स्त्री-बिजूका

14.Acrylic on Canvas,3 ft x 3 ft

एक

सबसे पहले मैं कृष्ण कुमार की किताब विचार का डर का यह अंश उद्धृत करता हूँ:

स्वीकृत भूमिका से अलग किसी स्थिति में स्त्री का दिखना एक घटना मानी जाती है. इस बात की सच्चाई का अहसास प्रेमचंद की मनोवृति शीर्षक कहानी अब तक करा रही है। इस कहानी के केन्द्र में एक युवती है जो पार्क की बेंच पर सारी रात लेटी रहती है. …….हम जान लेते हैं बेंच पुरुषों के लिए ही सार्वजनिक है.

मैं कृष्ण कुमार के इस पठन को इस तरह देखने का प्रस्ताव करता हूँ: यह पार्क हिन्दी साहित्य (का परिदृश्य) है और यह युवती एक स्त्री लेखक।

दो

तब कई महीनों से मैं एक ऐसे घर में अकेला रह रहा था जिसमे मुझसे पूर्व एक दम्पति रहते थे। घर के हरेक हिस्से में निरंतर ऐसे निशान मिलते थे कि वहां कोई गृहस्थी थी. कमरे, बरामदे, छत, स्नानघर, हर जगह उपस्थिति के कई निशान मिलते थे. लेकिन यह रसोई थी जिसमे प्रवेश करते ही इसका अहसास सबसे सघन होता था. रसोई में जीवन के सर्वाधिक चिन्ह बचे हुए थे. अपना खाना स्वयं पकाने के तब नए नए किए गए निश्चय के कारण भी हो सकता है मुझे ऐसा लगता हो. अक्सर खाना पकाते या बर्तन निपटाते हुए लगता किसी स्त्री-भूमिका में हूँ,कि मैं कोई स्त्री-जैसा हूँ. मैंने पाया रसोई में प्रवेश करते ही मैं जैसे अकेला नहीं रहता था और घर में अन्यत्र जैसे अकेला नहीं होता था उसमे कोई अन्तर था . अन्यत्र मैं उपस्थिति के चिन्हों को पढने की कोशिश करता था . उन्हें पढ़कर बिक्लुल पास ही मंडरा रहे एक अतीत के इन बाशिंदों से बतियाने लगता था . कभी कभी मेरे कई परिचित इस कदर उनकी गृहस्थी में विघ्न डालने लगते थे कि वे झुंझला ही जाते होंगे.

रसोई में मुझे उन चिन्हों को सायास नहीं पढ़ना पड़ता थावे स्वयं कुछ कहने लगते.

तीन

मनोवृति के अपने पठन में कृष्ण कुमार कुछ चीज़ें प्रदत्त मानते हैं: जैसे यह प्रदत्त है कि सार्वजनिक स्पेस पर कब्जा आधुनिकता का एक प्रमुख अभिलक्षण है। (और अतिक्रमण हटाओ अभियान ‘उत्तर-आधुनिकता का?) . साहित्य जैसे स्वभावतः एकांतिक अनुशासन की सार्वजनिकता रचना-पाठ, प्रकाशन, संगोष्ठी, पुरस्कार जैसे प्रदर्शंपरक आयोजनों में और अधिक महत्वपूर्ण तरीके से ख़ुद उसमे विन्यस्त सार्वजनिकता के रूप में चरितार्थ होने के साथ साथ उस सरंचना में भी अभिव्यक्त होती है जिसे उस भाषा-विशेष के साहित्य में उपस्थित आलोचना-संजाल या मान्यता (recognition/canonization) के चैनल भी कह सकते हैं. (हिन्दी जैसे साहित्य पर्यावरण में यह अधिक स्पष्ट है. इसके बरक्स भारतीय अंग्रेज़ी लेखन में मान्यता चैनल प्रकाशन गृह, बल्कि उससे भी पहले एजेंट हैं). हिन्दी आलोचना मानो अपनी अपरिहार्य प्रदर्शनपरकता में, मान्यता-चैनल अपनी जेनेटिक उदघोषणा-प्रियता में साहित्य की शो-विंडो हो जाते हैं. लगभग एक विज्ञापन-प्रबंधन एजेंसी. (और इसके दूसरी तरफ़ हिन्दी-आलोचना के सन्दर्भ में एक पाठ की स्थिति किसी ‘विवादित भूमि’ (अयोध्या/कश्मीर) जैसी है. उस पर कब्ज़ा करने की उसकी आधुनिक करवाई या तो जिहाद हो जाती है या सीमा पर का आतंकवाद. ऐसे सार्वजनिक में एक स्त्री-लेखक और उसका लेखन एक दूसरी तरह का अभयारण्य बनने का यत्न करता है: विवादित भूमि पर एक प्रतीकात्मक, उपयोगी सेकुलर निर्माण (–‘कोई छोटा सा अस्पताल/ नर्सिंग होम?). पर अपने इस अभयारण्य की सुरक्षा में भी, अपनी अद्वितीयता और अपने अलगाव में भी, अपने प्रति-निर्माण की पनाह में भी वह इन मान्यता चैनलों की एक सैरगाह या (और कभी कभी एक शिकारगाह भी) बना रहता है . स्वयं इन चैनलों में एक प्रतिकार के तकाजे से वह एक प्रदर्शनपरक वस्तु है. (कोई मुझसे पूछ रहा है: क्या हिन्दी में किसी स्त्री द्वारा किए पठन का किसी पुरूष लेखक की मान्यता पर, मूल्यांकन पर कोई फर्क पड़ता है?)

