छुपी हुई चीज़ों का संग्रहालय

मैं तीन चीज़ों से डरता रहा हूँ. एक अपनी किताब छपवाने से, दो स्थायी आरामदायक नौकरी से और  तीन अखबार में लिखने से. मुझे पहली बार छपते ही पुरस्कार आदि मिल गया लेकिन मेरी और मेरे बाद की जेनरेशन में मैं अकेला रह गया हूँ जिसकी किताब नहीं आयी है. मुझे अब मनोज कुमार झा से उम्मीद है कि वो इस अकेलेपन में मेरे साथ रहेंगे कुछ दूर तक. नौकरी का आलम यह है कि नौ-दस साल में ६ जगह काम कर चुका हूँ लेकिन पिछले एक युग से एक ही जगह पर हूँ इसलिए अब बैचैनी के दौरे पड़ने लगे हैं. अखबार में लिखने के डर को गीत चतुर्वेदी ने शूट किया मुझसे दैनिक भास्कर के लिए एक संडे स्टोरी, गन पॉइंट पर, करवा कर.  इसके बाद मेरे पास डॉक्टर दुष्यंत उर्फ पापात्मा से बचने की कोई गली नहीं रह गयी. दुष्यंत राजस्थान पत्रिका की ‘सिस्टर कंसर्न’ डेली न्यूज़ की एक गंभीर और सुरुचिपूर्ण साप्ताहिक पत्रिका ‘हम लोग’ का संपादन करता है और इसलिए भी उससे बचता था कि मैं उतना सुरुचिसम्पन्न और गंभीर नहीं हूँ. बहरहाल जब उसने अपने ‘वैलेंटाईन स्पेशल’ के लिए पिछले दस बरस की मेरी प्रिय प्रेमकथाओं  पर लिखने के लिए कहा तो मुझे यकीन हो गया कि वह मुझे गंभीर वगैरह नहीं समझता. उसकी शर्त थी भारत से बाहर के काम पर बात करूं और मेरी शर्त थी मैं  प्रेमियों पर नहीं ‘पापियों’ पर लिखूंगा.  चित्र मोमिता शॉ का है.

