृति ‘फूको’ज पेंडुलम’ समझा रहा था. मुझे कुछ झटका-सा लगा और उसी क्षण मैंने पहली बार उसकी आतंककारी उदासी का सामना किया. उस शमशानी उदासी को काफूर करने के लिये मैंने मज़ाक में कहा – क्यूं भई क्या तुम्हारे फूको ने किया था पेंडुलम का आविष्कार? मैं मना रहा था कि मेरी बात सुनकर वो हंस पड़े लेकिन उसका स्वर और संजीदा, और उदास हो गया. ‘यह एक इतालवी लेखक के उपन्यास का शीर्षक है, और फूको ने जो आविष्कार किया उससे ज्यादा मूल्यवान आविष्कार आज तक किसी ने मैकेनिक्स में नहीं किया’. वह बहुत गंभीर स्वर में समझा रहा था और मेरे दयनीय अज्ञान के बारे में बहुत विश्वस्त नज़र आ रहा था.

मुझे उसी पल पता चल गया था कि उसे एक सीधे-साधे मज़ाक का मज़ा लेना नहीं आता. हाँ, मुझे उसी पल पता चल गया था कि न वो हंस सकता था न हंसी बर्दाश्त कर सकता था. और हाँ, मुझे उसी पल पता चल गया था कि उसकी उदासी मुझे आने वाले कई सालों तक आतंकित और विमोहित करेगी.

जल्द ही मैंने अपने सब दोस्त-दुश्मन खो दिये और एक धीरज बेंजामिन के सिवा किसी और से मिलने की ईच्छा तक नहीं होती थी. मैं चाहता था वो मुझ पर छा जाये.

4

उसकी शानदार, डिज़ाईनर उदासी से सबसे ज़्यादा रश्क मुझे उस सुबह हुआ था जिस दिन उसकी पहली एकल प्रदर्शनी की जवाहर कला केंद्र में ओपनिंग थी.

तब तक वो मुझे पर पूरी तरह छा चुका था और प्रदर्शनी का ब्रॉशर मैंने ही लिखा था. मुझे याद है अंशु गुलाबी पुलओवर में बाहर घास पर गुमसुम खड़ी थी. उसने सपाट मुझसे पूछा, ‘क्या तुमने हम दोनों को देखा था?’ मैंने पलटकर वैसे ही सपाट पूछा, ‘क्या उसकी रोमांचक उदासी ने तुम्हें भी अपने आगोश में ले लिया?’ ‘उदासी! रोमांचक उदासी! मेरे भोले भईया, धीरज से ज़्यादा मस्त लड़का मैंने आज तक नहीं देखा’. अंशु हंसने लगी, उसकी खिलखिलाहट ने चारों ओर पसरी घास तक को चौंका दिया. और मुझे अहसास हुआ कि उसकी उदासी इसीलये इतनी भयानक थी कि वो दरअसल हास्यास्पद थी. अंशु मुझे अंदर गैलरी में ले गयी और अंगुली से धीरज बेंजामिन की ओर ईशारा किया जो एक युवा ऑर्ट स्टूडेंट को अपनी कृति फिनॉमिनोलॉजी ऑफ़ इरॉटिसिज़्म  समझा रहा था जो एक साल के भीतर भीतर उसकी पत्नी बनने वाली थी. और ठीक उसी पल उस स्टूडेंट का नया नामकरण किया जा रहा था – शबनम शेरगिल, जब अंशु अपनी अंगुली धीरज पर ताने हुए और जोर से खिलखिलाने लगी. खिलखिलाहट उदासी के लौह आवरण से टकरायी और बैरंग लौट आयी.

अंशु ने तत्काल अपनी पढ़ाई, अपने भुजिया खानदान, भुजिया शहर, अपने केंडिन्स्की सब को छोडने का फैसला कर लिया और बुआ के लाये एक मारवाड़ी लड़के का रिश्ता सिर्फ़ इसलिये स्वीकार कर लिया कि वो सॉफ्टवेयर बिज़नेस में था.

एक साल बाद जब अंशु ने अपनी तीन बेटियों में से पहली को जन्म दिया और मुझे एक ई-मेल लिखकर बच्चे का नाम रखने को कहा तो मेल के नीचे लिखा – वैसे ये केंडिन्स्की है कौन या था कौन? मैंने जवाब में लिखा – केंडिन्स्की वो था जिसके साथ मैंने तुम्हें देखा था. अब वो हैदर हुसैन है. हाँ, बिटिया का नाम अमृता रक्खो, शेरगिल नहीं, प्रीतम.

