सशर्त बयानः तहलका साहित्य अंक

तहलका के साहित्य विशेषांक (30 जून 2010/यूपी संस्करण जिसे मैंने उनकी साईट से डाउनलोड़ किया है) में श्री दिनेश कुमार के लेख में मुझे एक जगह उद्धृत किया गया है। यद्यपि मुझे यह साफ़ नहीं था कि मेरे बयान को एक लेख में शामिल कर लिया जायेगा। प्रकाशित उद्धरण में कोई फेरबदल नहीं है लेकिन जो “सशर्त” बयान मैंने उनको दिया था उसे संपादित किया गया है। मैं यहां पूरा बयान लगा रहा हूं। उम्मीद है तहलका के इस अंक के संपादन से जुड़े दोस्त बुरा नहीं मानेंगे क्योंकि  ई-मेल से बयान भेजते हुए मैंने यह स्पष्ट कर दिया था कि CONDITIONAL SUBMISSION: SHOULD BE PUBLSIHED AS IT IS / OTHERWISE I WILL DISOWN IT तो मित्रो  मूल बयान इस प्रकार हैः

पिछ्ले बीस-तीस बरस में कहानी की मुख्यधारा में एक समयांतर उदय प्रकाश ने घटित किया और उनके समान्तर अखिलेश, अलका सरावगी, गीतांजलि श्री और प्रियंवद ने. अगर मुख्यधारा से बाहर देखें तो उदयन वाजपेयी ने भी. विनोद कुमार शुक्ल, मनोहर श्याम जोशी और काशीनाथ सिंह के उपन्यासों  ने भी यह किया, शायद ज्यादा बड़े ढंग से. उदयप्रकाश ने अकेले नहीं. नए कहानीकारों में चन्दन पाण्डेय और कुणाल सिंह की कुछ कहानियां बिलकुल नए का प्रस्ताव हैं. इधर गौरव सोलंकी की कहानी सुधा कहाँ है भी. प्रभात रंजन का सतह पर दीखता पुरानापन भी बहुत अंतर-पाठीय और धोखादेह है.  दरअसल दृश्य  में नकली परदुखकातर और यांत्रिक लेखन की भरमार है करीब से पढने पर जिसकी क्रूरता और हिंसा भी साफ़ झाँकने लगती है. वैसा रिव्यू-भीरु, बॉस-भीरु  लिखने वाले  बहुत  सारे लोगों को झल्लाहट है कि जिन फार्मूलों  को साहित्य में स्थापित होने के लिए अचूक नुस्खा माना जाता था वो सब बिना किये ये नए लोग कैसे स्थापित हो गए.  

4 विचार “सशर्त बयानः तहलका साहित्य अंक&rdquo पर;

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