एक अधूरा सीक्वल: दस जनपथ जैसी ब्लॉकबस्टर, करन गोपाल चोपड़ा और काफ़िर अदीब सोलोमन रश-डाई

(साहित्य में मेरे सबसे बड़े दुश्मन की किताब का सीक्वल लिखने की कुछ शुरुआतें हुई थीं. एक बार लिखने का सिलसिला टूटा तो वह किस्सा वहीं रुका है. ये बिखरे हुए पांच स्ट्रोक्स कल दिखे तो लगा फिर शुरुआत होगी. फोटो: नीटू दास)

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मेरी दूसरी मुहब्बत, बाद में पहली शरीक-ए-हयात, मारिया को ढूँढता हुआ मैं मैक्लिओडगंज के रास्ते पर था। मुझे कुछ इल्हाम-सा था कि अगर दुनिया में कहीं वो मुझे फिर से मिलेगी तो वहीं। पठानकोट में  खुशकिस्मती से लिफ्ट मिल गई। लिफ्ट देने वाले का नाम संजीव शर्मा था जिसकी शानदार कैब में मुझसे पहले बैठने वालो में मशहूर फिल्म डायरेक्टर करन गोपाल चोपड़ा (वही 10 जनपथ जैसी आलटाईम ब्लॉकबस्टर बनाने वाले), गुज़रे ज़माने की बॉम्बशैल स्मारिका और क़ाफ़िर अदीब सोलोमन रश-डाई जैसी शख़्सियतें शुमार थीं। ऐसे लोगों को अपनी गाड़ी में घुमा चुकने का ही खुमार था कि संजीव हमेशा फलसफाना गियर में रहता था।

जब उसने मुझे देखा पठानकोट रेल्वे स्टेशन के बाहर, गुमख़याल,  तो गाड़ी पास ला के बेहद संजीदा आवाज़ में बोला, ‘किसे ढूँढ रहे हैं? – अपने आप को?’

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जैसा पहले अर्ज़ कर चुका हूँ, अपने तई तो मैक्लिओड़गंज आने का मेरा मकसद अपनी रशियन मुहब्बत मारिया को ढूँढना था लेकिन जैसे ही बाज़ार में मुझे एक पुलिसवाला दिखा मुझे समझ आ गया मैं खुद को धोखा दे रहा था।वो पुलिसवाला जाने कौन था लेकिन मुझे ख़ामख़ाह लगने लगा,  इसी ने तो एमबी के केस की तहकीकात नहीं की थी?

सफ़र में दोस्त बन चुके संजीव ने मुझे मेरी हैसियत से ऊँचे होटेल में रियायत पे ठहरा दिया था लेकिन चेक-इन करने से पहले ही मैक्लिओड़गंज की फिज़ा मुझे पुकारने लगी – बाहर निकलो, एमबी की उदास कहानी का कर्ज़ तुम पर बकाया है।  उस्ताद सुरेन्द्र प्रकाश शर्मा पर गुस्सा आया कि बैठे-ठाले मुझे एक आदतन जासूस बना दिया है – एक पैसे की कमाई नहीं पर हर चीज़ को देखने लगा हूँ हज़रत शर्लक होम्स की मानिंद। ऐसा गुस्सा पर दिन में पचास बार आता है उन पर। मैं सीधा मौका-ए-वारदात की ओर चल पड़ा।

चलते चलते उनको फोन घुमाया, “मैं साबित करके रहूंगा पाठक हमेशा लेखकों से ज़्यादा समझदार होते हैं।“ उनका रवायती जवाब ‘उस्तादों से उलझोगे तो दोज़ख में सड़ोगे’ सुनाई पड़ने से पहले ही मैंने काट दिया।

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उन दिनों एसपीएस केकेके का सीक्वल लिखने में बिजी थे।और ना मालूम क्यों मुझे नाविल का टाईटिल बता नहीं रहे थे। मुझे इतना अंदाज तो था कि डॉ. संजय दत्त के क्लिनिक और फतेहपुर लाईब्रेरी वो इसी नाविल के सिलसिले में आये थे . मेरा कयास ये भी था कि वहाँ आने का कुछ ताल्लुक अपने चचा की मौत की जो तहकीकात अपने लेविल पे कर रहे थे उससे भी था। उनकी थियरी भी मुझे पता  थी – एमबी को किसी ने नहीं मारा, खुदकुशी की पर ये भी पता था इस रियलिटी को वो नाविल लिखते हुए बदल देंगे। उनकी उस बहुत फेमस हो चुकी बात का कुछ तो मतलब था कि तहकीकात तब नहीं शुरू होती जब आप मौका-ए-वारदात पहुँचते है बल्कि तब जब आप नाविल का पहला लफ़्ज लिखते हैं।

दलाई लामा की मिनिस्ट्री की ओर भागते हुए ये बात कई मर्तबा मेरे अंदर गूँजी, मानो मेरा मज़ाक उड़ाती हुई।

उस चलते फिरते खुदा दलाई लामा का सादगी भरा इबादतखाना मेरे सामने था – मैंने एसएमएस लिखा – “आप लिखिये फिक्शन, सच  यहाँ है।”

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एड्डा ने आपनी आँखें फिर से मूंद लेने से पहले जो मुझसे कहा मैं उसका तर्ज़ुमा नहीं करूंगा। मैंने ये मान लिया है कि तर्ज़ुमें में हर बात नहीं कही जा सकती।

Everybody thinks MB was murdered! I have explained it to far too many people that he wasn’t and I had nothing to do with his death except feeling awfully sad. I loved him, married him and with him lost the capacity to love other men. Now I am trying to love myself. Would you please let me do that?

मेरे हाथ में कागज़ का टुकड़ा था लेकिन उस पर जो कुछ भी लिखा था मैं वहाँ पढ़ नहीं सकता था।

5

एड्डा की अधूरी कविता  

When hills turn blue

When smoke escapes your eyes

When death speaks to you at breakfast

When you no longer need a home

I write these lines, and erase them. When I try to remember him, I see nothing but his small, sad, Indian dick – and there is a flood of divine compassion all over me. I hate that.

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