ईश्वर की हत्या करने के एक सौ चालीस तरीके

(संबोधन के विष्णु नागर पर  केन्द्रित अंक का संपादन हरे प्रकाश उपाध्याय ने किया था. उस अंक से मेरा यह निबंध  ‘ईश्वर की कहानियों’ पर. विष्णु नागर ने ईश्वर नामक  शै को केंद्र में रखकर मेरी गिनती से १४० कहानियाँ लिखी हैं इसीलिए लेख के शीर्षक में १४० है. हरे एक कवि के रूप में तो जाने जाते ही हैं लेकिन उनका एक उपन्यास अंश प्रकाशित करने पर पता चला वे फिक्शन में भी लोकप्रिय होने वाले हैं. खबर है बड़े प्रकाशकों की इस उपन्यास पर नज़र है. आमीन!  और अभी जब उनके अख़बार के लिए नहीं लिख पा रहा हूँ तो दोस्त की नाराज़गी से बचने की एक तरकीब यह भी सही! तस्वीर यहाँ से साभार)

पश्चिम में ईश्वर की मृत्यु हुए अरसा हो गया और बावजूद इसके कि कभी कभी उसके पुनर्जन्म के लक्षण वहाँ दिखाई पड़ते हैं, उसके पूरी तरह लौट आने की कोई सम्भावना लगता है हमेशा के लिए नष्ट हो गयी है. अमेरिका में ज़रूर ईश्वर का प्रेत मंडराता रहता है लेकिन वहाँ भी सिर्फ प्रेत ही. विज्ञान, तर्क-केंद्रित आधुनिकता और टेक्नोलाजी ने ईश्वर की हत्या की थी ऐसा भी कहा जाता है. बायोजेनेटिक उत्पातों और क्लोनिंग के बाद अब वहाँ ईश्वर के भविष्य की भी मृत्यु या हत्या की शुरुआत हो चुकी है. लेकिन तीसरी दुनिया में, भारत जैसे देशों में क्या ईश्वर की मृत्यु/हत्या कभी हुई थी? औपनिवेशिक आधुनिकता और मार्क्सवादी प्रगतिशीलता दोनों में भारत के बुद्धिजीवन में ईश्वर की मृत्यु/हत्या का एक आभास उत्पन्न करने की कोशिश की गई. लेकिन राष्ट्रीय बुद्धिजीवन में उत्पन्न यह आभास भारतीय समाज में संक्रमित न हो सका. भारतीय समाज, बहुत सारे एशियाई और अफ़्रीकी देशों की तरह ईश्वर के होने के आतंक और आनंद, भरोसे और डर से घिरा हुआ समाज बना रहा. शायद इसका एक महत्वपूर्ण कारण यह भी है कि समूचे भारत का कोई एक ईश्वर कभी नहीं था. न सिर्फ इस अर्थ में कि यह एक बहुसांस्कृतिक समाज रहा है बल्कि इस अर्थ में भी कि इसके सबसे बड़े धर्म का स्वरुप बहुदेववादी रहा है. एक राष्ट्र राज्य के रूप में भारत एक सेक्यूलर राष्ट्र बना लेकिन इसके निवासियों का ‘व्यक्तिगत’ आचरण मुख्यतः धार्मिक बना रहा. एक नवजात राष्ट्र राज्य में ईश्वर की उपस्थिति का एक और विडंबनात्मक कारण संभवतः यह भी था कि इस राष्ट्र राज्य का जन्म धार्मिक आधार पर हुए एक विभाजन के फलस्वरूप हुआ था. और विभाजन की वह ‘धार्मिक हिंसा’ भी ईश्वर के होने का एक तिर्यक संकेतक/संदर्भ बन गयी थी.

हिंदी साहित्य में लेकिन ईश्वर की स्पेसिफिक, ‘चारित्रिक’ उपस्थिति इस कदर कम रही है कि उसकी मृत्यु/हत्या हो जाने का आभास होता है. ईश्वर का संकेतक, उसका प्रतिस्थापी, वहाँ धार्मिक सत्ता है. खुद ईश्वर निर्वासित है. वह व्यंग्य (लेखन) में रहता है और निर्धनों को नष्ट करता है.