5

अंशु अख़्मातोवा मेरी राईटिंग टेबल पर टांगें फैलाये बैठी थी. वह उसके भीतर पूरे जोर से आ जा रहा था और मैं, बाहर खिड़की से, हैरत से देख रहा था कि कैसे मेरे पूरे, छोटे-से, अपार्टमेंट को उन्होनें एक बड़े बेडरूम में तब्दील कर डाला था. कि मेरी मासूम-चेहरा कज़िन अंशुमिता अग्रवाल, जिसे उसका जीनियस केंडिन्स्की अंशु अख़्मातोवा कहकर पुकारता था, में कहाँ से इतना हौसला आया कि अपने इरॉटिक कारनामों के लिये वो मेरा इस्तेमाल करने लगे. पर इससे भी बड़ी हैरत यह थी कि अंशु कितनी आसानी से उसके साथ शरारती हो सकती थी. मैं अंशु के सामने की ओर था. पीछे से देखने पर अंशु के भीतर आ जा रहा उसका शरीर मुझे ‘गद्यात्मक’ लगा लेकिन मैं उसका चेहरा देखना चाहता था. मैं दूसरी तरफ की खिड़की की ओर भागा. अब हर स्ट्रोक के साथ उसका चेहरा कुछ नज़दीक लग रहा था लेकिन उसके शरीर से ज़्यादा ‘गद्यात्मक’. मैं हैरत और हड़बड़ाहट में गिर पड़ा. गिरने की आवाज़ उन्हें सुनाई दे गयी.

लगभग शमशानी उदासी के साथ वो मेरी प्यारी, मासूम कज़िन के भीतर आ जा रहा था. ‘कुछ नहीं, बिल्ली है’, उसने शोकमय दृढ़ता से कहा और पहले से ज़्यादा शक्ति से भीतर उतरने लगा. उसने मुझे देख लिया था.

6

पेरिस में अगस्त, 1844 में पत्रकारिता छोड़ने पर मज़बूर किये गये छब्बीस साल के एक जर्मन क्रांतिकारी की मुलाकात मैनचेस्टर के एक फैक्ट्री मालिक से हुई. उसी साल, पतझड़ ख़त्म होने तक, उन दोनों ने मिलकर एक क़िताब लिखी जिसने हीगेल और उसकी बौद्धिक संतानों को ललकारा. जर्मन खुद उन संतानों में से एक रह चुका था और इसलिये इस किताब ने न सिर्फ़ पितृ-हत्या की, बल्कि एक तरह से आत्म-हत्या भी. आवेग से भरे जर्मन ने अपने मानस पिता को दो हिस्सो में चीर डाला; आधा उसने दफ़ना दिया और आधा ख़ुद उसका पुनर्नवा आत्म बन गया.

चार साल बाद दोनों मित्रों ने जर्मनी और फ्रांस में हुई क्रांतियों में हिस्सा लिया. आप उन्हें जानते हैं. वे कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिख एंगेल्स थे. यदि आप उन्हें नहीं जानते, तो श्री रतन प्रसाद अग्रवाल के घर जाके उनके निजी संग्रह में MaRkS aNd AnGeLs: A cHiLd’S rEvOlUtIoNs सीरीज देखिये. रतन ताऊजी अंशु के पिता हैं और उन्हें ये पेंटिंग्स धीरज बेंजामिन ने पचास हजार में बेची थी.

धीरज हैदर हुसैन ने महान मार्क्स और एंगेल्स के नाम उन दोनों की किताबों पर छपा देखने से बरसों पहले बचपन में ही सुन लिये थे. बचपन में Marx उसके लिये Marks और Engels, Angels थे. इसीलिये इस मास्टरपीस में जो ‘महान द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद की शिशु अवस्था का चित्रण’ करता है, बेचारे ब्रूनो बायर एंड कम्पनी कुपोषण के शिकार बच्चे लगते हैं जिन्हें ये दो हट्टेकट्टे मित्र पछाड़ रहे हैं; और खून में लथपथ, दो हिस्सों में कटा हुआ हीगेल किसी शहीद हो गये नाईट जैसा लगता है.

रतन ताऊजी ने उससे पहले कभी कोई मॉडर्न पेंटिंग नहीं खरीदी थी और क्योंकि उन्हें ये सीरीज पचास हजार में पड़ी, वे मानने लगे कि मॉडर्न ऑर्ट सचमुच कोई मूल्यवान चीज़ होती है. और यूं भी, है कोई और भुजिया एक्सपोर्टर इस शहर में जिसके पास ऐसी मॉडर्न ऑर्ट हो?

धीरज बेंजामिन ने अंशु अख़्मातोवा को छोड़ दिया और शबनम उस्ता के साथ घर बसा लिया लेकिन MaRkS aNd AnGeLs: A cHiLd’S rEvOlUtIoNs रतन ताऊजी के ड्राईंगरुम में आज भी उसी शान से टंगी है.

