आज का दिन दादा के नामः पीयूष दईया को कृष्ण बलदेव वैद फेलोशिप

मेरे पहले संपादक का नाम पीयूष दईया होना था.

 एक दोपहर एक मित्र के साथ एक अजनबी मेरे घर आया. वहाँ से हम एक स्मोकिंग ज़ोन में गए जहाँ दोनों ने मेरी कुछ कवितायें सुनीं. जिस अंदाज़ से पीयूष ने कहा ‘अच्छी हैं’ मुझे वो मेनेरिज़्म बहुत अफेक्टेड लगा. घंटे भर में वो मुलाकात खत्म हो गयी, दुबारा हो ऐसी कोई इच्छा कम-अज-कम मुझमें जगाए बिना (यह बाद में पता चलना था कि वह मेनेरिज़्म नहीं, उनके होने का ढब था). 

उसके कई महीनों बाद एक पोस्टकार्ड आया: मुझे श्री अशोक वाजपेयी ने एक पत्रिका ‘बहुवचन’ का संपादक बनाया है, उसके पहले अंक में आपकी कवितायें प्रकाशित करना चाहता हूँ. मैं अपने लेखक होने को लेकर तब खासा, लगभग क्लीनिकली, दुविधाग्रस्त रहता था. वह एक अलग किस्सा है कि मैंने कवितायें भेजने में महीनों लगा दिए और चार लोगों ने मुझे इस बात के लिए समझाया, फटकारा और डाँटा कि मैं महात्मा पीयूष को कवितायें क्यों नहीं भेज रहा.

कवितायें, एक साथ नौ, बहुवचन के प्रवेशांक में प्रकाशित हुईं, उन्हीं में से पहली पर मुझे एक पुरस्कार मिला. अब सोचने पर लगता है उसमें पीयूष का भी कोई न कोई योगदान तो रहा ही होगा.  

पर पीयूष चौंकाते रहे. बहुवचन के प्रवेशांक का लोकार्पण लंदन में हिंदी सम्मलेन में हुआ, वे नहीं गए; छह अंकों के बाद वे उस पत्रिका से भी अलग हो गए. बीच में एक अरसे तक पता नहीं होता था वे कहाँ हैं क्या कर रहे हैं? पता चलता भोपाल में हैं किसी अखबार के साथ जब तक यह बात कन्फर्म होती, वे उस ठिकाने पर नहीं होते. 

फिर २००५ में सशरीर प्रकट हुए, तब हकु भाई के साथ एक किताब पर काम कर रहे थे. बीच-बीच में, बहुत कम ही, उनका बीहड़ लेखन भी कहीं कहीं दिखाई देता था. ऐसे नॉन-कन्फर्मिस्ट लेखक हमेशा बहुत कम होते हैं जो अपने साहित्यिक पर्यावरण की कोई प्रत्याशा पूरी नहीं करते, उसकी ज़रा-सी भी खुशामद नहीं करते. जब बहुत सारा (युवा) लेखन (शायद) चंद्रकांत देवताले के शब्दों में ‘एक चतुर किस्म की पोलेमिक्स’ हुआ जा रहा है, तब, उन्हीं दिनों में यह ऐसा लेखन लगता है जिसे कुछ भी दरकार नहीं: न प्रशंसा, न पुरस्कार; न ताली, न गाली. नहीं पता उनके इस तरह के लेखन से कुछ ‘बड़ा’ निकल कर आएगा या यह अपने बीहड़ में ही गुम हो जायेगा लेकिन एक युवा की यह हिमाकत , तिस पर उदयपुर जैसे शहर से आने वाले एक अत्यंत साधारण परिवार के युवा की यह हिमाकत; खुद उसके व्यक्तित्व की आवारगी, उसका ‘छोकरापन’, उसकी सेल्फलेसनेस कभी इग्जोटिक, कभी इरिटेटिंग और कभी बेतरह लवेबल लगते हैं.

मेरे सबसे प्यारे तीनों दोस्तों (थ्री इडियट्स?) – पीयूष, अनिरुद्ध उमट और शिवकुमार गांधी – ने एक मुकाम पर औपचारिक पढ़ाई-लिखाई बीच में अधूरी छोड़ दी. तीनों की कला में जो बीहड़ता, जो जिद और जो नॉन-कन्फर्मिज्म है क्या उसकी एक मुख्य वजह यही नहीं कि तीनों  पूरे ढांचे से ही बाहर चले गए? इन तीनों ने ऐसे नज़ारों को सहने की शक्ति दी कि कैसे दोपहर में क्रांतिकारी कविता पढ़ी जाये और रात में आई.ए.एस. की तैयारी की जाये. जब मैंने आखिरेकार, ‘बुढ़ापे’ में, डॉक्टोरल रजिस्ट्रेशन कराया था तो सच मानिये इन्हें हाज़िर-नाहाज़िर जान कर, इनसे माफ़ी मांग कर ही रसीद कटवाई थी.  

 पर मैं यह सब आज क्यूं लिख रहा हूँ? 

क्योंकि आज मैं बेहद खुश हूँ. श्री पीयूष दईया को कृष्ण बलदेव वैद फेलोशिप दिए जाने का ऐलान हुआ है.

 

आज का दिन दादा के नाम.  

  

 

8 विचार “आज का दिन दादा के नामः पीयूष दईया को कृष्ण बलदेव वैद फेलोशिप&rdquo पर;

  1. मुझे भी बहुत खुशी है और मुझे याद पड़ता है कि भोपाल में मेरी पेंटिंग्स की पहली एकल नुमाइश में वे आए थे और एक एक पेंटिंग्स को बहुत ध्यान से देखा था। मुझे खुशी है कि उन्हें यह फेलोशिप मिली। उन्हें बधाई।

  2. पीयूष बधाई
    सतोहल बहुत प्यारी जगह है, सीमा जी को मेरा अभिवादन कहिएगा. वहाँ एक कुत्ता होता था, बूढा और बीमार पोलू जीवित हो तो सहलाना कहना मनीषा के उपन्यास शिगाफ में वो जीवंत है.

    आप जाएँ तो मिलकर जाएँ गंगा को मैंने राजस्थान की बँधेज साडी भेजने का वादा किया था. मेरा फोन न, अनुराग वत्स या अखिलेश जी ( चित्रकार) से ले लें. मनीषा

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s