आवाज़ का ठिकाना

हिंदी लेखक की आवाज़ उसके लिखे में जिस जगह से सुनाई देती है, वह जगह कौनसी है? उसकी आवाज़ को कहाँ लोकेट किया जाए?

प्रेमचंद की आवाज़ कई जगहों से सुनाई देती हुई अंततः गाँव से आती हुई याद रहती है। रेणु की मानो कोई आवाज़ नहीं; उनकी कला, जैसा उदयन वाजपेयी ने हमें दिखाया है, अभिलेखन की कला है – कई आवाजें, हर पात्र की अपनी, उस अनोखे ग्रामोफोन से सुनाई देती है जिसका आविष्कार रेणु ने किया था। इसके उलट निर्मल वर्मा के किसी पात्र की कोई आवाज़ नहीं; उनकी कथा में लगातार एक आवाज़ है – आख्याता की; कहीं बाहर नहीं ,खुद उसके भीतर से आती हुई । मुक्तिबोध ने अपने भीतर कुछ वैसा ही माइक्रोफोन लगाया था जैसा कुंदेरा के मुताबिक जेम्स ज्वायस ने लेपल्ड ब्लूम के दिमाग में यूलिसिस में लगाया था, इस अहम फर्क के साथ कि ज्वायस का माइक्रोफोन मानो सब कुछ रिकार्ड करता है (हिंदी में ठीक ऐसा कृष्ण बलदेव वैद के यहाँ होता है जो ज्वायस के मुरीद भी रहे हैं और अदबी शागिर्द भी) जबकि मुक्तिबोध का यंत्र संपादन भी करता है। मनोहर श्याम जोशी की आवाज़ उस कथावाचक की आवाज़ है जो उनकी हर कथा अपने लिए नियुक्त करती है। लेकिन हम जानते हैं यह कथावाचक किसी छोटे शहर से आता है। केदारनाथ सिंह की आवाज़ दिल्ली से आती है और हर बार अपनी सद्कामना से हारती हुई गाँव नहीं पहुँच पाती है.

मेरे समकालीन लेखकों में प्रभात की कविता गाँव से शहर आ जाती है लेकिन उसकी आवाज़ वहीं पीछे से आती है; शिरीष कुमार मौर्य की ज़्यादातर पहाड़ से, मृत्युंजय की अपने से पहले लिखी गयी कविता के हृत्केंद्र से, गौरव सोलंकी की किसी देहाती कस्बे से, चन्दन पांडे की ज्यादातार एक छोटे शहर से. प्रभात रंजन की हर कहानी में कई आख्याता (नैरेटर) होते हैं और कई भूगोल – हर कहानी मानो सीतामढ़ी से सुमात्रा तक जाती है. यह एक कस्बे की आवाज़ है लेकिन जो आपको सुनाई देती है वह मूल कस्बाई आवाज़ नहीं, उसकी महानगरीय डबिंग है. बांके भाई की कहानी भी कई आख्याता सुनाते हैं — अपनी, अपनी डब्ड आवाजों में. मनोज रूपड़ा के लिए जगह सबसे अहम किरदार है, उनकी कहानियां अक्सर इस किरदार की आवाज़ में ही सुनाई देती है.

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फोटो: शिवकुमार गांधी

जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में युवा अंग्रेजी उपन्यासकार राना दास गुप्ता जब ओरहान पामुक से बात कर रहे थे तब मैं श्रोताओं में था. पामुक लगातार यूरो-(अमेरिकी)केन्द्रिकता का, पुरुषोत्तम अग्रवाल के शब्दों में उसके ‘ज्ञान कांड’ का, समूची मनुष्यता का प्रतिनिधि और ‘सार्वभौमिक’ होने के उसके (मिथ्या) दर्प का मज़ाक उड़ा रहे थे. उन्होंने कहा मैं अगर ‘लव’ भी लिखूं तो मेरे यूरो-अमेरिकी अनुवादक उसे ‘टर्किश लव’ कर देते हैं क्यूंकि मैं या मेरे पात्र जो कर सकते हैं वह उनके लिए ‘टर्किश लव’ ही हो सकता है लेकिन अगर कोई यूरो-अमेरिकी उपन्यासकार ‘लव’ लिखे तो वह ‘ब्रुकलिन लव’ या ‘फ्रेंच लव’ या ‘ब्रिटिश लव’ नहीं ‘लव’ है – सार्वभौमिक! पामुक आयोजकों के भी मज़े ले रहे थे — मैंने सोचा जयपुर में मुझे भारतीय भाषाओँ के लेखक मिलेंगे यहाँ तो वैसे ही प्राणी नज़र आ रहे हैं जो दुनिया भर में कहीं भी ऐसे आयोजनों में ऐसे ही बोलते ऐंठते मिलते हैं.  उधर उनके साक्षात्कारकर्ता दुनिया के छोटा हो जाने और भारतीय अंग्रेजी लेखकों की विश्वविजय को पक्का मानते हुए यूरो-अमेरिकी हेजेमनी के ‘एपोलोजिस्ट’ की भूमिका में आ गये थे और ना सिर्फ पामुक से पिट रहे थे बल्कि हमारी हंसी से भी.