7

मैंने उसे और अंशु को और हर बात के लिये माफ़ कर दिया लेकिन अपने उचक्के अफ़ेयर में अन्ना अख़्मातोवा का पवित्र नाम घसीटने के लिये कभी माफ़ नहीं कर सका. ये और बात है कि मैं ख़ुद उन दिनों किसी को मनीषा स्वेतायेवा कहा करता था और यह भी कोई पावन प्रेम नहीं था.

8

मैं कन्फ़ेस करता हूँ कि मुझे मॉडर्न ऑर्ट कभी समझ नहीं आयी. मैं उसे सिर्फ़ थियरी में, कला-इतिहास की मांग कर पढ़ी गयी किताबों के जरिये जानता था जिन्हें मैंने बहुत जोश से लेकिन बहुत परिश्रमपूर्वक कॉलेज के दिनों में पढ़ा था जब घरवाले मुझसे एक अर्थशास्त्री या कम से कम अर्थशास्त्र का व्याख्याता बनने की उम्मीदें कर रहे थे. और जब मैंने मार्क्स को सिर्फ़ एक इंपार्टेंट क्वश्चेन की तरह पढ़ा था जिसका परीक्षा में आना तय था.

लेकिन तब भी ‘मार्क्स’ बहुत भ्रमित और सम्मोहित करता था. तब भी, एक उत्तर-सोवियत आसमान के तले भी, उसके नाम में वो ज़ोर था कि उसका नाम लेना भर प्रगतिशील और आधुनिक होने का सर्टिफिकेट पाने के लिये काफ़ी था. मार्क्स ने मुझे मार्क्सिस्ट बनाया. लेकिन अपनी उन चकरा देने वाली किताबों से नहीं बल्कि अपने प्यारे, उदास, दढ़ियल चेहरे से जो हमारी पाठ्यपुस्तकों में इतने कुरूचिपूर्ण ढंग से छपा रहता था कि हमें संदेह होता था – क्या ये प्रकाशक भी रूपवाद से घृणा करता है!?

उन दिनों मैं अक्सर मार्क्स के अमर चेहरे पर छायी वैज्ञानिक उदासी की तुलना टैगोर के मुखमण्डल के रहस्यवादी लक्षणों से किया करता था.

इसके उलट धीरज बेंजामिन आत्म-प्रशिक्षित आधुनिकतावादी था और ये एक सुंदर विडंबना ही थी कि मैं बिना उसकी एक भी पेंटिंग समझे उसके ब्रॉशर लिखा करता था.

बाद के जिन दिनों में मैं गुपचुप उत्तर-आधुनिक हो गया था और मुझे वही उदासी देरिदा और लाकां के चेहरों पर मुद्रित नज़र आने लगी थी, धीरज बेंजामिन अपने लिये दादावाद और घनवाद का पुनराविष्कार कर रहा था. उस दौर में जब वो मुझसे दूर होता था हास्यास्पद लगता था लेकिन सामने पड़ने पर पहले की तरह मेरा मालिक क्योंकि उसके चेहरे पर वो तानाशाह उदासी वैसी की वैसी बरकरार थी. उसकी ग़ैरमौज़ूदगी में मैं उसका मज़ाक उडाता था लेकिन साक्षात होने पर वो मेरा जनरल सेक्रेटरी बन जाता था और मैं अगले आदेश का इंतज़ार करता हुआ आज्ञाकारी कॉमरेड.

और फिर, मेरे गोपन उत्तर आधुनिकतावाद के स्वर्णिम दिनों में एक शाम वो वोद्का की एक गिफ्टेड बोतल ले कर आया और मुझे लताड़ने लगा – ‘तुम एक ऐसे वर्तमान के आभास में जी रहे हो जो तुम्हें पता भी नहीं चला और इतिहास हो चुका है. तुम्हारे देरिदा ने सबसे झूठ बोला और अब तो वो कन्फ़ेस भी कर रहा है. कितना चेताया है मैंने तुम्हें कि भविष्य सिर्फ़ मार्क्स में है’. उसने मुझे एक स्पीच थमायी लेकिन उसे पढ़ने से पहले ही मुझे पता था मैं अपने मार्क्स और अपने देरिदा दोनों को खोने वाला हूँ. धीरज दोनों से ज्यादा पॉवरफुल है.

