सुनो, मैं बताता हूँ आतंक क्या हैः इन्द्र सिन्हा

 प्रतिलिपि का पहला वार्षिकांक आतंक के अनुभव पर एकाग्र था। आईडिया मेरा ही था, राहुल और शिव उत्साहित थे – शिव शायद थोड़ा कम! हमने  आतंक के डिस्कोर्स को उसे ‘पर्फार्म’ करने वालों – राज्य, ‘आतंकवादी समूह’ आदि – के डिस्कोर्स की बजाय उसके पीड़ित के अनुभव की तरह पढ़ने की, एक हमदर्द पाठ बनाने की और ‘आतंक’ को सिर्फ एक ही अर्थ ‘आतंकवाद’ में घटाए जाने का प्रतिरोध करने की कोशिश की। आतंक के विभिन्न प्रकार के अनुभवों के सिलसिले में हमें भोपाल गैस हादसे पर इंद्र सिंहा का एक टैक्स्ट मिला। इंद्र का इस हादसे के बारे में लिखा गया उपन्यास एनीमल’स पीपुल कई अर्थों में बहुत प्रेरक है। इस उपन्यास को जिस तरह  रिसीव किया गया भारत से बाहर, उसने इस हादसे के पीडितों के लिये न्याय पाने को लड़ रहे एक्टिविस्ट समूहों की बहुत मदद की। 2007 में यह मैन बुकर के लिये शॉर्ट लिस्ट हुआ और 2008 में इसे कॉमनवेल्थ रीजनल पुरस्कार मिला।

यहां अनूदित पाठ उनके उपन्यास से नहीं है। यह एक अलग आलेख है जो मूल अंग्रेजी में, सबसे पहले, डेली टेलीग्रॉफ में छपा था। इन्द्र तक हमारा संदेश पहुंचाने का काम संभावना क्लिनिक, भोपाल के सतीनाथ षडंगी ने किया।  फोटोः रघु राय/ यहां से साभार।

अँधेरे में चीखें सुनकर उठ बैठना – मुझसे पूछो तो आतंक यही है.

मेरा मुँह और आँखें जल रही हैं. कमरे में सफ़ेद बादल हैं. बच्चे खांस रहे हैं. चिल्लाती आवाजें कह रही हैं – ”भागो, भागो.” बिना समझे कि हुआ क्या है मैं अपनी पत्नी से कहता हूँ कि बच्चों को ले के बाहर निकल जाए. कोई चीखता है, “यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री में धमाका हुआ है”. बाहर गली में गैस के बादल इतने घने हैं कि बिजली के खम्भे की रोशनी भूरी हो गयी है. लोग पास से हो कर भाग रहे हैं. वे ऐसे एक दूसरे से भिड़ते, टकराते है जैसे नदी में पानी की धाराएँ. कुछ ने सिर्फ अन्दर वाले कपडे पहने हैं, कुछ नंगे हैं. जो गिर जाते हैं, फिर उठ नहीं पाते. गैस से आँखें चुंधिया रही हैं. चारों ओर पीड़ा है. भगदड़ में हमारे बच्चों के हाथ हमारे हाथों से छिटक जाते हैं. वे खो गए. हम उनके नाम पुकारते हैं.

हमारे चारों ओर लोग मर रहे हैं. कईयों की टांगों पर से गू और मूत बह रहा है. कुछ का दम घुट रहा है. दर्द कम करने के लिए लोग गंदी नालियों के पानी से आँखें छींट रहे हैं. एक औरत ने अपना अजन्मा बच्चा खो दिया. जैसे ही वो भागने लगी उसके गर्भ से बच्चा गिर पड़ा, गली में. जो कुछ मैंने देखा है, उसे क्या नाम दूं?

अगली सुबह मैं मुर्दों के ढेर में अपने कुनबे को ढूँढता हूँ. पेडों से काली, भुरभुरी पत्तियाँ गिर रही हैं. मुझे अपने बच्चे को दफ़नाता हुआ एक आदमी दिखता है. मुझे देख कर कहता है, ‘गुड मॉर्निंग’. हम दोनों बिलखने लगते हैं.

जैसे जैसे दिन गुजरते हैं, हम जो बच गए कभी पीड़ा, कभी बुखार, कभी सर चकराते दौरों, कभी मितली, कभी सांस की कमी, कभी टांगो के दर्द से कराहते हैं. हमें नहीं पता हम जियेंगे या मरेंगे. हस्पताल के डाक्टर भी नहीं जानते क्योंकि जिस कंपनी ने हमारे बच्चों को मार डाला वो गैस के बारे में जानकारी नहीं देगी क्योंकि वो उनका ‘ट्रेड सीक्रेट’ है.