फ्लॉबेयर का उपन्यास मादाम बोवारी एक विवाहिता के तीन पुरुषों से प्रेम की कथा है; तोल्स्तोय के आन्ना कारेनिना में आन्ना की प्रेमकथा उसके विवाह के कई बरस बाद तब शुरू होती है जब उसका बेटा बरस बरस का होने को आया है; शरतचंद्र का देवदास अपनी प्रेमिका की ससुराल के बाहर अपनी अंतिम सांस लेता है; गार्सिया मारकेस के लव इन द टाइम ऑफ कॉलेरा का नायक फ्लोरेंटिनो एरिज़ा एक विवाहिता के पति के मरने का इंतज़ार पचास बरस तक करता है और इन पचास बरसों में ६२१ स्त्रियाँ उसके जीवन में आती हैं; माइकल ओन्दात्ज़ी के दूसरे महायुद्ध की पृष्ठभूमि में घटित हो रहे उपन्यास द इंग्लिश पेशेंट में अल्मासी अपने सहकर्मी की पत्नी से प्रेम करता है और अरुंधती रॉय के द गॉड ऑफ स्माल थिंग्स में एक दूसरे से प्रेम करने वाले राहेल और एस्था भाई-बहन हैं जबकि उनकी माँ अम्मू एक दलित वेलुथा से प्रेम करती है. १८५६ में पहली बार प्रकाशित मादाम बोवारी से लेकर १९९६ में प्रकाशित अरुंधती रॉय के उपन्यास तक लगभग डेढ़ सौ बरसों में, और पहले भी, प्रेमकथाएँ बार बार हमें उस इलाके में ले जाती रही हैं जहाँ हमें चेक उपन्यासकार मिलान कुंदेरा के शब्दों में नैतिक निर्णय को स्थगित करना पड़ता है. न्यायालय या धर्मतंत्र के लिए मादाम बोवारी या आन्ना कारेनिना या अल्मासी या राहेल और एस्था का आचरण अनैतिक था और रहेगा. एक आधुनिकतम समाज व्यवस्था और सर्वाधिक न्यायपूर्ण राजनैतिक व्यवस्था भी विवाहित व्यक्तियों के प्रेम या अगम्यगमन को दंडनीय ही मानेगी लेकिन एक कलाकृति की दृष्टि में उन पात्रों पर नैतिक निर्णय आरोपित करने से ज्यादा महत्वपूर्ण कुछ और होता है. वह हमें मनुष्य होने के कुछ अधिक संश्लिष्ट अँधेरे-उजाले में आने के लिए उकसाती है, हमारे समाज-नैतिक बोध को असमंजस में डालती है और हमें जीवन की एक सरलीकृत  समझ में गर्क़ होने से बचाने का प्रयास करती है. हमारे समय में समाज-नैतिक जकडनें एक तरफ जहाँ कम हुई हैं वहीं दूसरी तरफ प्रेम को किसी सामाजिक या मजहबी या सांस्कृतिक आचार संहिता से दमित करने वाली संस्थाएँ हर समाज और संस्कृति में बनी हुई हैं. मनोवैज्ञानिक अध्ययन बताते हैं कि ये संस्थाएँ नियंत्रण करने की पुरुष फंतासी से निकली हुई सरंचनाएँ ही हैं. कलाकृतियां कभी मुखर और कभी गुपचुप तरीके से वैकल्पिक नैतिकता और वैकल्पिक सामाजिकता का निर्माण करती रही हैं. मुखर तरीके से जब वे ऐसा करती हैं तो उनको लेकर बहुत त्वरित और उत्तेजित प्रतिक्रिया होती हैं और तब  सामान्यतः उन्हें अनैतिक और सनसनीखेज कृतियाँ मान लिया जाता है. लेकिन कलाकृतियाँ हमारे बिना जाने और अक्सर बिना चाहे भी अपना काम करती रहती हैं और हम ये पाते हैं कि कभी अनैतिक मान ली गयी कृतियाँ प्रेम और नैतिकता का सबसे मर्मस्पर्शी आख्यान बन गयी हैं हैं. वे अपना काम चुपचाप करते हुए अस्तित्व के बारे में हमारी समझ को ही इस तरह बदल देती हैं कि हम आन्ना या बोवारी को दुराचारिणी स्त्रियों की तरह या राहेल या एस्था को पापपूर्ण और घृणित वासना के शिकार चरित्रों की तरह देखने की बजाय ऐसे मनुष्यों की तरह समझने की कोशिश करते हैं जिनकी आस्तित्विक परिस्थिति का समाज-नैतिक पर्यावरण के साथ संबंध असमंजस व तनाव का होता है. उनकी कथाएँ जितना उनके भीतर के संसार से हमारा परिचय कराती है उतना ही उस पर्यावरण की अपनी संरचना से भी. उन पात्रों की विडंबना में हम समाज-नैतिक पर्यावरण की अपनी विडंबनाओं को, उसके छल और उसकी असहिष्णुता को झाँकता हुआ पाते हैं.