उसके इस अभयारण्य, इस नर्सिंग होम का संचालन भी अक्सर इन्ही चैनलों के पास है जहाँ कभी-कभी पूछा जाता है, ‘कह रही हैं रघुवीर सहाय पोलिटिकली इनकरेक्ट है?!’

जवाब मे रघुवीर सहाय गुनगुनाने लगते हैं।’ और एक वो जो तेरे कंधे का नीला होता है’

चार

कुछ बरस पहले मैं यह देखकर स्तब्ध रह गया कि मेड़ता के जिस मन्दिर को मैं बचपन से मीरां का मन्दिर सुनता-समझता आया हूँ उसे मेड़ता में कोई इस नाम से स्वीकार नहीं कर रहा था। वे उसे कृष्ण मन्दिर कह कर मुझे रास्ता बता रहे थे.

माँ जो कभी मेडते नहीं गयी उन्हें जब बताया तो उनके चेहरे पर दुख था.
(सीख: आक्रोश दुख के सामने ठहर नहीं पाता)

अपने संस्कृतज्ञ पिता से सीखी रास आदि की किन्ही दूसरी ही व्याख्याओं के संसार में रहने वाली माँ ने एक झटके में पहचाना कि कृष्ण प्रभु नहीं पुरूष हैं।

पाँच

आधुनिक हिन्दी का पर्यावरण ‘सार्वजनिक पार्क’ के रूपक के लिए बिल्कुल उपयुक्त है। यह मूल-भाषाओं, ‘बोलियों’, निवासों से विस्थापितों, अनिकेतों के लिए एक शरण(गाह) है, एक शरणार्थी कैम्प ? सामंती निजी उद्यानों की जगह एक प्रजातांत्रिक, सार्व-जनीन पार्क. मानो रियासतों के विसर्जन और गणराज्य के अभ्युदय के सादृश्य की तरह ख़ुद को प्रस्तुत करता हुआ.

हिन्दी का अभी का पर्यावरण आधी रात की भी संतान है. इस एम.सी.सी (Midnight Children’s Club/ श्लेष -Merylbone Cricket Club) में भी स्त्रियों का स्वागत अरसे तक नहीं ही होना था.

छह

कुछ बरस पहले (जब मैं २५-२६ वाला युवा लेखक था, जब ऐसे वक्तव्य वाकई बुरे लगते थे) एक वरिष्ठ कवि (वे तब भी उतने ही वरिष्ठ थे), संभवतः चंद्रकांत देवताले, ने अधिकांश युवा कविता को एक चतुर किस्म की पोलेमिक्स कहा था।

सीरीयस्ली लेने पर (इसके पर्याप्त प्रमाण है कि ज्यादातर युवा लेखकों ने ऐसा नहीं किया), इस वक्तव्य का एक अर्थ था: युवा लेखक की मृत्यु

क्यूंकि ऐसा मान लेने पर, एक ‘चतुर’ स्तर पर, यह लेखन अपनी अथॉरिटी मान्यता चैनलों को – अपने एकल सम्बोधी को- हस्तांतरित करता है। अथॉरिटी का यह अदृश्य हस्तांतरण तब मैंने एक ‘मार्मिक और करुण’ दुर्घटना की तरह, युवा लेखक की दर्दनाक मौत की तरह पढ़ा था.

एक (युवा) स्त्री लेखक के साथ यह दो स्तरों पर घटित होता है: न सिर्फ़ इस अदृश्य हस्तांतरण की शक्ल में बल्कि इससे पहले उस अपेक्षा के सन्दर्भ में जिसे उसकी ‘आधुनिकता’ की अनिवार्य अर्हता की तरह रखा जाता है और जिसे कृष्ण कुमार मनोवृति के अपने पठन में प्रदत्त मानते हैं: : सार्वजनिक स्पेस पर कब्ज़ा, अपने प्रायवेट की सार्वजनिक अभिव्यक्ति, बोल्डनेस स्त्री की आधुनिकता का एक प्रमुख अभिलक्षण है. इस अपेक्षा- बोल्डनेस में यह अन्तर्निहित है कि स्त्री लेखन लेखन नहीं, अभिलेखन है, कि वह इतिहास, यथार्थ, अनुभव आदि की सूचना है , ‘आत्मकथा’ है जैसा कभी एच.डी. (हिल्डा डूलिटिल) की बेटी पेरेडिटा ने कभी अपनी माँ के आत्मकथात्मक उपन्यास बिड मी टू लिव के बारे में कहा था।

