जाँघिया देश-काल तथा अन्य देश-काल

शमशेर की कविता से, और उसके सम्मुख आलोचना की हिंसा से, एक निजी संबंध भी कई बरसों से रहा है. शमशेर की कविता “धारीदार जाँघिया पीला” का पठन करने की एक कोशिश करता  मेरा यह निबंध मदन सोनी द्वारा सम्पादित शमशेर पर केन्द्रित  एक पुस्तक में प्रकाशित हुआ है, ऐसी सूचना मिली है. अजब बस यह कि पूरे निबंध में कवि का एक बार भी नाम लिए बिना, उसकी कविता पर लिखा है. दर्शनीय व्यक्तित्व-पूजा और  प्रदर्शनीय आत्म-विमोहन  के दिनों में इस अजब का संतोष भी अजब नहीं है, भंते?

(दीपेंद्र बघेल के लिए)

धारीदार जाँघिया पीला (इतने पास अपने , 1982) का शीर्षक हमारे सामने एक वस्तु को रखता है, एक ऐसी वस्तु जिसकी पहचान दृश्य-मूलक है. दो विशेषणों से घिरी हुई यह मूल वस्तु एक जाँघिया है. दोनों विशेषण उसी तरह दैनिक जैसे कि स्वयं विशेष्य फिर भी तीनों शब्द मिलकर एक ऐसी वस्तु हमारी सम्मुख रखते हैं जिसकी कल्पना बहुत संभव है कई समकालीन पाठक न कर पायें. जैसा जाँघिया इस दृश्य में है वह कई लोगों के यथार्थ से, उनकी कल्पना से गायब है, जिससे उनका परिचय, अगर हुआ हो, तो किसी गल्प में हुआ होगा. जाँघिया वहाँ एक गुम होता जा रहा अधोवस्त्र है जिसे पहन कर चौक-गली-गुवाड़ में घूमा जा सकता था. उसके एवज़ी – ब्रीफ या अंडरवियर – को सार्वजनिक रूप से पहनना आपको प्रतिनिधित्व के संजाल में दाखिल कर देता है. जाँघिये जैसी स्वच्छंदता से ये एवज़ी सार्वजनिक रूप से सिर्फ उन्हीं स्पेसेज में  पहने जा सकते हैं जो यथार्थ के नहीं उसके प्रतिनिधित्व के स्पेस हैं. विज्ञापन, टीवी सीरियल, कथा और सिनेमा जैसे गल्पात्मक रूप . अगर आप अपनी गली में या कॉरीडोर या मॉल में ब्रीफ पहने हुए टहलने लगे तो आप क्लोज सर्किट कैमरे द्वारा, दृश्य में उपस्थित ‘नागरिकों’ द्वारा, सुरक्षाकर्मियों द्वारा और अंततः ‘राज्य’ द्वारा गिरफ्तार कर लिये जायेंगे.

जाँघिया एक दूसरे देश-काल का गल्प है?

2

कविता में दाखिल होने वाली दूसरी वस्तु हैः धारीदार बनयान. दोनों वस्तुओं में यह साम्य किसी ‘ख़ास मकसद’ से नहीं आया लगता. दोनों वस्तुएँ मिलकर एक मनुष्य/व्यक्ति को निर्मित करती हैं. कोई मनुष्य एक धारीदार पीला जाँघिया और धारीदार बनयान पहने हुए है, इसमें क्या ‘ख़ास मकसद’ हो सकता है. अगर आप ‘जाँघिया देश-काल’ के निवासी हों और किसी को गली में धारीदार पीला जाँघिया और धारीदार बनयान पहने हुए देखें तो यह इस कदर रोजमर्रा और मामूली एक दृश्य होगा कि हो सकता है आप इसे नोटिस भी न करें. लेकिन भाषा एक दूसरा देश-काल है. उसमें प्रवेश करना किसी अर्थ-संजाल में प्रवेश करना है, प्रतीकात्मक और अन्य अलंकारिक अर्थों और साहचर्यों से वेध्य एक ऐसे अति-संवेदनशील भाषा क्षेत्र में प्रवेश करना है कि वहाँ ‘पीला’ को ‘लाल/भगवा’ से प्रतिस्थापित करना किन्हीं दूसरे पठनों की तरफ धकेल सकता हैः

धारीदार जाँघिया लाल/भगवा

                                       और धारीदार बनयान लाल/भगवा पहने

इन पंक्तियों में ‘धारीदार’ और ‘पीला’ अलंकारिकता से नहीं उसके अभाव और उसके प्रतिरोध से चिन्हित हैं. वे जिस मनुष्य को निर्मित करते हैं वह भी, इन दो काव्य-पंक्तियों में, अलंकरण से अपसरण करता हुआ मनुष्य है. लेकिन वह किधर जा रहा है? क्या वह ‘रहस्य’ से भी अपसरण कर रहा है? क्या वह पहले से ही एक ‘रहस्य-वंचित’, अनलंकृत साधारणता नहीं है?

