इति का नकाब और समाप्ति की मालगाड़ीः पीयूष दईया

पिता के शोक में लिखी दादा  – पीयूष दईया – की ये कविताएँ ‘आसुँओं के बाहुल्य’ से घिरी हैं. वे हमारी पीढ़ी में  ‘अ-द्वितीय’ कहे जाने के सबसे करीब हैं. दूसरा ना कोई. कथादेश के नये विशेषांक में प्रकाशित 26 कविताओं को पिछले सात-आठ दिनों में दो बार पढ़ा है और कई बार अपने को पितृ-शोक की कल्पना में काँपता पाया है. यहाँ उनमें से कुछ का प्रकाशन मेरे पिता के लिये; अब तक की तमाम नाफ़रमानियों के लिये कदमों में गिर कर माफ़ी माँगते हुए

Chayakaar_Nirmal_Lakshkar

पीठ कोरे पिता

(डॉ. पूनम दईया के लिये)

1

मुझे थूक की तरह छोड़ कर चले गये

पिता, घर जाते हो?

गति होगी

जहाँ तक वहीं तक तो जा सकोगे

– ऐसा सुनता रहा हूँ

जलाया जाते हुए

अपने को

क्या सुन रहे थे?

आत्मा

शव को जला दो

वह लौट कर नहीं आयेगा

6

मंजर

शायद विस्मृति की त्रुटि है

जो मैं बाहर आ गया हूँ

अस्पताल में

अपनी साँस जैसा असली

पिता खो कर

अजब तरह के आश्चर्य में

वेश्या जानती है जिसे

इंसान जीवित के साथ सोता है

मुर्दे के साथ नहीं

7

वह क्या है जिसे छिपा नहीं सकते

अब प्रकट है जो

– एक लाश –

वियोग-उपहार

जिसे हिन्दू गलने से रोक लेते हैं

ले आते राख में

क्या इति का नकाब है?

अपनी ही पदचापों से बने

रास्ते पर

कौन-सा शब्द है जो जीने में आ सके

लाश –

12

मेरे पिता ने कभी एक शब्द भी नहीं कहा

अपने दुखों का

न माँ ने

भाईयों से कभी बात नहीं हुई

चलते चलते भी साथ

हम

अकेले रहे

जीवन में

निज एकांत

सादगी भर उदात्त

सजीव

खींच

लिया ना जाने किसने

पिता

बीते कल से सामने है

– लाश

हमें अकेला छोड़ देती

13

और आपने जाना सब

पीठ कर लेते हैं छूटते

ही साँस

लाश

जला देने के लिए

आप

20

ओखली में सर दे यूँ लौट

आया हूँ

जैसे चिता में पिता

वक़्त. रक्त की तरह बह रहा है

माँ.

आकाश में एक तारा तोड़कर

अपनी आँखों में चमका लो

या माथे पर पोंछ दो

सिंदूर

24

मैं कौन हूँ, पिता?

बचपन में जवाब दे देते

क्यों बड़ा होना पड़ता

उम्र में

वह कौन है जिसने हमें जन्म दिया, मेरे बेटे

लुभाते नामों के पहले

मानो मोम हो

– उन्हीं दिनों की गिनती हो सकती है

जिन्हें हम खो चुके हैं

पश्वाश्चर्य में लाते मुझे

जान लो

पिघलती जुदाई में

कभी होना नहीं

और सुन सकने में

छुला लो

ठहरो

जो मैंने कभी कहा नहीं

उसे सुनने

कल्पना हो सकता है जीवन

एक और में तुम्हारा पिता

कल्पना से बाहर रहा

26

पीठ कोरे पिता, देखो. मैं, अब मूकमूँछ हूँ.

छल-चिह्नों से छूटते हुए

इस जन्म में दीमक लग गयी है. अहेतुक में फफूँद. काठ के

सिफर ढोते मेरे सारे शब्द समाप्ति की मालगाड़ी जैसे हैं.

हृदय में फालिजग्रस्त, कलपते खोपड़ी में. अंधेरा जो जड़ों का

घर है. क्या उन्हें कभी अपनी केंचुल बदलते देखा जा सकता है?

कौन जाने.

मेरा कोई पूर्वज नहीं, निर्वंश हूँ. अकेला, एक लाश जैसा.

तीन में न तेरह में सुतली की गिरह में. आसमान का सफ़ेद

कोढ़ जो रात में हकलाता-सा चमकता है. टोक की तरह.

टिमदिप टिमदिप. अदेय दाने. आँसू का बाहुल्य.

चूते चूते छिटक गया हो जैसे.

अन्यत्र को आँख देते

अब चुग लिए दाने ऐबदार हों.

4 विचार “इति का नकाब और समाप्ति की मालगाड़ीः पीयूष दईया&rdquo पर;

  1. ओह……. बेचैन कर देने वाली कवितायेँ हैं | न जाने क्यों बहुत डर गया हूँ और असुरक्षित महसूस कर रहा हूँ | शायद मुझे नहीं पढ़ना चाहिए था इन्हें |

  2. pita ke liye rudaali banti ye kuchh kavitaayein , uske viraat ke bar-aks ye tuchh kavitaayein bhigoti hain khoob ! aur wo swaal bhi kaisa hai naa “main kaun hoon Pita “…zraa der se poochha jaata hua swaal. swaal hai bhi ki nahi …ya koi budbudaahat jo swaal jaisi ‘sunaayi’ de rhi.
    “mujhe thook ki tarah chhod kar……”
    ye kaisi abhivyakti, kaisi mnodashaa … kis violence ki jhaag…ya kisi gehri guilt ke bukhaar jo utarna nahi chahta, mareez us se nijaat nahi chaahta.
    pita ke mar jaane ka shok kise nahi hota
    par us shok ko jism deti ye kuchh kavitaaien lipat lipat behti hain.
    baaki phir.

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