हमारे समय में भी प्रेमकथाओं ने अपने काम करने का यह ख़ास ढंग बनाये रखा है. इयान मैकिवान के उपन्यास अटोनमेंट (2001) के एक दृश्य में एक पुस्तकालय में प्रेम-क्रीडा कर रहे दो पात्रों रॉबी और सिसिलिया को तेरह वर्षीय ब्रिओनी देख लेती है. वह सिसिलिया की छोटी बहन है और इस दृश्य को ऐसे समझती है कि साधारण परिवार से आने वाला रॉबी उसकी बहन के साथ जबरदस्ती कर रहा है. बाद में ब्रिओनी की गवाही पर रॉबी को बच्चों को अपहृत करने के ऐसे अपराध में जेल हो जाती है जो उसने नहीं किया. ब्रिओनी को नहीं मालूम कि वह अपराध किसने किया लेकिन पुस्तकालय वाले दृश्य का असर उसके चित्त पर ऐसा है कि वह रॉबी को उसके ‘मूल अपराध’ के लिये दंड देती है. एक तेरह वर्षीय अल्पवयस्क को प्रेम के ‘अपराध’ को नियंत्रित करने वाली  नैतिक और अंशतः एक कानूनी शक्ति की तरह प्रस्तुत करते हुए मैकिवान ने एक ऐसा दृश्य घटित किया है जो हमारी चेतना को एक तरफ ब्रिओनी और दूसरी तरफ रॉबी और सिसिलिया की यातनाओं का हिस्सा बना देता है. ब्रिओनी बाद में एक उपन्यासकार बनती है और अपने उपन्यास में युद्ध में अकाल मर चुके रॉबी और सिसिलिया के साथ ‘न्याय’ करती हैः उपन्यास में उनका मिलन हो जाता है.

गार्सिया मारकेस  के मॉय मेलन्कलि व्होर्स (2004) का मुख्य पात्र नब्बे बरस का होने वाला है और अपने जन्मदिन पर वह खुद को एक कुँआरी लड़की का संसर्ग उपहार में देता है. यह अविवाहित अनाम पात्र जो धन के बदले में पाँच सौ से अधिक स्त्रियों के साथ संसर्ग कर चुका है सीधे-सीधे एक पतित चरित्र जान पड़ता है और उसकी कामना बहुत विकृत किस्म की वासना. लेकिन मारकेस ने इस चरित्र को इस प्रकार गढ़ा है कि वह प्रेम के सच्चे,परिपूर्ण करने वाले अनुभव से वंचित एक पात्र है, एक गहरे अर्थ में खुद भी एक कुँआरा, जो अपनी मृत्यु का सामना करते हुए अपने ‘पहले’ प्रेम का आविष्कार करता है.

एनी प्रू की कहानी पर आधारित तीन ऑस्कर पुरस्कार जीतने वाली फिल्म ब्रोकबैक माउन्टेन बीसवीं शताब्दी के छठे दशक में अमेरिका के देहात में दो पुरूष समलैंगिक प्रेमियों जैक और एनिस की कथा है जो अपने समय के समाज-नैतिक परिदृश्य के असर में एक दूसरे को छोड़कर ‘सामान्य’, विषमलिंगी विवाह कर लेते हैं और उनमें से एक, जैक, बरसों बाद समलैंगिकता-विरोधी हिंसा में मार दिया जाता है.

निर्देशक वाँग कार वाई की फिल्म इन द मूड फॉर लव (2000) में दो विवाहित पड़ौसियों चाउ और सो लाई-झेन को संदेह है कि उनके जीवनसाथी मिलकर उन्हें धोखा दे रहे हैं। यह जानने की कोशिश में कि उनके जीवनसाथी उनसे छल करते हुए क्या करते होंगे वे एक दूसरे के करीब आ जाते हैं। लेकिन चाउ और सो एक दूसरे को छोड़ देने का फैसला करते हैं क्योंकि वे अपने जीवनसाथियों ‘जैसे’ नहीं हो सकते.