3

यह ‘साधारण’, अनलंकृत मनुष्य किन्हीं ‘हल्के अंधेरों’ से निकलकर किन्हीं ‘हल्के अंधेरों’ में लोप हो जाता है.

धारीदार जाँघिया पीला

                             और धारीदार बनयान पहने

धीरे-धीरे बेआवाज़, पंजों के बल

चलता हुआ हल्के अँधेरों से

निकल कर हल्के अँधेरों में

लोप हो गया

‘हल्के अंधेरों’, ‘बेआवाज़’ और ‘लोप’ से कविता में रहस्य प्रवेश करता है – मिस्ट्री के नहीं, ‘सस्पेंस’ के अर्थ में. रहस्य जो हमारी जिज्ञासा को ‘साधारण’ व्यक्ति से ‘व्यक्तित्व’ की ओर, ‘व्यक्ति-विशेष’ की ओर अग्रसर करता है. कौन है यह व्यक्ति? ‘हल्के अँधेरों’ से निकल कर ‘बेआवाज़, पंजों के बल चलता हुआ’ ‘हल्के अँधेरों में लोप’ हो जाने वाला यह व्यक्ति कौन है? रहस्य का स्रोत व्यक्ति में नहीं, उसके कर्म (Action) में है.

लेकिन अब यह सिर्फ भाषा के अति-संवेदनशील क्षेत्र में उत्पन्न रहस्य नहीं है. यदि आपके ‘वास्तविक’ ‘जाँघिया देश-काल’ मे भी ‘धारीदार जाँघिया पीला और धारीदार बनयान’ पहने कोई हल्के अँधेरों’ से निकल कर ‘बेआवाज़, पंजों के बल चलता हुआ’ ‘हल्के अँधेरों में लोप’ हो गया होता तो भी आप अपने को इसी सस्पेंस से घिरा पाते – कौन है यह मनुष्य/व्यक्ति?

इन चार काव्य पंक्तियों में आपके वास्तविक ‘जाँघिया देश-काल’ और भाषा के ‘दूसरे देश-काल’ में कोई क्षणिक अभेद स्थापित हो गया है?

उसकी आगे को बढ़ी हुई

झुकी-झुकी गर्दन

                    और तेज चमकती आँखें

अब भी उसी रास्ते पर

                           तैरती-सी धीरे-धीरे 

                           बहती जा रही है

हल्के अँधेरे को और सघन

और गहरा और गहरा करती

 

हर-हर कदम पर वो पतला सर

एक बे-मालूम झटके से

                       दायें से बायें को बायें से दायें को

हिलता हुआ अब भी मेरे आगे से

                          चुपचाप निकला जा रहा है

उपरोक्त तेरह पंक्तियों में पूर्ववर्णित कर्म – चुपचाप/बेआवाज़ हल्के अंधेरों के बीच चलना – से उत्पन्न सस्पेंस उस मनुष्य/व्यक्ति के अंगों और अंग मुद्राओं के विवरणों से ‘और सघन और गहरा और गहरा’ होता जाता है ठीक उसी तरह जिस तरह उसकी ‘तेज चमकती आँखें’ ‘तैरती-सी’ ‘बहते हुए’  ‘हल्के अँधेरे को और सघन और गहरा और गहरा करती’ जाती है. आँखों की यह ‘तैरती-सी’ ‘बहती हुई’ गति जो हल्के अंधेरे को सघन और गहरा कर देती है क्या वास्तविक ‘जाँघिया देश-काल’ और भाषा के ‘दूसरे देश-काल’ के बीच, ‘वास्तविक’ और ‘काल्पनिक’ के बीच (=दो ‘हल्के अंधेरों के बीच’ ?) एक तीसरे देश-काल – ‘सुर्रियल’ –  में घटित होती है?

