एक दिन मैं मारा जाऊंगाः शिरीष कुमार मौर्य

शिरीष की यह कविता कभी अनुनाद पर पढ़ी थी और तब यह टिप्पणी की थीः

यह कविता सीधे कनपटी से गुजरती है – पहले पाठ में पुरानी फिल्मों की तरह कुछ ऐसी छिप्रता से कि सिर्फ़ धाँय की आवाज़ आती है और सामने कोई ढेर हो जाता है – लेकिन दूसरे तीसरे पाठ में मैट्रिक्स जैसे स्लोमोशन में, वहम होता है हमारे पास भी वर्चुअल में हाइपर-चपल पराक्रमी हो गए उन पात्रों की तरह शायद बच सकने का कोई मौका है. पर कनपटी इस बुलेट से वैसे जुडी है जैसे अर्थ शब्द से. यह बुलेट कहीं और से नहीं कनपटी से ही गुजरेगी. शामिल रहने की वज़ह से या बम धमाकों में बिना किसी वज़ह से पर अब कोई गोली कोई बुलेट हरवक्त हवा में है. क्या ऐसा हो सकता था कि बहुत ‘सुन्दर’ (वो यहाँ भी संभव है) आखिरी पंक्तियों को तुम कहीं और के लिए बचा लेते और यह कविता कनपटी से गुजरने की बजाय उससे टकराकर फ्रीज़ हो जाती –

मुझे सुनाई देगी एक आवाज़ ढाढ़स बंधाती हुई

जीवन और ढाढ़स के बीच ही कहीं मारा जाऊंगा मैं

शिरीष की कविता पर कभी बहुत लिखना है लेकिन एक चीज़ जो उससे सीखी जा सकती है वो यह है कि उसके यहाँ राजनीति कविता नहीं करती, कविता राजनीति करती है। कविता को, मेरी समझ से, ऐसा होने/करने की कोशिश लगातार करनी चाहिये। जब राजनीति कविता करती है तब उस ऊष्मा की क्षति होती है जो हर अच्छी कविता की तरह शिरीष के यहाँ एक मूल्य है।

इधर सुना है उसका दिल डेढ़ गुना हो गया है और वजन बारह किलो कम। अब उससे और बड़े दिल वाली, और सक्रिय कविता की उम्मीद करना क्या बेज़ा होगा?

एक दिन मैं मारा जाऊंगा

मरना नहीं चाहूंगा पर कोई चाकू घुस जाएगा
चुपचाप
मेरी टूटी और कमज़ोर बांयीं पसली के भीतर उसी प्यारभरे दिल को खोजता
जो हज़ार जुल्मों के बाद भी धड़कता है

कोई गोली तलाश लेगी मेरी कनपटी का रास्ता
मेरे दिमाग़ में
अचानक रुक जाएगा विचारों का आना
कल्पना का गढ़ना
स्मृतियों का रोना और सपनों का होना
सबकुछ अचानक रुक जाएगा
एक धमाके की आवाज़ के साथ

शायद कोई दोस्त ही मार देगा मुझे जैसे ही बात करके पीठ मोड़ूंगा मैं उससे

शायद प्रेम मार देगा मुझे
शायद मेरा अटूट विश्वास मार देगा मुझे

मुझे मार देगा शायद मेरा शामिल रहना

शायद कविता लिखना मार देगा मुझे एक दिन
लेकिन सिर्फ़ कविता लिखना नहीं,
बल्कि शामिल रह कर कविता लिखना मारेगा मुझे

एक दिन मैं मारा जाऊंगा
ऐसी ही
कुछ अनर्गल बातें सोचता हुआ

क्योंकि
आज के समय में सोचना भर काफी है
किसी को भी मार देने के लिए !

पर इतना याद रखा जाए ज़रूर
कि मरूंगा नहीं मैं
मुझे कोई मार देगा

मुझे
मृत्यु दिखाई नहीं देगी
सुनाई भी नहीं देगी
मुझे तो दिखाई देगा जीवन लहलहाता हुआ
मुझे सुनाई देगी एक आवाज़ ढाढ़स बंधाती हुई

जीवन और ढाढ़स के बीच ही कहीं
मारा जाऊंगा मैं

किसी अलग जगह पर नहीं
जहां मारे जाते हैं मनुष्य सभी एक-एक कर
मैं भी मारा जाऊंगा वहीं !

तुम बस याद करना मुझे कभी पर याद करने से पहले अभी रुकना
पहले रुक जाएं मेरी सांसे
थम जाए खून
मर जाऊं ठीक तरह से तब याद करना तुम मुझे

स्मृतियां ही व्यक्ति का व्यक्तित्व बनाती हैं
इसलिए
स्मृतियों के किसी द्वीप पर तुम याद करना मुझे

7 विचार “एक दिन मैं मारा जाऊंगाः शिरीष कुमार मौर्य&rdquo पर;

  1. विचारौं को खौला देने वाली रचनाएँ कम मिलती हैं. यह कविता उनमें से एक है. शिरीष जी आज के कवियों में सबसे अलग हैं. प्रस्तुत करने के लिए धन्यवाद.

  2. जीवन और ढाढ़स के बीच ही कहीं
    मारा जाऊंगा मैं

    आमीन
    मारे जाने की इतनी सुन्दर जगह चुनी है आपने शिरीष जी कि रश्क होगा अगर वाकई कहीं मारे गए उस जगह पर .

  3. शायद कोई दोस्त ही मार देगा मुझे जैसे ही बात करके पीठ मोड़ूंगा मैं उससे

    शायद प्रेम मार देगा मुझे
    शायद मेरा अटूट विश्वास मार देगा मुझे

    मुझे मार देगा शायद मेरा शामिल रहना

    शायद कविता लिखना मार देगा मुझे एक दिन

    बहुत ही गहन अनुभूति

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