सल्वाडोर डाली इस पूरे दृश्य विधान में इन सीढीयों को पिघला दो

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इतनी आदत थी कि बार बार देखने पर भी वे एक जैसे लगते थे सारे दृश्य स्लो मोशन में भी कई बार देख चुका था अब सारा जीवन तो इनका बोझ ढोने की नियति में कितनी बार और मरता मैं 

अपने मरे होने का दृश्य भी कितना स्थिर हो चुका था यह वे भी जानते हैं जिनके दृश्यों की इतनी ही स्मृतियाँ मेरे मन में थी जिसमें कि वे सारे दृश्यों को मजबूती से स्थिर करने में अपने आप को झोंके हुए थे 

फिर तो देखो ये खेल जैसा हो गया किसी स्थिर  मृत दृश्य में अगर तुम मुझे मुस्कराती हुई दिखी भी जब तुम जूतों की दुकान की सीढीयाँ उतर रही थी लेकिन तुम सच में मुस्कुरा नहीं रही थी तुमने देखा कि मैं तुम्हें देख रहा हूँ तुम तुम्हारे देखे मेरे दृश्यों में रो पड़ी और ये हंसने व रोने का हिसाब किताब हमने इतना बडा कर लिया कि अब ये हंसना और रोना दो ऐसे टेक लगते जैसे किसी फिल्म के कि दोनो को मिला दो तो लगता कि हंसने से होठों के आस पास की मांसपेशियाँ फैलती है ठीक उसी समय उनके उपर रोने से सिकुडती आँखे जगह बनाने लगती है और वहाँ ठीक जूतों की दुकान की सीढीयों का दृश्य बनाती हैं जिनसे कि तुम उतर रही थी और मैं सामने खडा देख रहा था और जानता था कि इस सबका बाद में मैं क्या करने वाला हूँ 

अब छोडो भी यह सब झील किनारे बैठ रोती क्यों हो जिस ट्रक के पीछे ये तस्वीर बनी है उसे ढोता तो मैं हूँ और मेरे इसे ढोने की तस्वीर मेरे किसी एलबम में है जो कि अनेक ब्लैक एंड व्हाइट फोटो के साथ पड़ी है। जिसे कि बच्चे देखते हैं और अपने अपने तरह से कहानियाँ बनाते हैं कुछ हंसते हैं कुछ उस साइकिल पर लगी घंटी को देख ख़यालों में उसे बजाते ही रहते हैं स्लो मोशन में यह घंटी की आवाज मुझे भेदती है दिमाग की नसों को सीढीयों की तरह बनाती हुई बस इन सीढीयों से यह पता नहीं चलता कि इनसे अभी कोई उपर की ओर गया है या कोई नीचे उतरा है 

सल्वाडोर डाली इस पूरे दृश्य विधान में इन सीढीयों को पिघला दो

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सुन्दर आँखें पत्थर से भी कुछ ज्यादा चेहरे पर जिस अनुपात में थी उसी अनुपात में टंगी थी एक नामालूम से पौधे में पौधा था कि मर रहा था लू में आँखों पर अब मौसम का असर नहीं था 

एक अदृश्य तरीके से ही वे जोड़ती हुई अपने दिल को जो जाने किस अवस्था में किन मौसमों में किस ख़ाक में किस ताज पर था

 यह एक सरल दृश्य था 

हम जूते चटखाते अक्सर गुजरते थे पास से उन आँखो के हमारी हिंसा इतनी महीन थी कि उन आँखो के इशारों से पत्ते हमारी ओर देखते थे जूते चटखाने की आवाज से झर जाते थे वे  आक्रान्त 

अब इस कदर आदतन लगातार देखने को सज़ायाफ्ता थीं वे निरपराध 

जाने कब कौन कहेगा कितनी खूबसूरत थीं वे और देखतीं इस कदर खूबसूरती से जाने कितनी ही चीजों को महीन से महीन जहीन से जहीन इस धरती की वनस्पतियाँ पानी पीती थीं जीने के लिए उसकी एक नज़र उन पर पड़ जाने से 

कितनी दुखती हैं मेरी खुद की आँखे ये सब लिखते हुए 

इतना भारी जूता है मेरे पाँव में मेरी देह से भारी 

मेरा हृदय चलाता है उनको मेरी आँखो से बचता बचाता ऐसे कि जैसे वही असल आँख है 

बाकी सब मन की माया 

उसने कहा मुझसे ले चलो अपने शहर

जो कहोगे वही करुंगा

फिर पकडाई चाय जो गैस के

चूल्हे पर बनी थी

मैंने कहा मजाक में

जगह बदल लेते हैं हम

और फिर वैसे भी शहर खुद ही तो आ रहा है

तुम तक

 

उसने कहा वहाँ छत पर बैठना शाम में

अच्छा लगता है रोशनियों बीच और फिर हवा तो आती ही है

एक कारखानें में काम करता था उसका भतीजा

जिसके साथ किसी छत पर बैठा था वह एक दिन

इस शहर में रोशनियों बीच

और उस दिन भी हवा तो आयी ही थी

 

तालाब किनारे चाँद को देखता लेटा हुआ

शाम में मैं खुद कितने दिन काट लूंगा यहाँ

तालाब अभी भरा है फिर खाली होगा

और फिर भरेगा व खाली होगा

अगली बार

पता नहीं भरे कि नहीं

और मैं कहुँगा किसी से ले चलो अब तो मुझे

अपने साथ

जो कहोगे वह कर ही लूंगा

 

 

 

 

 

 

 

 

 

कल – 24 सितंबर – को लेकर तमाम आशंकाओं के बीच रात को अचानक शिव की कविताएँ पढ़ने लगा। वजह अजीब थी- यह तथ्य याद आना कि वह अभी गुजरात में है।  शिव से मिलने से पहले जो उसके बारे में सुना था उससे वह मेरी कल्पना में एक उग्र, उपद्रवी वामपंथी था। मैं भी उसकी कल्पना में कुछ रहा होऊंगा। लेकिन इन पाँच छह सालों में यह पाया है कि जो मेरी कल्पना में था मैं उस आदमी से कभी नहीं मिला। सब कुछ के लिये  खुले आवारापन ने, ‘परिवर्तन’ को सबसे पहले अपने जीवन और घर में लाने के उसके ‘अन-प्रिटेंशस’ अंदाज़ ने (दुर्भाग्य से हमारे अधिकांश परिवर्तनकामियों का – सब का नहीं –  ‘पर्सनल’ बहुत हद तक यथास्थितिवादी, कन्फर्मिस्ट है ) और रूपये-पैसे को उसकी सही औकात पर रखने की रिस्की संतई  ने धीरे धीरे मेरे  देखने-सोचने-जीने पर गहरा असर डाला है।

यह तय कर पाना वैसा मुश्किल नहीं है (जैसा कि Rhetorically कह सकता था) कि वह कवि है या चित्रकार। मेरे लिये वह एक चित्रकार है जिसकी कविता से मुझे बहुत कुछ सीखने को मिलता है। यह संयोग कि वह हिन्दी में लिखता है इन कविताओं को अधिक आत्मीय बना देता है। ये ऐसी कविताएँ हैं जो अन्यत्र नहीं हैं।

चित्र डाली का है – My Wife, Nude, Contemplating Her Own Flesh Becoming Stairs यहाँ से साभार। शिव की और कविताएँ यहाँ

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