विधि का विधानः सूरज का सातवां घोड़ा

किसी फिल्म पर पहली बार लिखने का मौका तब हुआ था जब जयपुर में ईरानी फिल्मों के एक महोत्सव में हमने अब्बास किआरोस्तामी, माज़िद मज़ीदी और समीरा मख़मलबाफ़ की फिल्में देखीं। कुछ दिन बाद विश्वंभर ने अपनी शिक्षा-पत्रिका के लिये मुझे समीरा की तख्त-ए-सियाह (ब्लैकबोर्ड्स) पर लिखने के लिये कहा।

जिन फिल्मों पर लिखने का मन है – मुगल-ए-आजम और शिरीन – उन पर लिखना जाने कब  हो पायेगा लेकिन इस बीच सूरज का सातवां घोड़ा पर लिख लिया, प्रतिलिपि के एक अंक के लिये।

यह फिल्म अरसा पहले दूरदर्शन पर देखी थी, उपन्यास बाद में पढ़ा था। यह निबंध फिल्म और उपन्यास की संरचना के बारे में है।

श्याम के सपने

स्वर्ग के फाटक पर रामधन खड़ा है अन्दर जमना सफ़ेद कपडे पहने हुए एकदम शांत गंभीर फाटक के ऊपर आपने वो जो नाल दिखायी थी घोडे की वो नाल जड़ी हुई है दूर क्षितिज से एक लकीर की तरह रास्ता चला जा रहा है उसी पे तन्ना घिसटते हुए जा रहा है उसके पीछे उसकी दो कटी हुई टाँगे चली आ रही हैं और आकर वो फाटक पर रुकती हैं तन्ना जाकर जमना से मिलता है और पीछे से किसी बच्चे के रोने की आवाज़ आती है तन्ना का बच्चा है फ़िर कहीं दूर किसी स्टेशन से डाकगाड़ी की आवाज़ आती है

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हिन्दी सिनेमा में कथा कहने की विधियां बहुत नहीं रही हैं. वैसे ही जैसे हिन्दी साहित्य में भी कथा अधिक विधियों से नहीं कही गयी है। देवकी नंदन खत्री की विधि, प्रेमचंद की विधि, हजारी प्रसाद द्विवेदी की विधि, रेणु की विधि, निर्मल वर्मा की विधि, कृष्णा सोबती की विधि, मनोहर श्याम जोशी की विधि, कृष्ण बलदेव वैद की विधि, विनोद कुमार शुक्ल की विधि, उदय प्रकाश और उदयन वाजपेयी की विधियां, गीतांजलि श्री और अलका सरावगी की विधियां। और कुछ वे विधियां जिन का बहुत विकास नहीं हुआ उन कथाकारों के अपने कथा संसार के बाहर – अज्ञेय, कुंवर नारायण, रघुवीर सहाय, बिज्जी, ध्रुव शुक्ल । धर्मवीर भारती की कथा कहने की विधि सामान्यतः इन सबसे भिन्न नहीं है। किंतु उपन्यास – सूरज का सातवां घोड़ा – एक ऐसी विधि, हिन्दी में ढूंढता है जिसका स्वयं उसके अतिरिक्त कोई उदाहरण नहीं। यह, अपनी पर्याप्त प्रसिद्धि के बावजूद, एक अकेली कृति है।

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हिन्दी सिनेमा में भी कथा कहने की बहुत विधिया नहीं रही हैं। और श्याम बेनेगल की कथा कहने की विधि सामान्यतः उन बहुत थोड़ी-सी विधियों से भिन्न नहीं रही है। संभवतः यही वज़ह है वे बार बार साहित्यिक कृतियों के पास जाते रहें हैं। किसी कथा-विधि की खोज में। न सिर्फ़ उनके अपने सिनेमा में, हिन्दी सिनेमा में भी सूरज का सातवां घोड़ा एक अकेली कृति है।

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बेनेगल की सूरज का सातवां घोड़ा एक उपन्यास है, सिनेमा नहीं। और वह उस हद तक एक उपन्यास है, जिस हद तक धर्मवीर भारती का सूरज का सातवां घोड़ा एक उपन्यास है – उसी (की) विधि से। यह कैसे है, इसे समझने के प्रयत्न में ही यह निबंध लिखा जा सकेगा।