१९९० के दशक में (जब मदन सोनी के शब्दों में ‘देश के श्रद्धाबुद्धिहीन मध्यवर्ग को धर्म की अपनी फूहड़ समझ से और आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक स्तर पर त्रस्त लोगों को अपने अजूबा राजनैतिक विकल्प से सम्मोहित कर सत्ता की वासना से उन्मत्त एक राजनैतिक दल, एक विलक्षण काव्य ढांचे को तोड़कर उसमें शताब्दियों से प्रतिष्ठित काव्यनायक को एक राजनैतिक प्रतीक में बदल रहा[i]’ था और जिस राजनैतिक प्रतीकीकरण का एक विध्वंसक परिणाम १९९२ में स्वाधीन भारत में ‘ईश्वर की सबसे जघन्य हत्या’ के रूप में हुआ था) तब आजादी के बाद के हिंदी साहित्य में ईश्वर की एक बेहद जटिल और तनाव भरे ढंग से वापसी हुई. उस दौरान लिखे गए साहित्य में भी लेकिन खुद ईश्वर नामक चरित्र की, इस ‘खतरनाक प्रत्यय’ की बहुत डाइरेक्ट उपस्थिति नहीं हैं बल्कि निरंतर उसका अन्यथाकरण, प्रतीकीकरण और प्रत्याख्यान है.

इस बैकड्रॉप में विष्णु नागर की ईश्वर की कहानियों की पढ़ने की एक कोशिश है यह टिप्पणी.

दो: बुरा ईश्वर बनाम अच्छा ईश्वर

ईश्वर की ये एक सौ चालीस कहानियां एक ईश्वरहीन राज्य और समाज में ईश्वर के होने की दुविधा की कहानियां हैं. जैसा हम जानते हैं ईश्वरहीन राज्य बनाना जितना मुश्किल था उससे अधिक मुश्किल साबित हुआ है ईश्वरहीन समाज बनाना. इन कहानियों में समाज की ईश्वरहीनता का तर्क यह है कि ईश्वर का स्थान धर्मसत्ता ने, ईश्वर के सांसारिक मिडिलमैन (middle men) ने ले लिया है जिसके फलस्वरूप ईश्वर जहां सर्वाधिक उपस्थित प्रतीत होता है वहीं सर्वाधिक अनुपस्थित है. ये कहानियां ईश्वर के चरित्र की एक ‘खलनायक’ के रूप में आईडियोलॉजिकल निर्मिति करने का प्रयास करती हैं लेकिन उसके समांतर अपने को बार-बार एक ऐसे असहाय ईश्वर के सम्मुख भी पाती हैं जो अपने बनाये हुए संसार पर अपना नियंत्रण ही नहीं खो बैठा, उस संसार में अपनी पहचान भी खो बैठा है. ये कहानियां एक ईश्वरहीन राज्य और समाज में ईश्वर की खोज की, खुद ईश्वर द्वारा ईश्वर की खोज की कहानियां हैं. यह अकारण नहीं है कि इन कहानियों में ईश्वर के दो सबसे बड़े संकट हैं. पहला, पहचान का संकट . उसे कोई नहीं पहचानता. जब भी वह यह कहता है कि वह ईश्वर है उसका मज़ाक उड़ाया जाता है, उसे प्रताड़ित किया जाता है. दूसरा, सत्ता का संकट. यह पृश्वी अब ईश्वर का संसार नहीं, मनुष्य का ‘राज्य’ है जिसमें ईश्वर लगातार असहाय है, कुछ इस हद तक कि वह इन कहानियों का सर्वाधिक ‘पीड़ित’ चरित्र बन कर उभरता है. लेकिन इन कहानियों में ईश्वर के साथ राज्य का यह प्रतिशोध संशयहीन नहीं है. यह एक आधुनिक, प्रगतिशील राज्य की वांछित सफलता की तरह नहीं घटित होता क्योंकि अपने ही आवास से निर्वासित यह ईश्वर (कैफ़ी आजमी की कविता में ‘दूसरा बनवास’ पाने वाले राम की तरह) एक करूणाजनक, ट्रेजिक (जितना करूणाजनक और ट्रेजिक होना अब संभव रह गया है उतना करूणाजनक और ट्रेजिक क्योंकि न सिर्फ इस संसार में ट्रेजिक गरिमा असंभव हो गयी है बल्कि इसलिये भी कि ईश्वर की ये कहानियां ट्रेजिक गरिमा की किसी क्षीण संभावना से भी वंचित एक सपाट, अनलंकृत भाषा में लिखी गयी हैं) पात्र नज़र आता है जिसकी एक क्रूर, मसखरी व्यवस्था हत्या करने की कोशिश कर रही है.

तीनः उद्धरण

बेइमानों, चोरों, डाकुओं, लफंगों, घोटालेबाजों, रिश्वतखोरों, दलालों, साम्प्रदायिकों और जातिवादियों को कई जगह चुनाव में खड़ा होते देख ईश्वर इतने परेशान हो गये कि एक पूरी रात तो उन्हें नींद ही नहीं आई. उनका ब्लड प्रेशर इतना बढ़ गया  कि वे खुद घबराहट में ‘हे ईश्वर, हे ईश्वर’ पुकारने लगे.