कुछ महीनों बाद, बम्बई में उसकी पहली महत्वाकांक्षी प्रदर्शनी के लिये ब्रॉशर लिखते हुए मैंने धीरज बेंजामिन को रिकंस्ट्रक्ट किया और जी हाँ, मैंने ये पाया कि वो तो सदैव से एक प्रतिबद्ध मार्क्सवादी रहा है और मैं कभी भी खेल से बाहर फेंक दी जाने वाली प्यादी बल्कि वो भी नहीं, सिर्फ़ एक बेचारा, उपनिवेशीकृत हिन्दी कवि जो एक भुजिया बनाने वाले के घर जन्मा और उदासी जिसे अपने हर रूप में पिघला देती है.

यहाँ, मैं यह भी कन्फ़ेस कर लूं कि मुझे मार्क्सवादी चित्रकला भी कभी समझ नहीं आयी और मैं अगर बम्बई गया तो उसकी प्रदर्शनी देखने नहीं, उसका स्टूडियो देखने और उसकी केयरटेकर शबनम उस्ता से मिलने जिसके वालिद जयपुरी हैंडिक्राफ्ट का धंधा किया करते थे.

9

जब उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद प्रगतिशील लेखक संघ के अधिवेशन की अध्यक्षता करते हुए यह घोषणा कर रहे थे कि साहित्य एक मशाल है, क्या उनके मन में कहीं थी 1844 में हुई पितृ-हत्या और आत्म-हत्या की धुआंती स्मृति? क्या उन्होंने पढ़े थे कैपिटल और दूसरे चकरा देने वाले ग्रंथ? पता नहीं, पर एक चीज़ का इल्म उन्हें बहुत साफ़ साफ़ हो गया था – इस नये युग में सर से पाँव तक प्रगतिशील होना अनिवार्य है. और वे गलत नहीं थे. दो छायावादी महाकवि निराला और कोमलकांत पंत लेटलतीफ़ साबित हुए. दोनों को रिजर्वेशन नहीं मिला और भविष्य जाने वाली ट्रेन में उन्हें छत पर बैठना पड़ा. हिन्दी का साहित्यिक मार्क्सवाद इन दोनों के क्लैसिक कन्वर्जन की ही कहानी है. क्या ये दोनों कभी बेचारी ब्रूनो बायर एंड कम्पनी के हश्र के बारे में सोचते थे?

10

दो बेटियों अमृता और वसंतसेना (यह नाम भी मैंने ही रक्खा था) को जन्म देने के बाद किसी समय, एक दोपहर अंशु पुगलिया ने मेरे उसी अपार्टमेंट के दरवाज़े पर दस्तक दी. वो थोड़ी मोटी लग रही थी और अपने वैवाहिक जीवन से संतुष्ट भी. मैं सोच रहा था उसकी आँखे वहाँ कुछ बीता हुआ ढूंढने की कोशिश करेगी – राईटिंग टेबल पर, फर्श पर, उधर उस खिड़की की तरफ. लेकिन उसे देखकर लगा मानो वो पहली बार वहाँ आयी हो.

उसे साड़ी में देखकर मुझे अंशु अख़्मातोवा की नहीं, मनीषा स्वेतायेवा की याद आयी. मनीषा का शरीर कभी वैसा था जैसा अब अंशु का था और अंशु ने वैसी साड़ी पहन रक्खी थी जैसी कभी मनीषा पहनती थी. अपनी इस खोज से उत्तेजित होते हुए मैं अशु के करीब चला गया और उसे चूमने लगा. उसे एकबारगी कुछ झटका लगा पर उसने मुझे रोका नहीं.

आधी रात मेरे पास उसका एसएमएस आयाः यू डिड इट एज केंडिंस्की डिड.

11

मेरे दो ‘महत्वपूर्ण’ प्रगतिशील कविता संकलन आ चुके थे. जिस शाम मुझे मुक्तिबोध सम्मान दिया जा रहा था, मोबाईल पर शबनम का फोन आया. मैं उठकर बाहर आया. वो जिद कर रही थी मैं बम्बई ज़रूर आऊँ, आने का वायदा करके मैं अपना वक्तव्य देने लौटा. मैंने कहा, ‘मुक्तिबोध मेरे पिता है, मानस पिता लेकिन मैं अब तक एक नालायक बेटा ही साबित हुआ हूँ’. मैंने उस शाम वही कहा जो मुझे उस शाम महसूस हुआ और इसीलिये मुझ पर ‘सुपरस्टार’ नामवर सिंह के विट का कोई असर नहीं हआ जिन्होंने कहा, “आज़ाद हिन्दुस्तान में पिता-पुत्रों में कभी सामंजस्य नहीं रहा और उसका सबसे बड़ा उदाहरण तो महापिता बापू और उनके बेटे – गाँधीवादी – हैं.”

सम्मानित हो कर अपने भुजिया शहर लौटते ही मैंने उस अनहोली फैमिली – देरिदा एंड कम्पनी – के साथ अपना गुपचुप अवैध संबंध हमेशा के लिये खत्म कर दिया.