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धर्मवीर भारती के सूरज का सातवां घोड़ा की कथा-योजना एक कथावाचक और उसकी श्रोतामंडली की पारंपरिक (लोक?) संरचना से बुनी जाती है। माणिक मुल्ला (मुल्ला नसरूद्दीन की तर्ज़ पर तो नहीं?) कथावाचक हैं। कथा-‘व्याख्या’ अधिक करने वाली उनकी मंडली कथा-रस लेने वाली पारंपरिक मंडली से किंचित भिन्न है, उसी तरह जैसे ‘आत्मकथात्मक’ कथाएं सुनाने वाले उनके कथावाचक माणिक मुल्ला अनात्मकथाएं सुनाने वाले पारंपरिक कथावाचक से भिन्न हैं। उपन्यास माणिक द्वारा सुनायी गई तीन कथाओं से बुना जाता है। माणिक की तीन कथाओं के पात्र तीनों कथाओं में उपस्थित हैं, आत्मकथाकार माणिक तो है ही। माणिक अलग-अलग सत्रों में ये कथाएं सुनाते हैं। श्रोता वही तीन। पहली कथा दूसरी में, तीसरी में, दूसरी और तीसरी एक दूसरे में, सभी कथाएं एक दूसरे में आवागमन करती हैं। किंतु यह इस कथा-योजना का विशेष नहीं है। विशेष है उस क्षण और दृश्य के संरचनात्मक मूल्य की अचूक पहचान जिससे एक कथा दूसरी से जुड़ती है। धर्मवीर भारती के सूरज का सातवां घोड़ा में यह संरचनात्मक मूल्य अदृश्य बना रहता है। बेनेगल की सूरज का सातवां घोड़ा में यह कथाओं का सबसे महत्वपूर्ण दृश्य बन जाता है। इसे समझने के लिये आईये  हम ऐसे कुछ दृश्यों का द्वार खटखटाएं।

जमुना-तन्ना दृश्यावली

फ़िल्म के ६/७ वे मिनट में हम जमुना और तन्ना को पहली बार देखते हैं. माणिक मुल्ला स्कूल में पढ़ते हैं, और गाय को रोटी देने के लिए पड़ौसी के अहाते में जाना पड़ता है उन्हें. माणिक के पास जमुना को देने के लिए देवदास की एक प्रति है. जमुना वो ले पाए उससे पहले छत पर तन्ना आता है. जमुना उससे मिलने छत की सीढियां चढ़ने लगती है. फ़िल्म के ४७वे मिनट में यही दृश्य लौटता है. इस बार हम छत तक जाने के लिए जमुना के साथ, उसके घर की सीढियां नहीं; तन्ना के साथ तन्ना के घर की सीढियां चढ़ते हैं. अब हम समझते हैं तन्ना वैसा क्यूँ लगा था उस ६/७वे मिनट वाले दृश्य में. अब हम कहानी को तन्ना की तरफ़ से देखते हैं.

इसी तरह १०वे मिनट में जमुना छत से नीचे उतर कर आ रही है, उदास. ५२वे मिनट में हम जानेंगे हुआ क्या था जब हम तन्ना के साथ आयेंगे जमना से मिलने; १३वे मिनट का जमुना-तन्ना दृश्य वापिस ६३वे मिनट में खुलेगा।

क्या तन्ना की मृत्यु हो गयी है?

४०/४१वे मिनट में माणिक मुल्ला यह बता रहे हैं कि घोडे की नाल उनके पास कैसे आयी अगर उस नाल की अंगूठी बन चुकी थी? रामधन स्टेशन पर माणिक को ‘पिरजन्ट’ में देता है नाल और कहता है बहुत बुरा हुआ तन्ना बाबू के साथ भगवान उनकी आत्मा को शांति दें. क्या तन्ना की मृत्यु हो गयी या होने वाली है?  यह हमें फिल्म थोड़ी देर बाद बतायेगी, ७५वे मिनट में जब माणिक लिलि की कथा सुना रहे होंगे।

क्या सती की हत्या हो गई?

५३/५४वे मिनट में महेसर मोहल्ले की एक दूकान पर है. वहां हम सती को पहली बार देखते हैं और उसके चाकू को भी. १००/१०१वे मिनट में यह पता चलेगा कि माणिक-सती में क्या बात हुई सती के दूकान से निकलने के बाद. ७०वे मिनट में वही दुकानदार मोहल्ले के लोगों को इकठ्ठा करके बता रहा है कि उसने कल रात एक लाश देखी. क्या सती की हत्या हो गयी? माणिक मुल्ला, मोहल्ले वाले और हम इस कथा के दर्शक सब यही समझते रहेंगे कि सती की हत्या हो गई। फ़िल्म के आखिरी दृश्य में हम यह पाएंगे कि सती जीवित है. हत्या किसकी हुई थी?

श्याम के सपने

आकाश के बीच एक चिमनी से निकलने वाले धुएँ की तरह एक सतरंगा इन्द्रधनुष आहिस्ता आहिस्ता उगने लगता है फ़िर बायीं ओर से दो सुलगते होंठ और फ़िर दायीं ओर से दो कांपते होंठ दोनों इन्द्रधनुष के नज़दीक आके रुक जाते हैं ये मानिक और लिलि के होंठ थे  फ़िर देखता हूँ  जमीन पर एक हाथगाड़ी जिसे महेसर दलाल खींच रहा है उसमें बच्चे हैं लिलि का बच्चा सती का बच्चा जमना का बच्चा फ़िर चमन ठाकुर का कटा हुआ हाथ अजगर की तरह रेंगते हुए आता है और बच्चों का गला दबाने लगता है फ़िर देखता हूँ कि  होंठ धीरे धीरे और नज़दीक आने लगते हैं जैसे ही होंठ और नज़दीक आते हैं तो तन्ना के दोनों कटे हुए पैर राक्षस की तरह उन बच्चों को कुचलने लगते हैं औरतें रोने लगती हैं माताएं सिसकने लगती है जमना लिलि और सती तीनों फ़िर देखता हूँ कि अचानक काला चाकू आकर जैसे ही होंठ आपस में मिलने लगते हैं तो काला चाकू आके इन्द्रधनुष को बीच में से काट देता है और बस वो दोनों कटे हुए होंठ पके हुए लोथड़े की तरह कटते हैं और ज़मीन पर गिर कर उछलने लगते हैं एकदम चीलें चीलें चीलें चीलें अनगनित चीलें टिड्डियों की तरह….