लेकिन अगले दिन उनकी हालत सुधरी और उन्होंने निश्चय किया कि वे स्थिति का मुकाबला करके रहेंगे. बहुत ठंडे दिमाग से सोचन पर उन्होंने पाया कि उसका सर्वोत्तम उपाय यही है कि वे स्वयं चुनाव में खड़े हो जाएं तो शरम तथा डर के मारे ये लोग खुद ही बैठ जायेंगे और ‘स्वर्गादपि गरीयसी’ भारत में लोकतंत्र की रक्षा हो जायेगी.

तो ईश्वर चुनाव में खड़े हो गए मगर कोई लफंगा नहीं बैठा. वे पूरे एक दिन खड़े रहे मगर कोई घोटालेबाज नहीं बैठा. वे दो दिन तक खड़े रहे मगर कोई दलाल नहीं बैठा. वे चार दिन और चार रात खड़े रहे मगर बैठना तो दूर किसी चोर ने उनकी तरफ झांककर भी नहीं देखा. किसी बेईमान ने नहीं कहा, प्रभो, अब आप बैठ जाइए.

….. अंत में ईश्वर धड़ाम से जमीन पर गिर गए और होश आया तो अस्पताल में थे. वे सब चुनाव जीत गए, जिनसे भारतीय लोकतंत्र की रक्षा के लिये ईश्वर चुनाव में खड़े हुए थे. यहां तक कि उनकी जीत की खुशी में इनका एक समर्थक अस्पताल के पलंग पर लेटे ईश्वर के मुंह में लड्डू ठूंस गया था. 

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बाद में ईश्वर उस धूल को सिर पर लगाते  हुए पाए गए, जिस पर से धर्मगुरू की मर्सीडीज कार के पहिये गुज़रे थे.

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उन्होंने कहा, ‘मैं ईश्वर हूं भैया. मेरे पास रूपया-पैसा कहां?’ एक युवक ने कहा, ‘बकवास मत कर. जो है सो निकाल दे, चुपचाप.’ ईश्वर ने कहा, ‘वाकई सच कह रहा हूं भैया, कुछ नहीं है.’ एक युवक ने उनका कॉलर पकड़ा और दूसरा उनकी तलाशी लेने लगा. वास्तव में कुछ नहीं निकला. घड़ी भी नहीं. एक युवक के रूप ने कहा, ‘जा भाग जा. दुबारा इस रास्ते पर मुंह मत दिखाना.’ 

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एक मंत्री शपथ लेने पहुंचा. उसने कहा, ‘मैं ईश्वर के नाम की शपथ लेकर कहता हूं…‘ यह सुनकर ईश्वर अचानक उठ खड़े हुए. उन्होंने शोर मचा दिया… इतने में सुरक्षाकर्मी उन पर झपट पड़े और उन्हें हॉल से बाहर ले गए.

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राम कुछ कहते, इससे पहले एक ने कहा, ‘चल फूट. रास्ता नाप. और सुन, इधर दोबारा मुंह मत करियो वरना तेरी वो गत बनेगी कि याद रखेगा.‘ सब फिर हंसने लगे. राम वहां से चल पड़े. थके. अपमानित. निराश्रित.

यह टिप्पणी यह कहने की कोशिश नहीं कर रही है कि ईश्वर की यह करूणाजनक, पीड़ित छवि कथाकार का मंतव्य है, बल्कि यह कि ईश्वर की करूणाजनक, पीड़ित छवि कथा में मौजूद एक ऐसा ‘विचलन’ है  जो ईश्वर की एक सायास, आईडियोलॉजिकल निर्मिति के समांतर घटित हुआ है. यह विचलन भारत में ईश्वर और आस्तिकता के स्वास्थ्य पर एक टिप्पणी है.

चारः युजुअल सस्पेक्ट्स

ये कहानियां शायद हिन्दी की सबसे ‘अकलात्मक’ कहानियां हैं जो सायास वैसे लिखी गई हैं. ये कला होने के किसी भी तरह के प्रिटेंशन के अभाव की कहानियां हैं.  इन कहानियों की संशयहीन, सायास ‘अकलात्मकता’ हैरान करती है. कला का आभास उत्पन्न करने के सरल विकल्पों की सर्वसुलभ सुविधा के बावजूद ‘अकलात्मक’ होने की यह कोशिश ऐसी लेखन में होती है जो अपनी प्रक्रिया से नहीं, अपने प्रभाव से खुद को परिभाषित करना चाहता है. हिन्दी के बहुत सारे कंडीशंड ‘साहित्यिक’ पाठकों को, ‘युजुअल सस्पेक्ट्स’ को, हो सकता है, ये कहानियां चुटकुलों से अधिक ‘साहित्यिक’ न नज़र आयें लेकिन क्या ये कहानियां वाकई उन युजुअल सस्पेक्ट्स के लिये लिखी गयी हैं?


[i] भूमिका, विषयांतर, वाणी प्रकाशन, प्र.सं. 1990

ईश्वर की हत्या करने के एक सौ चालीस तरीके&rdquo पर एक विचार;

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