12

यह मेरा नया ठिकाना था – एक काफ़ी छोटा कमरा जिसमें राईटिंग टेबल नहीं थी लेकिन किताबें ढेरों जमा हो गयीं थीं. ‘तुम ऐसा जीवन झेल नहीं पाओगे’- अंशु ने देखते ही टिप्पणी की. उस दोपहर इस एक वाक्य के अलावा हम दोनों कुछ नहीं बोले. मौन की शर्मीली देवी ने हम बहुत बोलने वालों पर आखिरकार मेहरबानी की. जब उसने कमरे में प्रवेश किया तब मैं रो रहा था और थोड़ी देर बाद लोहे की एक खाट पर एक दूसरे के कपड़े उतारते हुए मेरी आंखों में आँसू थे और उसकी आंखों में डर.

13

बम्बई में धीरज की उस ख़ास अजीबोगरीब उदासी का सामना करने और सबके सामने यह कहने के कि मुक्तिबोध मेरे पिता हैं इन दोनों घटनाओं के बीच के एक महीने ने मेरी ज़िंदगी बदल दी, शायद हमेशा के लिए. इसी महीने में मैंने वो स्पीच स्पेक्टर्स ऑफ़ मार्क्स पढ़ी जो कभी लताड़ के साथ धीरज पकड़ा गया था, मुझे अहसास हुआ कि ख़ुद को डी-क्लास करने की मेरी अब तक की कोशिशें मूलतः रोमांटिक थीं, कि मैं अब भी वही पुराना ढीठ बुर्जुआ था; मैंने भुजिया इंडस्ट्री के जन्मदाता रहे मेरे दादाजी की वसीयत में मिला उत्तराधिकार छोड़ दिया और सबसे बड़ी बात यह कि इसी एक महीने में मुझे रघुवीर सहाय की उस उक्ति का मर्म पता चला कि जहाँ बहुत कला होती है वहां परिवर्तन नहीं होता. वैसे मुझे पता था रघुवीर सहाय कोई मौलिक बात नहीं कर रहे थे. वे मार्क्स के कहे को ही कह रहे थे. संसार को बदलने के लिए मार्क्स ने दर्शन को बदल डाला. भारत जैसे बुर्जुआ लोकतंत्र को बदलने के लिए रघुवीर सहाय ने हिन्दी कविता को बदला. अपने आप को बदलने के लिए मैं मार्क्स को फ़िर से खोजने लगा. और आख़िरकर वो पुरानी पाठ्यपुस्तक मिल गयी जिसमें छपा उनका पानी खाया हुआ हुआ चेहरा पहले से कहीं अधिक उदास लग रहा था.

14

मुक्तिबोध के मरणोपरांत छपे संकलन की भूमिका में लिजेंडरी शमशेर उन्हें मार्क्सवादी नहीं कहते; हाँ सिर्फ़ एक बार और वो भी सरसरी तौर पर यह कहते हैं कि उन्होंने ‘प्रगतिवाद से मार्क्सीय दर्शन लिया’ लेकिन उसी वाक्य में यह भी कह देते हैं कि मुक्तिबोध सभी दलों और वादों से ऊपर उठ गये थे.

शमशेर जैसे कवि का ऐसा कहना संगत ही लगता है क्योंकि वे खुद सभी वादों आदि से ऊपर उठने के सबसे बडे़ उदाहरण हैं. यह जरूर चौंकाता है कि मुक्तबोध भी शमशेर का मूल्यांकन करते हुए उन्हें मार्क्सवादी नहीं कहते. यह संयोग उससे कहीं ज़्यादा विचित्र है जितना लगता है क्योंकि दोनों एक दूसरे को मानववादी कहते हैं! यह क्या चक्कर है? मानववादी कौन होता है? मैं हमेशा ही इस पद ‘मानववाद’ से बचने की कोशिश करता हूँ, पर इसलिये नहीं कि मैं इससे दार्शनिक, राजनीतिक स्तर पर सहमत नहीं बल्कि इसलिये कि मुझे यह पद अमूर्त लगता है. फिर भी जब शमशेर मुक्तिबोध को मानववादी कहते हैं तो इसमें कुछ नया अर्थ भर जाता है.

कौन होता है मानववादी? यदि कोई नाम इस सवाल का जवाब हो सकता है तो वह है शबनम उस्ता.