इस किस्से में पामुक का होना ही दिलचस्प है वर्ना तो यह हमारी अदबी दुनिया की बाकी दैनिक दुर्घटनाओं जैसा ही है. पामुक तुर्की में पश्चिमपरस्त माने जाते हैं (तुर्की लेखकों से इस पर उनका झगड़ा हुआ है) और पश्चिम उन्हें तुर्क से अधिक मानना नहीं चाहता. काश राना दास गुप्ता यह समझ पाते कि यह ‘विडंबनात्मक नियति’ भारतीय/ भारतीय मूल के अंग्रेजी लेखकों जैसी ही है जिनसे यह अपेक्षित है कि वे रहें कहीं भी लिखें भारत के बारे में ही, कि वे अंततः ‘भारतीय’ होने पर ही प्रामाणिक और स्वीकार्य हैं.

वैसे भी आप किसी भारतीय लेखक, इतिहासकार, समाज विज्ञानी बुद्धिजीवी को जानते हैं जिसे योरोप और अमेरिका में अमेरिका एक्सपर्ट या योरोप एक्सपर्ट माना जाता हो ? जबकि भारत विशेषज्ञ उसी तरह जैसे हर शहर में  हर विश्वविद्यालय में ‘साउथ एशिया स्टडीज़’ विभाग.

कभी आधुनिकतावाद के असर में हिंदी में ”यूनिवर्सल” होने का एक दौर आया था – अब वह योरोपीय आधुनिकतावाद का लगभग अनुवाद नज़र आता है. भारतीय मार्क्सवाद पर अक्सर भारतीय परिस्थितियों के मुताबिक खुद को ना ढालने का आरोप (कुछ हद तक सही ही) लगता है लेकिन मार्क्सवाद से प्रभावित हिंदी लेखकों में से अधिकाँश पर यह आरोप ठीक नहीं होगा.  मार्क्सवाद के असर में जो ‘अंतर्राष्ट्रीय’ हिंदी लेखन में आया उसने अपने यथार्थ के साथ हिंदी के रिश्ते को जितना मज़बूत किया उतना उस तरह के लेखन ने नहीं जिसकी घोषित तलाश भारतीयता आदि की थी. इधर नब्बे के बाद के नवउदारवाद में हिंदी में भी गूगल-प्रेरित ‘ग्लोबल’  कामनाएं सक्रिय हुई हैं जिन्हें आप नहाने का साबुन दीजिए या हिंदी कविता, वे यह देखेंगी कि यह ‘ग्लोबल’  स्टैण्डर्ड का है कि नहीं, बिना इस बात की परवाह किये कि यह ‘ग्लोबल’ भी मूलतः यूरो-अमेरिकी ही है, कि नए साम्राज्य का यह ‘ग्लोबल’ , जैसा बौद्रिआ (Jean Baudrillard) आदि ने कहा है, आधुनिकतावाद के ‘यूनिवर्सल’ से  इस में अर्थ और भी खराब है कि ‘यूनिवर्सल’ जहाँ संस्कृति, लोकतंत्र और मानवाधिकार आदि के सन्दर्भ से अपने को अभिव्यक्त करने की कोशिश करता था, वहीं ‘ग्लोबल’  मुख्यतः तकनीक, व्यापार, बाजार, सूचना आदि के सन्दर्भ से.

पामुक बाबू को सुनते हुए मैं अपने आस पास की अंग्रेजीदां भीड़ को देख रहा था जो नोबेल विजेता को सुनने के लिए आयी थी — बेचारी, वह ठीक से उस अदबी कत्लेआम का मज़ा भी नहीं ले पा रही थी.

हिंदी कथाकार की आवाज़ जहाँ से आती है उस जगह को खोजने उससे एक राब्ता बनाने की एक कोशिश मैं जल्द ही कवि अरुण देव द्वारा सम्पादित ई-पत्रिका समालोचन पर शुरू होने जाने रहे अपने स्तंभ में कर रहा हूँ. पहली किश्त ‘सीतामढ़ी’ के किसागो प्रभात रंजन की एक कहानी पर.

जगह के सन्दर्भ से नहीं लेकिन एक दूसरे ढंग से आवाज़ और उसका ठिकाना ढूँढने की कुछ कोशिश अनुनाद पर भी कविता जो याद रहती है  में चल रही है.

 

आवाज़ का ठिकाना&rdquo पर एक विचार;

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