4

कविता की बीसवीं और इक्कीसवीं पंक्ति तीन हल्के अंधेरों को – वास्तविक (जाँघिया देश-काल), काल्पनिक/गल्पात्मक (भाषा का दूसरा देश-काल) और सुर्रियल – को एक ‘बे-मालूम झटके’ से पुनः ‘(बे-)ठोस वास्तविक’ में ले आती है. ‘प्रकृत’ से ‘साभ्यतिक’ में ले आती है (इस बिंदु तक जाँघिये और बनयान के अलावा सब कुछ प्रकृत है)

यह सड़क बियाबान है

यह घरों की कतार कोई सूना-सा जंगल

दृश्य फिर से रोजमर्रा और साधारण ‘वास्तविक’ में लौट आता है ‘बियाबान सड़क’ पर और ‘घरों की कतार’ के बीच हालांकि भाषा के दूसरे देश-काल में यह साभ्यतिक प्रकृत- जैसा (=कोई सूना-सा जंगल) है. और आख्याता हमारे सस्पेंस को फिर से एक ‘बे-मालूम झटके’ से उलट देता है. सस्पेंस यह नहीं है कि वह ‘रहस्य-चिन्हित’ मनुष्य/व्यक्ति कौन है बल्कि यह कि स्वयं आख्याता कौन है?

मैं यहाँ      हूँ कौन

यह दार्शनिक, मेटाफिजिकल सस्पेंस (मैं कौन?) इस पंक्ति में न सिर्फ स्थान-सापेक्ष हैः

मैं यहाँ      हूँ कौन

बल्कि स्थान और होने (हूँ) के बीच एक छोटा-सा अंतराल, एक छोटा-सी खाई भी है – जो मैं ‘यहाँ’ हूँ वह मैं यहीं हो सकता हूँ. लेकिन ‘यहाँ’ का मतलब क्या वह भूगोल-भर है जिसमें यह कविता/घटना घटती है. यह ‘सूने-जंगल’ जैसी घरों की कतार और यह ‘बियाबान’ सड़क, यह ‘हल्के अंधेरों’ से भरा रास्ता क्या काल-सापेक्ष है? क्या ऐसा ‘यहाँ’ सिर्फ उसी काल में स्थित हो सकता है जिस ‘सम (=‘आधुनिक’ ?)-काल में यह कविता/घटना लिखी जा रही है, घटित हो रही है?

5

सस्पेंस सिर्फ उस तरफ है जिस तरफ से आख्याता देख रहा है. उस रहस्य-चिन्हित ‘दूसरे’ (other) के लिये कुछ भी रहस्य-चिन्हित नहीं है, वह ‘अब भी  इत्मीनान से’  ‘उसी एक चाल से और उसी अंदाज़ से’  निकला चला जा रहा है  क्योंकि या तो वह ‘बहुत अच्छी तरह जाने हुए’ है या ‘उसके लिए ऐसा ही है’  ‘जैसे यहाँ कोई नहीं है.

वह मुझे नहीं देख रहा है     या शायद

बहुत अच्छी तरह जाने हुए हो कि

यहाँ कोई है

                       पर उसके लिए ऐसा ही है

जैसे यहाँ कोई नहीं

                             अब भी       इत्मीनान से 

उसी एक चाल से और उसी अंदाज़ से

वो मेरे सामने से धीरे धीरे

                               निकला चला जा रहा है

उस दूसरे के लिये ‘ऐसा ही है’ कि ‘आख्याता’ – इस संरचना/घटना का सेल्फ – ‘कोई नहीं है’, एक अनस्तित्व है.

यह कौन-सा नगर है, कौनसा देश है जिसमें सड़क बियाबान है, घरों की कतार किसी कोई सूने-से जंगल जैसी है और जिसमें दूसरे  के लिये यह तय ही है कि आप ‘कोई नहीं हैं’.

क्या इसे आधुनिक नगर कहा जा सकता है? क्या इस कविता में इसके लिये पर्याप्त संकेत हैं? क्यूँ न हम इस देश-काल को जाँघिया देश-काल से ही नामांकित करे जैसा हम शुरू से करते आये हैं – एक गुम होते जा रहे अधोवस्त्र का देश-काल जिसे हम कई शताब्दियों के आरपार तो फैला ही सकते हैं.

दो पाद-टिप्पणियाँ

1

क्या किसी और कवि के यहाँ धारीदार, पीला जाँघिया एक विवरण, एक अनु-भाव, एक विचार में नहीं बल्कि एक (पोयटिक)इवेंट में बदल सकता था?

2

इस पठन में इस कविता की लेखकीय मुहर, वह एनिग्मैटिक व्यक्तिवाचक  संज्ञा  ‘शमशेर’ अनुपस्थित है. यह अनुपस्थिति ‘शमशेरियत’ की खोज का एक प्रस्ताव है एक ऐसे पठन-पर्यावरण में जिसमें शमशेर/उनकी कविता का प्रत्येक पठन (मानो अपने लिखे जाने से पहले ही), जाने या अनजाने, शमशेर/उनकी कविता के नहीं उसके (उपलब्ध) प्रतिपक्षी पठनों के प्रति-पठन में, ‘शमशेर’ नामक अद्वितीय इवेंट पर कब्ज़ा करने की  कोशिश में बदल जाता है.

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