15

मैं मुक्तिबोध की कल्पना अक्सर एक प्रायवेट डिटेक्टिव की तरह करता हूँ; जासूस नहीं पी. डी.. अपनी डायरी में वे अक्सर उन कवियों-लेखकों के बारे में बात करते हैं जो लेखन में अभिनय करते हैं; एक सोचा-समझा मॉस्क पहन लेते हैं. इसलिये उन्हें कोई हैरानी नहीं होती जब वे देखते हैं कि कैसे परम बुर्जुआ जीवन शैली वाले लोग कविता में प्रगतिशील मुखौटा पहन लेते हैं. बुर्जुआ बोहेमियन होने के मेरे अभिनय, मुखौटे के आरपार देखने वाले भी मुक्तिबोध ही थे. अगर मैंने उन्हें न पढ़ा होता तो मैं वही बना रहता जो बड़े जतन से मैंने अपने आपको बनाया था. उन्होंने मेरा मॉस्क खींच लिया लेकिन ऐसा करते हुए ख़ुद अपना मॉस्क भी मुझे देख लेने दिया – एक पी. डी.का मॉस्क. लेकिन उन्हें हायर किसने किया? उनकी चेतना ने? परम अभिव्यक्ति दुर्निवार के लिये उनकी अतिचर्चित तड़प ने? नहीं, मार्क्स ने, उसके प्रेत ने. मुक्तिबोध आधुनिक सभ्यता के समीक्षक नहीं थे जैसा उनके प्रशंसक मानते हैं बल्कि एक पी. डी. थे. एक पब्लिक पी. डी.. वे आधुनिक सभ्यता को एक uni-verse की तरह नहीं एक  diverse, टूटे हुए बिखरे हुए शोर की की तरह, एक बंटी हुई शै– वर्गों – के ढांचे की तरह देखते थे. उनकी अंधेरे में एक पी. डी.का शाहकार है. मुझे पता है मैं भी अंधेरे में आगे बढ़ रहे उस जूलूस में चल रहा था. मुक्तिबोध ने मुझे देखा था. पर उनके हाथ में कोई मशाल नहीं थी. अपना चेहरा, अपनी पहचान, अपना आई. डी. कॉर्ड, अपना कैमरा छुपाते हुए वे अंधेरे में मेरे पास ही कहीं चल रहे थे.

उस अंधेरे में इकलौती रौशन चीज़ उनके मुँह में दबी बीड़ी थी.

16

शबनम को पेंटिंग किये एक अर्सा हो चुका था. वो राजस्थान स्कूल ऑफ़ ऑर्टस के अपने दिनों को कुछ वैसे ही भूल गयी थी जैसे हम में से ज्यादातर अपने बीए, बीएससी को भूल जाते हैं.

लगातार आने वाले उसके पाबंद फ़ोन कॉल्स की वज़ह से मेरा उस परिवार से सम्पर्क बना रहता था. उन्होंने अपने बेटे का नाम गौतम रखा था. शबनम ने एक बार गौतम का एक पोर्ट्रेट भी मुझे भेजा था जब वो दो साल का था – शादी के बाद उसकी इकलौती पेंटिंग.

इस पोर्ट्रेट में गौतम देखने वालों की ओर मुस्कुराहट फेंकता है. इस एक मुस्कुराहट को छोड़कर जो उसने अपनी माँ से पायी है, गौतम अपने पिता की प्रतिमूर्ति है. उसमें पर उस मायावी उदासी के कोई चिह्न नहीं जिसने कभी मुझे और उसकी माँ को विमोहित किया था. जब मैंने उसे देखा – सच में, एक साल बाद तो वो मुझे अपने पोर्ट्रेट की प्रतिमूर्ति लगा. ‘तुम्हारा ही नाम गौतम है ना?’ मैंने उससे पूछा, पर मेरी नज़रें उसकी माँ पर जमीं थी. कुछ देर बाद शबनम ने भावहीन स्वर में कहा ‘ये ना बोल सकता है न सुन सकता है.‘ तब मैंने पहली बार ठीक से गौतम की ओर देखा. वह वैसे ही मुस्कुरा रहा था जैसे अपने पोर्ट्रेट में.