लोगों में डर भर गया है. हमारी साँस ठीक नहीं रहती, हम बीमार है, काम नहीं कर सकते. हर किसी का एक ही सवाल है – हम जिन्दा कैसे रहेंगें? मैं अपनी पीठ पर बोरे लदता था, अब मैं अपना वजन बमुश्किल उठा पता हूँ. मैं सोचता हूँ, अगर मैं भूखा मर भी गया तो क्या? मुझे कहाँ अब कोई परिवार पालना है! गैस के कहर ने हमारे हाथों से सब छीन गया. गैस से पहले मैं गरीब था, उसके बाद भिखारी हो गया.

महीनों गुजर गए. आप जानना चाहते हैं आतंक क्या होता है? आतंक है ऐसी औरतों को देखना जो बच्चे पैदा करने से डरती है, हस्पताल आती हैं पेशाब का सैम्पल लेकर, टेस्ट कराने के लिए गिडगिडाती हुई. आतंक है छोटे छोटे सर वाले ‘कार्बाइड शिशुओं’ को देखना जो मरे हुए पैदा होते हैं, जिनका मांस नीली जैली जैसा होता है और आँखें उबले हुए अण्डों की तरह घूरती हैं.

बारह साल गुजर जाते हैं. लोगों की हालत में कोई सुधार नहीं होता. यूनियन कार्बाइड अब भी जानकारी देने को तैयार नहीं. हम अब भी बीमार है, हमें नहीं पता आगे क्या होना बाकी है? शुरुआती दिनों में ८००० लोग मरे थे लेकिन मरना कभी थमा नहीं. बहुतों की इच्छा है वे मर गए होते. बहुत सारी लड़कियां जो उस रात के आसपास जन्मीं या तब बच्चियां थीं, उनका मासिक चक्र ठीक नहीं हैं. कईयों को तीन महीने में एक बार तो कुछ को एक महीनें में तीन बार होता है. वे इसे चुपचाप सहन करती हैं क्योंकि ऐसी चीज़ों के बारे में बात नहीं की जाती। अगर उनके बच्चे नहीं होने वाले तो उनसे शादी कौन करेगा?

समय और गुजर जाता है और एक नया आतंक सामने आता है. वे जो उस रात भोपाल नहीं थे वे भी उसी तरह के लक्षणों के साथ बीमार होने लगते है जो गैस पीडितों में थे. वे भी वैसे ही खांसने लगते हैं, छाती में दर्द रहने लगता है, चमड़ी जल जाती है, ऐसे घाव और बिवाईयाँ जो कभी भरेंगे नहीं. उनका भी सर घूमता है और साँस की तकलीफ होती है. क्यों? पता चलता है हमारे कुओं में कई तरह के जहर हैं. जहर वहीं से आ रहे हैं जहाँ से गैस आई थी: यूनियन कार्बाइड की फैक्ट्री. वे लोग कैमिकल के ढेर के ढेर खुले में छोड़ गए. जो बारिश में बहकर मिट्टी में और हमारे कुओं में घुल गए. क्या हैरानी कि पानी का स्वाद बहुत ख़राब है. जलन होती है. पानी के जहर भी हमारे शरीरों में वैसे ही जमा हो जायेंगे, जैसे गैस वाले जहर हुए थे. उनसे कैंसर हो सकता है, बच्चे विकृत पैदा हो सकते हैं. डॉक्टर कहते हैं ये जहर हमारे खून में हैं, माँओं के दूध में हैं. औरतें बिलखती हैं क्योंकि उन्हें पता चल गया है कि उन्होंने अपने बच्चों को जहर पिलाया है. यूनियन कार्बाईड को दस साल यह बात पता थी कि उनकी फैक्ट्री का पानी और मिट्टी जहरीले हैं. खतरे को भाँपते हुए वो चुप रहे. वे चुप रहे बावज़ूद इसके कि हम वही लोग थे जिनके परिवारों को उन्होंने खत्म किया था, जिनको उन्होंने हमेशा के लिये बीमार कर दिया था.

वे अब भी अपनी फैक्ट्री की सफ़ाई करवाने से इंकार करते है.

मैंने आपको बता दिया कि आतंक क्या है, अब ये आप बताईये कि आतंकवादी कौन है?

सुनो, मैं बताता हूँ आतंक क्या हैः इन्द्र सिन्हा&rdquo पर एक विचार;

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