बिना कैमरे का आयोजन और पाँच कविताएँ रघुवीर सहाय की उपस्थिति के नाम

(बहुत दिनों बाद, अपना लिखा कुछ। इस बीच पुस्तकें प्रकाशित की, ग्वालियर में मेरे जीवन के सबसे यादगार साहित्यिक आयोजनों में एक “कविता समय” किया, दिल्ली में ऑलमोस्ट आईलैंड पत्रिका के एक बेहद अलग किस्म के साहित्यिक आयोजन में शिरकत की – जहाँ जॉर्ज स्जर्टेसफॉरेस्ट गैंडर, वाहनी कैपिलदेव, विवेक नारायणन, शर्मिष्ठा मोहंती के साथ कविता-कहानी पढ़ी। ‘अलग किस्म’ का इस अर्थ में चार दिन का आयोजन लगभग कैमरे के बिना हुआ। मेरे लिये यह व्यक्तिगत रूप से काफ़ी आत्मीय था क्योंकि मेरे पास ज्यादातर उन कार्यक्रमों की कोई तस्वीर खुद के खींची हुई नहीं होती जिनमें मैं जाता हूँ। प्रतिलिपि के अवैतनिक छायाकार राहुल भी इस बार कैमरा नहीं लाये। और वहाँ किसी ने अपना मोबाईल फोन तक क्लिक नहीं किया। अच्छा लगा)

 

पिटा हुआ वाक्यः एक

सपने देखता हूँ कहने से पाठक सोचता था जो उसके पास नहीं वैसा कोई चश्मा है मेरे पास जिसे पहनने पर दिखते हैं सपने पाठक है कहने से लगता था कोई है जिसे लगातार धोखा दे रहा हूँ धोखा दे रहा हूँ कहने पर वह समझती फिर से कोई माया फैला रहा हूँ फिर से माया फैला रहा हूँ की कल्पना करने पर कुछ ऐसा नजारा होता सब कुछ नष्ट हो रहा है सब कुछ होना बचा रहेगा एक मंत्र है सब कुछ होना बचा रहेगा एक मंत्र है बुदबुदाने पर वे हंसते सब कुछ रहेगा ही तो नष्ट होने बचाने की बात षडयंत्र है बात षडयंत्र है कहने पर चेहरा गिर पड़ता अपार रेलमपेल में

कुचले हुए चेहरे से पहचान सको तो अपना दिल तुम्हें देता हूँ अपनी जान तुम्हारे नाम करता हूँ

कितना सूकून है यह जानने में तुम हँस कर उड़ा दोगे अगर कोई कहेगा मेरे दिलदार कि यह अंतिम वाक्य एक पिटा हुआ वाक्य था

अमरः एक

तीसरी शाम ये कौंधा कि चौराहे पर

तेज भागती गाडियों में से हरेक को खुद को

कुचल कर मार देने का न्यौता दे रहा

ये बूढ़ा डबडबाई आँखों वाला कुत्ता इतने दिनों से

सड़क के बीच चुपचाप बैठकर कहीं

आत्महत्या करने की कोशिश तो नहीं कर रहा?

कब से ऐसा कर रहा है?

शाम की गहमागहम ग्राहकी में व्यस्त वह बोला बेकूफ है कुत्ते की मौत मरना चाहता हैः

जानते हो एक कवि था हिन्दी का, कविता इसलिये लिखता था कि उसकी संतान कुत्ते की मौत ना मरे, मैंने सोचा कहूँ पर नहीं कहा, कहता तो यह भी कहता वह आत्महत्या के विरुद्ध था

जोर से चीखते हुए

ब्रेक लगाते

गुजर रही

कई क्रूर कारें

हर बार

रहम से निराश होता हुआ

तीखी रौशनी में अपना मरण ढूँढता हुआ

वह बूढ़ा डबडबाई आँखों वाला कुत्ता उस शाम में अमर है जब मैं तीसरी बार पहुँचा था उस चौराहे

 

 

अमरः दो

 

महान लेखकों के लिखी हुई सब चीज़ों की तरह वह कभी प्रकाशित होगी ऐसा सोचते हुए लिखी गई है उनकी हर चिठ्ठी पढ़कर लगता था – मुझे लिखी गई है थोड़ा अमर मैं भी हो जाऊंगा, यह ख़याल करता हुआ पढ़ता था उन्हें, अभी कल की चिठ्ठी में था –

“महान संयोग हुआ! सुबह बाथरूम में फिसल गया मैं

महान संगीतकार जनाब क.ख.