17

हम महान, शक्तिशाली व्यक्तिवाचक संज्ञाओं के शिकार थे. धीरज, अंशु, उसकी बेटियाँ, शबनम, गौतम, मनीषा और मैं हम सब के नाम थे पर उससे बड़ी थी हमारी नामहीनता. हम केंडिंस्की और शेरगिल जैसे महान नामों को वैसे ही पहन लेते थे जैसे हमारी नामहीनता हमें. हम उन महान लोगों की नकल नहीं करते थे, सिर्फ़ उनके नाम ओढ़ लेते थे. अंशु ने कभी अख़्मातोवा को नहीं पढ़ा था. मनीषा को तो यह भी नहीं पता था स्वेतायेवा कौन है? अमृता, वसंतसेना, किशोरी (अंशु की तीसरी बेटी) और गौतम को कहाँ से पता होता उनके नामों का बोझ कितना बड़ा था. सच तो यह है कि इस खेल के सजग खिलाड़ी हम तीन थे – धीरज, शबनम और मैं. जब शबनम मुझे रिसीव करने दादर रेलवे स्टेशन आयी उसने मुझे ‘मुक्तिबोध’ कह कर पुकारा. उसे कोई अंदाजा नहीं था मुक्तिबोध होने/कहे जाने के क्या माने होते हैं फ़िर भी मुझे मुक्तिबोध कहते हुए उसने कुछ ऐसा चेहरा बनाया मानों किसी औसत चीज़ के बारे में बोल रही हो. नहीं, उसे मुक्तिबोध या मार्क्सवाद से मितली नहीं आती थी. यही उसकी आम राय थी हिन्दी के तमाम कवियों लेखकों आदि के बारे में. उसका मानना था ये सब बेहद भावुक, लुंजपुंज, घनघोर अपढ़-अज्ञानी और तिकड़मी प्राणी होते हैं और हिन्दी में कबीर-मीरा के बाद एक भी मौलिक लेखक नहीं हुआ.

स्टेशन से घर जाते हुए उसने मुझे सूचना दी, ‘मैं धीरज को छोड़ रही हूँ.’

18

मैं धीरज बेंजामिन को एक बार में पहचान न सका.

उसका लुक पूरा बदल गया था. घुटमुंडा सिर और लम्बा, भूरा लबादा. मैंने सोचा आखिर वह भी उस आध्यात्मिक चरण में प्रवेश कर गया है जिसके बिना बुर्जुआ बौद्धिकता का करियर ग्राफ पूरा नहीं होता. पर उसके बारे में यह बात मुझे काफ़ी मजेदार लगी क्योंकि मैंने, मज़ाक मज़ाक में यह भविष्यवाणी की थी कि एक दिन वो आध्यात्मिक हो जायेगा. तब उसने मेरे मज़ाक को हमेशा की तरह गंभीरता की झाड़-फूंक से उड़ाते हुए रूस में आध्यात्म पिपासा, खासकर तोलस्तोय और गोर्की की आध्यात्म पिपासा पर प्लेखानोव का विवेचन पढ़ने का आदेश दिया था. मेरे लिये तो खैर यह एक अनोखी खबर थी कि गोर्की का भी क्राँति, समाजवाद के अलावा अध्यात्म-वध्यात्म की खोज से भी कुछ लेना देना था. पर तब उसका आदेश मानते हुए मैंने प्लेखानोव की खोज कर ही डाली थी.

‘अब अंततः तुम पूर्णतः मौलिक हो गये हो. हिन्दुस्तानी पेंटर का दढ़ियल होना भी एक आधुनिक अनुष्ठान है.’ हमेशा की तरह उसने मेरे मज़ाक को अनसुना कर दिया

और उस अजीबोगरीब उदासी के साथ जिसका जिक्र मैंने बिल्कुल शुरु में किया उसने अपनी जीवन में सख्त गंभीरता का सबसे हास्यास्पद प्रदर्शन करते हुए कहा, ‘मैं एक दलित हूँ और मैंने तय कर लिया है अब वही मेरी पहचान है.’ पर तुम्हें कब पता नहीं था कि तुम दलित हो. इसमें नया क्या है? मैं किसी तरह अपनी हँसी रोक रहा था. नो, इट्स ए रेवेलेशन. रेवेलेशन जैसे ड्रामाई लफ़्ज को उसने जिस अतिरिक्त, विजयी उदासी के साथ बोला उससे मेरी हँसी फूट पड़ने के आसार बढ़ गये थे पर उससे फिजूल टकराव टालने के लिये मैंने मोबाईल का रिंग टोन बटन पुश किया और माफ़ी माँगते हुए बाहर लॉन में चला गया. उस दिन, क्रिसमस से तीन दिन पहले उसकी उदासी इतनी अजीबोगरीब शायद इसीलिये थी कि उस दिन हास्यास्पदता के ऊपर से उदासी का पर्दा उतर गया था. मेरे लिये यह आठ बरस लम्बे जादू के बिखरने का क्षण था.  मैं दूसरे कमरे में गया, अपना सामान बांधा और गौतम को विदा कहा जो जवाब में हमेशा की तरह मुस्कुरा दिया.

बाद में मुझे शबनम से पता चला कि उसने हमारे बीच हुआ सारा प्रहसन ऊपर खिडकी से देख लिया था.