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इससे पहले कि बहुत देर हो जाये (यह निबंध अब कभी-भी समाप्त होने वाला है), मैं आपका परिचय माणिक मुल्ला की श्रोतामंडली से करा देता हूँ. एक ओंकार हैं – क्रिटिकल, हर चीज़ की मार्क्सवादी, समाजवादी व्याख्या कर सकने वाले, ‘ऐसी जो ख़ुद कार्ल मार्क्स भी नहीं सोच पाते’ और माणिक मुल्ला के नायकत्व को लेकर संदेहग्रस्त. दूसरे हैं प्रकाश, लेखक से आदर्शवादी होने की अपेक्षा करने वाले, किंचित भाव-भरे और तीसरे हैं श्याम – ‘व्याख्या-रस’ में जिनका मन सबसे कम लगता है और जिन्हें वे सपने आते हैं जो हमने इस निबंध के बीच बीच में उनके अपने शब्दों में अटका दिये हैं.

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आपको इस विधि से पढ़ी-सुनी-देखी कोई हिन्दी कथा याद आयी अब तक का लिखा पढ़कर?

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धर्मवीर भारती के सूरज का सातवां घोड़ा और श्याम बेनेगल की सूरज का सातवां घोड़ा में कथा इसी विधि कही जाती है. बावजूद कथावाचक माणिक मुल्ला के इस विश्वास के कि ‘टेक्निक की ज़रूरत उन लेखकों को होती है जिनके पास कहने के लिए कुछ नहीं होता’. माणिक मुल्ला कभी कवि होते थे और उनकी कवितायें अख़बारों में प्रकाशित भी होती थीं. पर जो कहानियाँ वे सुनाते हैं, उन्हें लिखते नहीं. और माणिक मुल्ला उन तीन कथाओं – जमुना, लिली, सती – के नायक-वाचक भलें हों जो वे सुनाते हैं, जो कि मिलकर एक तरह से यह उपन्यास है, धर्मवीर भारती और श्याम बेनेगल का, लेकिन इस उपन्यास का वाचक कोई और है. नहीं, वो वाचक नहीं, लेखक है. उसके लिए कथा का चरित्र (माणिक की तरह) या व्याख्याकार (ओंकार या प्रकाश की तरह) होना अनिवार्य नहीं. उसके लिए कुछ और अनिवार्य है? क्या?

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यह कथा प्रेम के देवदास रूपक का एक मार्क्सवादी प्रत्याख्यान है, प्रेम पर ‘आर्थिक प्रभाव’ की कथा, जैसा वाचक माणिक बार बार कहते हैं. देवदास एक पुस्तक के रूप में, एक रूपक के रूप में इस कथा के और इसके वाचक माणिक के अवचेतन की गाँठ है. यह एक कथा में एक पुस्तक देवदास की हत्या की कथा है. लेकिन यही कथा एक लेखक के जन्म की भी कथा है. कौन है वो लेखक?

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श्याम बेनेगल की सूरज का सातवाँ घोड़ा, जैसा हमने पहले कहा, उस हद तक एक उपन्यास है जिस हद तक धर्मवीर भारती का सूरज का सातवाँ घोड़ा. बेनेगल श्याम के सपनों को सिनेमा की भाषा में कहने की विधि का आविष्कार नहीं करते. फ़िल्म में सपने ‘नैरेशन’ की तरह ही, उपन्यास की तरह ही घटित होते हैं. हम किसी के लेखक बनने की प्रक्रिया से, इबारत से सिनेमा की विधि से नहीं मिल पाते. यही इस विधि का – सिनेमा के उपन्यास होने की विधि का – विधान है.

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फ़िल्म के पहले दृश्य में श्याम गुलाम मोहम्मद शेख की एक पेंटिंग देख रहा है.  फ़िल्म का आख़िरी दृश्य वहीं है उसी पेटिंग के सामने. श्याम खड़ा है. वह कह रहा है ‘उस के बाद माणिक मुल्ला गायब हो गए. पता नहीं उनका क्या हुआ. लेकिन मैं आगे चलकर लेखक ज़रूर बन गया.’

हमें पूरा विश्वास है आप यह नोट करना नहीं भूले कि श्याम को सपने में ‘सती का बच्चा’ दिखा था, जबकि माणिक मुल्ला की सुनायी कहानी में सती बिना मां बने मर चुकी थी।

और यह तो आप, बाद में, १२६वे मिनट में देखेंगे ही कि सती अपने बच्चे के साथ, जीवित लौट आयी है, और उस दृश्य में एक हाथगाड़ी भी है…..

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