उसके शरीर के एक या अनेक अतीत हैं

पिछले दिनों अभिन्न  मित्र  पीयूष  के पिता श्री पूनम दईया का देहांत हो गया. साहित्य की दुनिया के हम जैसे जिहादी मानवतावादियों और विकट प्रतिबद्धों के उसको उठाने उसको चढाने उसकी खुशामद उसकी चुगली करने के अविकल सनातन में, टुच्ची रंजिशों के अपरिहार्य रोज़मर्रा में डाक्साब जैसा सज्जन अब तक मेरे जीवन में दूसरा नहीं आया. कभी हरीश भदानी के साथ वातायन का संपादन कर चुके पूनमजी पर मेरे लिए पीयूष के पिता नहीं एक मित्र थे. बहुत कम आँखों में वैसा धीरज देखा है. वे जब राजस्थान साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष बना दिए गए तो हर कोई हैरान था क्योंकि ये सब चीज़ें घर बैठे तो मिलती नहीं हैं और यह सब पाने के लिए जैसा ‘कौशल’ चाहिए वह उनमें है यह वे  भी नहीं मन सकते थे जिनको उनका शत्रु इस वजह से होना ही था. उनके संपादन में अकादेमी की पत्रिका सचमुच हिंदी की मुख्यधारा पत्रिका लगने लगी थी. पिछले चार दिनों की बीमारी में घर रहने के दौरान एक किताब ढूंढते हुए उनके संपादन में निकला एक अंक (अगस्त-सितम्बर १९९९) हाथ पड़ गया. उसमें प्रकाशित अपनी एक कविता (यह मेरी कविताओं के प्रकाशन का दूसरा ही अवसर था) पढ़कर उनके साथ के उन दिनों के साथ उस कवि की याद भी आ गयी जिसने ये लिखी थी. जो खुद को नहीं जंचता उसको नष्ट कर देता हूँ इसलिए मुझे शर्मिंदा करने वाला सब काम वही है जो प्रकाशित हो गया. बहुत कम हुआ है कि अपना कुछ पुराना छपा हुआ देखकर  शर्मिंदगी नहीं हुई. अरसे बाद बीसवीं शताब्दी के उस घामड़ कवि का कुछ अच्छा लगा  है.  चित्र सीरज सक्सेना का है.
 
 
 
घर की दीवारों से रोशनी के स्विच उतारकर हमने किसी कविता में रख दिए
इस खुद के बनाये अँधेरे में हम कपड़ों की सरसराहट से एक दूसरे के शरीर का अनुमान करते
वह अपनी साड़ी उतारकर रेगिस्तान में फैला देती मैं अपना कमीज़ हवा में किसी खूंटी पर लटका देता
वह अपने बाकी कपडे पूजा की अलमारी के नीचे सरका देती
एक दूसरे के शरीर को नहीं हम कपड़ों को छूते
 
उसका किसी शरीर किसी प्राचीन कविता की पाण्डुलिपि हैं जिसकी भाषा मैं चिन्हों में पढ़ पाता था
सारे चिन्ह कोई न कोई प्रतीक हो जाते
सारे प्रतीक किसी न किसी कल्पना में जन्मते
सारी कल्पनाएँ एक या अनेक कथाएँ बनातीं
सारी कथाएँ एक या अनेक अतीत हो जातीं
 
उसके शरीर के एक या अनेक अतीत हैं –
वह मेरे कपड़ों को किसी अतीत में छुपा देती

5 विचार “उसके शरीर के एक या अनेक अतीत हैं&rdquo पर;

  1. “बीसवीं शताब्दी के उस घामड़ कवि का कुछ अच्छा लगा है” -मुझे तो कवि का घामड़ होना ही अच्छा लगता है प्यारे गिरि- यह कविता पहले कभी नहीं पढ़ी थी…. यहाँ लगा कर बढ़िया काम किया. कवि जब ज़्यादा होशियार और नपा-तुला होगा तो कविता पीछे छूट जाएगी और जीवन भी.

    यहाँ मैं थोड़ा विषयांतर करने की इजाज़त चाहूँगा.
    “उसका किसी शरीर किसी प्राचीन कविता की पाण्डुलिपि हैं जिसकी भाषा मैं चिन्हों में पढ़ पाता था”
    – यहाँ कहीं अशोक वाजपेयी भी दीखते है…पर देखो न अशोक जी अब कहाँ कहाँ दीखते हैं…जो उन्हें न देखने कि बात कहे वो झूठा. हमारे छोटे से कवि जीवन में एक लम्बे समय तक वे हम जैसों का एक वर्चुअल प्रतिपक्ष रहे हैं क्योंकि हमें हमारे बड़ों ने इस प्रतिपक्ष का निर्माण किया और विरसे में उसे छोड़ा. मैं अब इस पर गंभीरता से सोचने लगा हूँ. उनके कवि ने भले मुझे कभी कुछ नहीं दिया पर उनकी उपस्थिति अब कई तरह से समानधर्माओं को समझने का एक बड़ा अवसर देती है तो ये भी मेरे लेखे एक बड़ी बात है. अभी जनसत्ता में उन्होंने अपने अपवित्र अध्यात्म की बात की है, जो इस सन्दर्भ में भी ख़ासी व्यंजक है. बाक़ी किसी लेख में, जिसे लिखने की मैं पूरी कोशिश करूंगा !

    हमारी इस “पवित्र घामड़ता” में तुम्हारी कविता मुझे बहुत अच्छी लगी.
    श्री पूनम दैया को मेरी याद.

    • शिरीषः जब यह कविता लगा रहा था तो एक बार ख़याल आया था कि इसे एक ख़ास तरह के भाषा व्यवहार के करीब पढ़ा जा सकता है पर मैंने इसे जाने दिया। मुझे एकाध अब असार्थक नज़र आने वाले पद-प्रयोगों के बावजूद यह कविता दस बरस बाद अच्छी लगी। इसकी पहली तीन और आखिरी दो पंक्तियाँ ख़ासकर। मुझे हिन्दी लेखन/समाज में शरीर के साथ सहजता नहीं दिखती। कहीं वह पूरी तरह दमित है, अनुपस्थित है कहीं वह एक ‘एग्जिबिट’ है (तथाकथित ‘बोल्ड’ लेखन में – भले वो पुरूषों का लिखा हो या स्त्रियों का) तो कहीं अशोक वाजपेयी की तरह एक अलंकरण है (पुरूष लिबिडो का एक ऐसा रमण-लोक है उनकी कविता कि उसमें स्त्री तमाम उन्मुक्त रति के बावजूद एक पुरूष-निर्मिति ही है)। मेरी यह कविता भी शरीर के साथ सहज नहीं हो पाती है जब वह शरीर/कपड़ों के बारे में कुछ रहस्यपरक माहौल बनाने लग जाती है।

      घामड़ कवियों और मनुष्यों से ही याराना हुआ है आज तक। अपने पुराने काम को घामड़ कहना नये काम को सयाना कहने की घामड़ की इस्मारट तरकीब है।

      वैसे यह दिलचस्प है अशोक वाजपेयी बहुत अनपेक्षित जगहों पर दिखाई दे रहे हैं आजकल। और प्रतिपक्ष वे अब भी रहेंगे ही, प्रतिपक्ष का प्रतिपक्ष। सुना है उनकी पत्रिका समास फिर से शुरू हो रही है।

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s