आप लिखते रहिये इसी तरह हम कारिंदगी करते रहेंगे

1. 

Jose Punnamparambil नामक एक सज्जन का मेल आया परसों कि वे भारतीय कविता की एक संचयिता जर्मन में प्रकाशित कर रहे हैं अगले साल तक। 34 भारतीय कवियों की 50 कवितायें। सच्चिदानंदन इन्ट्रो लिखेंगे। विनोद कुमार शुक्ल की एक कविता चुनी है, उनकी अनुमति चाहिये। उनसे सम्पर्क करा दीजिये।

2.

21 फरवरी, 2010 को वारिंगटन (यूके) से Dr. Chetan Jakaraddi का मेल आया कि उन्होंने बीबीसी पर तरूण भारतीय की डॉक्यूमेंटरी देखी और उसमें चित्रित एक स्त्री पात्र की मदद करना चाहते हैं और उनके पास तरूण का कोई कॉन्टेक्ट नहीं।

3.

9 फरवरी, 2010 को Tübingen/ Germany से एक जर्मन स्टूडेंट योहाना हान का मेल आया कि वह सारा राय की कुछ कहानियों का अनुवाद जर्मन में करना चाहती है, सारा से सम्पर्क करा दीजिये।

4.

सितंबर 30, 2009 को प्रोफेसर विलियम रेडिस, दक्षिण एशिया विभाग, यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन से मेल आया कि वे एक पीएचडी थिसिस जंचवाने के लिये ऑस्कार पुजोल को ढूंढ रहे हैं, उन तक यह पैगाम पहुंचा दीजिये।

5.

18 अप्रैल 2009 को सार्क, नेपाल चैप्टर से नबीन चित्रकार का मैसेज आया कि वे अरूण कमल और गगन गिल को काठमांडू बुलाना चाहते हैं पर नहीं मालूम सम्पर्क कैसे करें।

6.

नोबेल विजेता नूट हाम्सुन की वंशज रेजीन हाम्सुन को पता चला कि नूट के उपन्यास हंगर और पान हिन्दी में अनूदित हुए हैं और रूस्तम सिंह ने किये हैं। वो कहां मिलेंगे यह पूछता हुआ मेल आया 25 जनवरी 2009 को। मैंने कहा आपको गलत सूचना है अनुवाद तेजी ग्रोवर ने किये हैं पर आपका मुकाम वही रहेगा दोनों का पता एक ही है!

प्रतिलिपि का संपादन करने का यह सबसे दिलचस्प और सुखद पहलू है। किसी लेखक का कोई दोस्त, भावी अनुवादक या भारी प्रशंसक हर दसवें, पन्द्रहवें दिन प्रकट हो जाता है। हमारे जिन लेखकों के नाम ये संदेशे होते हैं सामान्यतः वे बड़े खुश होते हैं, शुक्रिया करते हैं, हमारी, मैग़जीन की तारीफ भी कर डालते हैं जो उन्होंने अब तक नहीं की होती है🙂 हालांकि एकाध ने शुक्रिया तो क्या एकनॉलेज भी नहीं किया हमारी उस पर्टिकुलर मेल को।

लेकिन कल का अनुभव अनोखा और प्रेरक था। मैंने विनोदजी को फोन करके बताया, कहा अपना आईडी दीजिये फॉरवर्ड कर देता हूं वो बोले नहीं आप ही हमारी तरफ से अनुमति दे दीजिये! मैंने कहा आपका नम्बर दे देता हूं, बोले जरूरत है क्या?

?!

मेरे मुंह से निकलते निकलते रह गया जी बिल्कुल नहीं! आप लिखते रहिये इसी तरह हम कारिंदगी करते रहेंगे।

॥॥॥

मुझे अपनी कविता याद आयी जो विनोद जी के लिये है. वो कविता प्रिंट में इन्द्रप्रस्थ भारती में छप गयी है यह सूचना है पर अंक मुझे मिला नहीं शायद किसी को नहीं मिला। मैंने उन्हें न इस कविता के बारे में बताया है न उस लेख के बारे में जो उनकी एक कविता पर मैंने लिखा है। जब मुझे वो दस बरस पहले भोपाल में मिले थे और पूरे दिन अपने एक ख़राब रेडियो का किस्सा सुनाते रहे थे तब से अब तक हमारा संबंध ऐसे ही चला है।

॥॥॥

अभिव्यक्त

नीम का अर्थ पीपल था पीपल का बरगद बरगद का तुलसी इसी तरह कमल का गुलाब गुलाब का बेला बेला का बोगेनवीलिया पर शुक्र है पेड़ का अर्थ कोई पेड़ फूल का कोई फूल ही था इतना रहता था मैं मनुष्यों के बीच फिर भी कबीर का अर्थ घनानंद मीरां का अर्थ महादेवी नहीं था मेरी सारी गफ़लत उन के बारे में थी जो मनुष्य नहीं थे मैं उन दिनों की बात कर रहा हूँ जब मेरा अर्थ तुम हो जातीं अगर मैं अपना अर्थ रह गया होता मैं उन दिनों की बात कर रहा हूँ जब पेड़ों से झूल रही थीं लाशें हर तरफ और कई दिनों से विनोद कुमार शुक्ल की कोई कविता नहीं थी जीवन में

PRATILIPI / प्रतिलिपि » विनोद कुमार शुक्ल / Vinod Kumar Shukla

3 विचार “आप लिखते रहिये इसी तरह हम कारिंदगी करते रहेंगे&rdquo पर;

  1. क्या बात है! विनोद कुमार शुक्ल की रचना ’नौकर की कमीज़’ पढ़कर एक समय मैं चकित रह गया था. उनकी कहानी पर अमित दत्ता की फ़िल्म देखी थी ओशियंस में. ’पेड़ पर कमरा’ तथा ’आदमी की औरत’ नाम था. वैसे ही ये कविता. उनके लिए, हमारे लिए.

    ब्लॉग का लिंक अपने ब्लॉग की बगलपट्टी में जोड़ रहा हूँ. अनुमति है ना?

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