ये उपन्यास और फिल्में इस बात का प्रमाण हैं कि हमारे समय में भी गंभीर कलाकृतियाँ प्रेम को एक सपाट सनसनीखेज़ किस्से में बदल दिये जाने का एक सर्जनात्मक प्रतिवाद बनी हुई हैं. इक्कीसवीं शताब्दी के पहले दशक की प्रेमकथाओं का कोई भी ज़िक्र तुर्क उपन्यासकार ओरहान पामुक के नवीनतम उपन्यास द म्यूजियम ऑफ इन्नोसेंस (2008) के बिना अधूरा होगा. इस उपन्यास में व्यवसायी कमाल की अपने से बारह बरस छोटी, खुद उसके मुकाबले में बहुत ‘गरीब’ और दूर की रिश्तेदार फुसुन से प्रेम की कथा तीस बरस के लम्बे वक़्त में फैली हुई है. कमाल फुसुन को जब पहली बार देखता है वह अपनी मंगेतर सिबिल के साथ है. ‘बहुत आसानी से’ दोनों के बीच शारिरिक प्रेम घटित होता है। फुसुन की ‘आधुनिकता’ – स्विम सूट पहनना, ब्यूटी कॉन्टेस्ट में भाग लेना, विवाह-पूर्व शारीरिक संबंध को लेकर सहज होना – से अचंभित कमाल उससे दूर भागने की, अंततः असफल, कोशिश करता है. वह जब तक फुसुन के जीवन में लौट पाता है, फुसुन विवाह कर चुकी होती है और अब उसकी ‘पारंपरिकता’ उन्हें एक दूसरे से दूर रखेगी। कमाल हर उस चीज़ का संग्रह करने लगता है जिसे फुसुन ने कभी छुआ हो और उसका यह संग्रह ही ‘अबोधता का संग्रहालय’ है जिसका संकेत उपन्यास के शीर्षक में है। कमाल का फुसुन के लिये प्रेम पारंपरिकता और आधुनिकता के बीच लगातार फंसे रहने वाले तुर्की समाज की कथा बन जाता है।  

प्रेमकथाएँ भी शायद एक तरह का संग्रहालय होती हैं; हमारे और समाज के चेतन-अवचेतन का संग्रहालय जो प्रदर्शित चीज़ों से कहीं ज्यादा छुपी हुई चीज़ों से सजा रहता है। अगर आप का कुछ खो गया है तो एक बार वहाँ हो आईये, हो सकता है मिल जाये!  

 

 

2 विचार “छुपी हुई चीज़ों का संग्रहालय&rdquo पर;

  1. पूरा पढ़ा बहुत ध्‍यान से। बहुत अच्‍छा और बहुत जरूरी। मैं जब भी कहती हूं कि पहले प्रेम करूंगी, उसके बाद शादी तो मां का जवाब होता है कि शादी करने पर प्रेम तो अपने आप ही हो जाता है। मैं उन्‍हें समझा नहीं सकती। इस दुनिया की सारी कार्रवाइयां अपनी सड़ी हुई संस्‍थाओं को बनाए रखने और चलाने के लिए ही हैं। किताबों में वो सीमाएं जरूर टूटती हैं, लेकिन जैसाकि बारह साल पहले मां ने अन्‍ना कारेनिना के बारे में मुझे ये समझाने की हर संभव कोशिश की थी कि तोल्‍स्‍तोय ने अन्‍ना को पटरियों तक इसीलिए पहुंचा दिया क्‍योंकि सामाजिक मान्‍यताओं के हिसाब से उसने अपराध किया था और एक तथाकथित वामपंथी संपादक ने एक बार गॉड ऑफ स्‍मॉल थिंग्‍स के बारे में कहा था कि वो एक स्‍वैराचारी किस्‍म का अश्‍लील उपन्‍यास है, दुनिया के रस्‍मो रिवाज अपनी जगह कायम हैं।

    • यह सही है कि किताबें उन चीजों को लेकर ज़्यादा सहानूभूतिपूर्ण होती हैं जिनको ले कर बाहर ‘यथार्थ’ में जानें ली और दी जाती हैं। पक्के कैथलिक तोलस्तोय ने खुद भी यही सोचकर आन्ना की कहानी लिखना शुरू की थी कि बाकी ‘पापी स्त्रियां’ आन्ना के अंजाम से सबक ले सकें। लेकिन वे अपने लेखन के हाथों से छले गये। आन्ना ने दूसरी स्त्रियों को ‘पाप’ के रास्ते पर चलना भले न सिखाया हो उससे दूर रहना तो बिल्कुल नहीं। यही बात देवदास के बारे में है। प्रतिलिपि और नया ज्ञानोदय के एक प्रेम विशेषांक में मेरा एक लेख है देवदास पर, उसमें यह आर्गुमेंट है।

      मैं देवदास मुकर्जी बनना चाहता हूँ

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