और महानतर अभिनेत्री सुश्री ग.ग.

भी कभी बॉथरूम में फिसल कर गिरे थे

और महानतम कवि श्री अ.अ. की इस तरह फिसलने से ही हुई थी मृत्यु, वह तो जालसाजी है कि तानाशाह ने उन्हें जहर दे दिया”

याद रहे, यह मेरी मृत्यु से चालीस बरस पहले और उनकी मृत्य से पूरे चार सौ बरस पहले हुआ था

पिटा हुआ वाक्यः दो

 

शायद से शुरू हुआ हर वाक्य किसी धोखे या धुंधलके में शुरू होता है और किसी बेरहम उम्मीद पर खत्म यह अनुभव से जान कर भी लिखता हूँ शायद यह हो गया है कि हम वही नहीं हैं

अब अगर किसी अनजान उजाड़ पॉर्क में फैल जाये मेरे हाथ उसी तरह तो उन पर लिखा संदेसा तुम नहीं पढ़ पाओ या मैं उन्हें और करीब से देखूँ और वहाँ कोई संदेसा नहीं सिर्फ हाथ ही मिलें मुझे, हवा में कोई खँडहर थामे

यह लिख कर मैं शुरूआत की तरफ ताकता हूँ

वहाँ एक शायद है एक खँडहर है और एक प्रेमः यह धोखा है

वहाँ एक शायद है फैले हुए हाथ हैं और एक हरकत आँखों में: यह धुंधलका है

अंधेरा हो रहा है पॉर्क की तरह यहाँ से पुलिस खदेड़ नहीं देगी यह हमारा घर है हमारा राज्य जहाँ हम ही नष्ट कर रहे एक दूसरे को हाथों को फैल जाने दो आँखों को एक संदेसा पढ़ने दो: यह उम्मीद है, बेरहम

क्या यह जीवन में भी बहुत पिटा हुआ एक वाक्य लगेगा:

हमें खुद को एक मौका देना चाहिये

दो अर्थ का भय

 

अपमान बेहद था होने का रक्त के दरिया में दौड़ते घुड़सवार थे और किसी से नहीं

अपने आप से थी शर्मिंदगी हर साँस में हर शब्द का एक अर्थ दुख दूसरा मज़ाक था – जीवन में

कल्पना में पर नहीं था इनमें से कुछ भी

यही मेरा गुनाह कल्पना में सुखी था मैं

12 विचार “बिना कैमरे का आयोजन और पाँच कविताएँ रघुवीर सहाय की उपस्थिति के नाम&rdquo पर;

  1. In Kavitaon Ko Padhate Samay 1972-90 ke Beech Kee Raghuveer jee Kee Anek Yaden Taja Ho Uthee . unake Kahane par Dinman Mein Likhata Tha-Visheshkar Poorwottar Bharat par. Unake Nidhan Ke Bad, Mujhase Paramarsh Kar Dr Shambhu Nath Singh Jee ( Ab IGNOU Mein) Ne ‘PratiPaksh’ ka Ek Sargarbhit Visheshank Raghuveer Jee Par Nikala Tha. Usamen Maine Bhee likha Tha Aur kuchh Atmeeya Kchhanon Ko Yad Kiya Tha..Unakee Smriti Ko Maun Naman.

  2. अलग तरह की कविताएं…सच कहूम तो पहली बार आपकी कविताएं पढ़ीं… नाम आपका बहुत सुना था… लेकिन कविताएं पढ़कर प्रभावित हुए बिना न रह सका…. आभार….इन अच्छी कविताओं के लिए ढेर सारी बधाइयां मेरी ओर से….

  3. क्या बात है! बहुत ख़ूब! अभी बार्सेलोना में हूँ, 16 को दिल्ली आ रहा हूँ, उस किताब के साथ जिसमें आपकी पांच कवितायें हैं, हिन्दी और कैटलन में! ईमेल लिखता हूँ।

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