19

मुझे दोपहर में कलकत्ते के लिये रवाना होना था. अंशु ने जब यह ऑफर मेरे सामने रखी उससे पहले मुझे पता नहीं था कि पार्टी के साहित्यिक वैचारिक पत्र की संपादक और राज्य सभा सदस्य दुर्गा अग्रवाल अंशु की पाँच जेठानियों में से एक थी हालांकि इतना मुझे पता था कि भुजिया टाउन के इकलौते जनकवि कर्मेश भाई दुर्गाजी के पिता थे.

20

जोधपुर–हावड़ा के दिल्ली जंक्शन छोडने से बीस मिनट पहले प्लेटफ़ार्म पर खड़ा मैं एक अंग्रेजी डेली में दो फोटुओं को घूर रहा था. एक में धीरज उसी लुक में था जिसमें मैं उसे देख चुका थाः घुटमुंडा सिर और लम्बा भूरा लबादा. दूसरा राजधानी में चल रही उसकी सोलो में प्रदर्शित एक पेंटिंग मर्डर ऑफ़ मार्क्स का था. जैसा मैं कन्फ़ेस कर चुका हूँ मुझे उसका काम कभी समझ नहीं आया. यह पेंटिंग भी नहीं आयी. और यूँ भी मेरे समझ पड़ने के लिहाज से यह बहुत अमूर्त थी. मैंने धीरज की तस्वीर को गौर से देखना शुरु किया. एक सख्त, राजनैतिक उदासी. मैंने उस उदासी को मुझ पर अपना जादू चलाने का एक और, आखिरी मौका दिया. पर जब ये नहीं हुआ, मैंने उस पर पूड़ी सब्जी फैलायी और कुछ उतने जोर से हंसने लगा जितने जोर से हंसते हुई अंशु अग्रवाल ने जवाहर कला केंद्र की घास को सिहरा दिया था.

9 विचार “मर्डर ऑफ मार्क्स&rdquo पर;

  1. शुरुआत बहुत ही अच्छी है; अपनी ही कोई जानी-पहचानी दुनिया सी मालूम हुई, तुरंत रिश्ता बन गया। काफ़ी दूर तक रवानी बनी रहती है, अंजाम के क़रीब आते-आते दिलचस्पी कुछ कमज़ोर पड़ जाती है। कहानी का अंत तार्किक ज़रूर है मगर संतुष्ट नहीं करता। शायद जीवन को कहानी की कला के साथ कुछ और समझौते करने थे?
    लेखक की दुनिया के व्यापक संदर्भ हैं, और पता लगता है कि वे उस के जीवन में चरित्र की तरह शामिल हैं। ये पहलू अच्छा है लेकिन सब कुछ इम्प्रेशन्स के स्तर पर ही बना रहता है। शायद आप की यही मुराद रही हो। भाषा कहीं-कहीं बोझिल हो गई है।
    मोटे तौर पर कहानी पसन्द आई!

  2. कहानी जहाँ से शुरू होती है बहुत सारी उम्मीदें जगाती है. कुछ कडवे सच, कुछ लाजिक, कुछ इल्लाजिकल अलाप और तमाम रेफ्रेंसज़ पढ़ने के लिए बाध्य करते हैं…पर अंत तक आते-आते लगता है तुम भी उलझ गए. दुर्गा अग्रवाल के बाद पूडी-सब्जी तक का सफर वाया ‘मर्डर अआफ मार्क्स’ इतनी तेज़ी से खत्म हुआ जैसे कोई फास्ट फारवर्ड का बटन दब गया हो….’लेकिन दरवाज़ा’ के आगे का लेखन शायद उपन्यास या औपन्यासिक ही हो सकता है. इससे कम में काम नहीं चलने वाला प्यारे….

  3. यह बेहद सधी हुई और बेहतरीन कहानी है. कहानी के साथ दी गयी पेंटिंग में जो खून का थकच्चा है वही तो हिंदी के आधुनिकता और उत्तर-आधुनिकतावादियों के द्वारा किया गया ‘मार्क्स का मर्डर’ है! कहानी में प्रेमचंद, मुक्तिबोध, शमशेर, रघुवीर सहाय आदि अनेक दोस्तों से तो मुलाकात हुई ही, बीस साल पुराने ‘लेकिन दरवाजा’ पंकज बिष्ट से भी मुलाकात हुई. मिलकर वैसी ही ख़ुशी हुई. सभी से मिलकर बेहद अच्छा लगा. और इस सबसे ज्यादा बढ़िया बात यह हुई कि अपनी सदी के अवसान के वक़्त हिंदी में बचे हुए उस कहानीकार से मुलाकात हुई, जिसके स्वागत में हाथ मिलाने के लिए मेरा प्रेत मुझसे भी अधिक जिन्दादिली के साथ खड़ा था.

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s