कि इस तरह वह अपने लेखन का सम्बोधी पुरूष को बनाती है. (पुरूष से) ‘मुक्ति’ जैसे एक उद्योग के लिए. कि यह जब निर्विवादित, सेकुलर भूमि- छोटा सा अस्पताल, नर्सिंग होम?- इन मान्यता चैनलों के प्रभावक्षेत्र में आता है वे बाहर की दीवारों पे प्रतिरोध, मुक्ति आदि के पोस्टर लगा देते हैं।

पर कभी कभी किस्सा यहीं ख़त्म नहीं होता।

अथॉरिटी के अदृश्य हस्तांतरण के बाद यह ‘तथ्य’ एक ‘सनसनीखेज़’ ख़बर की शक्ल में सार्वजनिक रोशनी आता है कि यह रचनाएं किसी पुरूष की लिखी हुई है. (यहाँ ए.एस. ब्यात्त (A.S.Byatt) के बुकर जीतने वाले उपन्यास पज़ेसन याद की है जिसमें दो काल्पनिक रिसर्चर – एक स्त्री, एक पुरुष दो काल्पनिक विक्टोरियन कवियों – एक स्त्री, एक पुरुष के जीवन पर शोध करते हैं और उपन्यास में उद्धृत दोनों की कवितायें उपन्यासकार-एक स्त्री ने लिखी है या अनिता देसाई का इन कस्टडी जिसमें वे अपने उपन्यास के नायक के रूप में एक उर्दू शायर और उसकी शायरी का आविष्कार करती हैं )

सात

मेड़ता की उसी यात्रा में बस में आगे जाते हुए रास्ते में मैंने किसी खेत में खड़ा एक बिजूका देखा. बस के थोड़ा आगे बढ़ते ही एक विचित्र और परेशान करने वाला वहम हुआ कि मैंने कोई स्त्री-बिजूका देखा/खी है! क्या बिजूका स्त्री होता/ती है? बिजूका एक सामान्य- विशेषज्ञ अर्थों में गैर-कलाकार- मनुष्य की अनुकारमूलक निर्मिति है, ऐसी अनुकारमूलक निर्मिति जो सर्वथा उपयोगपरक मंतव्य से तैनात हो कर भी उस सामान्य मनुष्य के गल्पात्मक में विश्वास को व्यक्त करती है.

यथार्थ (भूमि) का एक अ-यथार्थ रखवारा!

तभी ठीक उसी खेत से चला ये तीर:क्या एक अ-यथार्थ रखवारे की भूमिका में भी कोई स्त्री हो सकती है? मुझे यह कल्पना करने में शर्मनाक संकोच हुआ कि स्त्री लेखन का मेरा कल्पित अभयारण्य यह खेत है और स्त्री लेखक एक बिजूका।

एक अयथार्थ रखवारा.
एक अनमना मेहमाननवाज़।

आठ

प्रेमचंद की ही एक और कहानी रसिक संपादक का मुख्य चरित्र, एक अधेढ़ हिन्दी पत्रिका संपादक एक ‘बोल्ड’ कविता छपने के बाद उसकी लेखक – एक बोल्ड, परकीया, सुंदर, आधुनिका- की कल्पना और उसके संभावित आगमन की सूचना से रोमांचित है। वह उसकी नयी, प्रकाशनार्थ आयी रचना को क्रांतिकारी क्लैसिक की तरह पढ़ रहा है.

लेकिन यह स्नेहमयी आगुन्तक एक ‘कुरूपा’ निकलती है जिसे कई पुरुषोचित विशेषणों से कोसते हुए, किसी तरह छुटकारा पाकर संपादक क्लैसिक को न छापने का उचित, सैद्धान्तिक फैसला करता है।

नौ

इस कहानी में उस ‘लेखिका’, ‘कवयित्री’ की वह कविता पूरी प्रकाशित है जिसे पढ़कर रसिक संपादक रस-विचलित हो जाते है। एक भिन्न तरह का अथारिटी हस्तांतरण यहाँ भी है. प्रेमचंद- एक पुरूष लेखक- वह कविता लिखते हैं जो इन मान्यता चैनलों की अपेक्षानुसार इस लेखिका को आधुनिकता में दीक्षित होने के लिए लिखनी होती है.

किंतु वह कविता मैं यहाँ उद्धृत नहीं करूंगा . इसके लिए आपको प्रेमचंद के अनगिनत मानसरोवरों में से किसी एक में गोता लगाना होगा .

3 विचार “स्त्री-बिजूका&rdquo पर;

  1. आपने स्त्री के प्रति काफी संतुलित और सटीक मंतव्य प्रस्तुत किया है. साहित्य के क्षेत्र में व्याप्त संकुचित मानसिकता को उघाडा है.इतना ही ईमानदार हो कर बात करना अब जरूरी है. इसके लिए बधाई.

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